भारतीय शास्त्रीय नृत्य कथक की आरंभ से ही एक विशाल व समृद्ध परम्परा रही है। प्रारंभ से ही समय परिवर्तन के साथ-साथ कथक नृत्य में नवीन प्रयोग होते रहे और नृत्य परिवर्तित भी होता गया। सोलहवीं शताब्दी जिसे हम रीति-काल के नाम से पहचानते है उस समय तक कथक नृत्य पर राम व कृष्ण भक्ति का प्रभाव था तथा राम व कृष्ण लीलाओं ही कत्थक नृत्य का मुख्य आधार थी। सत्र्ाहवीं व अठारहवीं शताब्दी में जब कथक नर्तको को नवाबो व राज्यों का संरक्षण प्राप्त हुआ और कथक नृत्य में नये प्रयोग हुए फलतः अनेक परिवर्तन आये। हिन्दु राजाओं के यहाँ कथक नृत्य का सात्विक रूप रहा और मुस्लिम नवाबों जो स्वभावतः श्रृंगारप्रिय व विलासिता पूर्ण थे, यहाँ पर कथक का स्वरुप श्रृंगारिक बना। शैली व वंशावली के आधार पर उन्नीसवी सदी में कथक नृत्य की तीन शैलियाँ, घरानों के रूप में विकसित हुई जो जयपुर घराना, लखनऊ घराना व बनारस घराना के रूप में जाने जाते है। एक अन्य अप्रचलित घराना, रायगढ़ घराना जो रायगढ़ के राजा चक्रधर सिंह के संरक्षण में विकसित हुआ। प्रत्येक घराने की भिन्न-भिन्न शैली उस क्षेत्र व राजाओं के स्वभाव के अनुसार प्रतिष्ठित हुई। उस समय तक प्रत्येक घराने में कथक की प्रस्तुति परम्परागत रूप से की जाती थी और पौराणिक कथाओं पर आधारित नृत्य नवीन प्रयोग के रूप में किये जाते थे। धरानों के विकसित होने पर मुख्य परिवर्तन कथक के नृत्त पक्ष में आ गये। उस समय कथक के नवीन प्रयोग विकसित हुए जैसे- प्रणाम के टुकडे के स्थान पर सलामी, आमद व अभिनय में ठुमरी, दादरा आदि का प्रचलन हुआ।
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