रंगों के प्रति मानव का अनुराग आज से नहीं बल्कि सदियों से रहा है। रंग प्रकृति एवं ईष्वर की सबसे बहुमूल्य देन है। रंग के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। प्रकृति द्वारा रचित अनगिनत वस्तुओं के विविध रंग प्रेरणा के स्त्रोत रहे हैं। इन्हें देखकर मनुष्य ने उसे चित्रकलाओं, मूर्तिकलाओं, नाट्य एवं साहित्य में उकेरा है। रंगों से हमें निरन्तर ऊर्जा एवं चैतन्य शक्ति प्राप्त होती है, निष्चित ही...
रंगो का अपना अनूठा संसार अपनी भाषा होती है। ‘रंग’ शब्दों, वस्तुओ को अर्थ प्रदान कर उन्हे प्रतिबिम्बित करते है। रंगो के द्वारा ही वस्तु, शब्दों के गुण व भावों को आसानी से समझा जा सकता है। रंग अपने आप में अनेक अर्थो को समाये रहता है। रंगों के अभाव में चित्रकला का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है। भावों को व्यक्त करने का रंग महत्वपूर्ण साधन है। मूर्तिकला में भी प्रस्तर वर्ण का विशेष ध्यान रखना आवश्यक...
मनोविज्ञान में प्रयोगशालीय अन्वेषण से पहले ही संवेदना का प्रयोगात्मक अध्ययन प्रारम्भ हुआ । टिचनर, बोरिंग, जैस्ट्रो, एलेश यंग, हेल्महोल्ज, हेरिंग, लैड, फैंक्रलिन आदि ने संवेदना का प्रायोगात्मक अध्ययन किया । विभिन्न संवेदनाओं का प्रयोगात्मक अध्ययन विज्ञान के विभिन्न विषयों में उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में ही आरम्भ हो गया था। वुण्ट 1874 ने संवदेना और प्रत्यक्षीकरण में अंतर स्पष्ट किया। उन्नीसवीं...
जनजातीय समाज सभ्य एवं विकसित समाज की तुलना में भिन्न प्रकृति के होते हैं। उनकी अपनी विषिष्ट संस्कृति होती है। प्रत्येक जनजाति को स्वयं की संस्कृति उन्हें दूसरी जनजातियों से भिन्न बनाती है। परम्परागत रूप से विरासत में प्राप्त हुई संस्कृति उनके जीवन का आधार है। इस विषिष्ट संस्कृति कें कारण वे अपनी बहुत सी आवष्यकताएं पूर्ण करते हैं। विभिन्न सामाजिक उत्सवों रीति रिवाजों में जनजातीय कला की झलक दिखलाई...
साहित्य और चित्रकला का पारस्परिक घनिष्ठ अंतर्सबंध है। दोनो के माध्यम से जीवन के गहन उद्देष्यों की पूर्ति होती है। साहित्यकार के शब्द यदि हमारी भावना को उद्वेलित कर सकते हैं तो चित्रकार की तूलिका से अंकित रेखाएं और रंग भी हमारे हृदय के कोमल पक्ष को छूने की अद्भुत शक्ति लिए होते हैं। कवि और चित्रकार दोनो ही अपनी कला प्रतिभा के जरिये सौंदर्य रचना करते हैं। कविता में शब्दों का तथा चित्रों में रंग और...