मानव जीवन का अस्तित्व, प्रगति विकास संसाधनों पर निभ्रर करता है । आदिकाल से मनुष्य प्रकृति से विभिन्न प्रकार की वस्तुएँ प्राप्त कर अपनी आवष्यकताओं को पूरा करता है वास्तव में संसाधन वे है जिनकी उपयोगिता मानव के लिए हो, अन्य जीवों के समान ही मानव भी पर्यावरण का ही एक अंग है परन्तु एक विभिन्नता जो सहज ही परिलक्षित होती है वह यह है कि अन्य जीवों की तुलना में मानव अपने चारों ओर के पर्यावरण को प्रभावित...
पर्यावरण प्रदूषण एक ऐसी सामयिक समस्या है जिसमें मानव सहित जैव जगत् के लिए जीवन की कठिनाईयाँ बढ़ती जा रही हैं। पर्यावरण के तत्त्वों में गुणात्मक ह्रास के कारण जीवनदायी तत्त्व यथा वायु, जल, मृदा, वनस्पति आदि के नैसर्गिक गुण ह्रसमान होते जा रहे हैं जिससे प्रकृति और जीवों का आपसी सम्बन्ध बिगड़ता जा रहा है। यह सर्वज्ञात है कि पर्यावरण प्रदूषण आधुनिकता की देन है। वैसे प्रदूषण की घटना प्राचीनकाल में भी...
भारतवर्ष में प्राचीन शास्त्रों, वेद-पुराणों में, धर्म ग्रन्थो में तथा ऋषि-मुनियों ने पर्यावरण की शुद्धता पर अधिक बल दिया है । वेदों में प्रकृति प्रदत्त पर्यावरण को देवता मानकर कहा गया है कि-
‘‘यो देवोग्नों यो प्सु चो विष्वं भुव नमा विवेष,
यो औषधिषु, यो वनस्पतिषु तस्में देवाय नमो नमः’’
अर्थात जो सृष्टि, अग्नि, जल, आकाष, पृथ्वी, और वायु से आच्छादित है तथा जो औषधियों एवं वनस्पतियों में विद्यमान है...
प्रस्तुत शोध का उद्देश्य वैदिक काल में पर्यावरणीय संरक्षण के प्रति चेतना का अध्ययन करना है। इस हेतु वेद और उपनिषद् आदि के मंत्रों और सूक्तियों का अध्ययन पर्यावरण चेतना के संबंध में किया गया है। वेदों में पर्यावरण संरक्षण, प्रदूषण और निराकरण, और पर्यावरण के प्रति चेतना का वर्णन मिलता है जो इस बात को सत्यापित करता है कि वैदिक काल में भी पर्यावरण के प्रति चेतना थी जिसे आज के संदर्भ में धारण करने में...
मनुष्य का जीवन पर्यावरण से प्रभावितहोताहै।स्वस्थ एवंस्वच्छपर्यावरणमानव जीवन काआधारहैं । इसीलिए पर्यावरणकासंरक्षणप्रत्येकनागरिककाकत्र्तव्य है।प्रस्तुत एकल अध्ययन में एक समाजसेवीसंस्था द्वाराअपनेमहिलाप्रषिक्षणार्थियोंकोपर्यावरणसंरक्षण के प्रतिजागरूककरसमाजमेंकार्यकरने के लिए प्रेरितकियाजाताहैं।सौरऊर्जाउपकरणोंकानिर्माणकरउनकाघरेलू एवंव्यावसायिकउपयोगकरना , जैविक खेतीकरना, एवंपर्यावरणप्रदूषणकास्वाथ्य...