Skip Navigation
Granthaalayah: Open Access Research Database
A Knowledge Repository
By Granthaalayah Publications and Printers
Home Browse Resources Get Recommendations Forums About Help Advanced Search

पंचांग और श्री लंका कहानीकार मार्टिन विक्रम सिंह की कहानियों में अंतगर्त चित्रात्मकता और अलंकारिता

Screenshot
लेख का सारांश:- प्रेमचन्द (1880-1936) और श्री लंका के प्रमुख कहानीकार मार्टिन विक्रमसिंह (1890 से सन् 1976) अलग-अलग देशों से हैं फिर भी उनकी कहानियों में बहुत सी समानताएँ पाई जाती हैं। समकालीन होने के नाते दोनों कहानीकारों की विषयवस्तु पर तत्कालीन समस्याओं का प्रभाव पड़ा है। प्रेमचन्द तथा मार्टिन विक्रमसिंह की कहानियों में चित्रात्मकता और अलंकारिकता का प्रयोग मिलता है।
प्रेमचंद द्वारा विरचित ‘फातिहा’, ‘तगादा’ तथा मार्टिन विक्रमसिंह की ‘विनोदास्वादय’, ‘वहल्लु’, ‘धातु कोलाहलय’, ‘बडगिन्न‘, ‘मुदियान्से मामा’ तथा‘ अहिंसावादिया’ कहानियों में कुछ स्थलों का वर्णन पाठकों के मन में एक चित्र सा खिंच जाता है। चित्रात्मक शैली द्वारा दोनों की कहानियों में वर्णित घटनाओं में सजीवता आ गयी है।
प्रेमचंद की कहानियों की अलंकारिकता के प्रयोग के लिए सुजान भगत, पूस की रात, अलगोझा, पत्नी से पति आदि कहानियाँ उदाहरण हैं। मार्टिन विक्रमसिंह द्वारा विरचित ‘धातुकोलाहलय’, ‘हदँ साक्कि कीम’, ‘गॅहॅणियक’, ‘हिस्कबल’, ‘उपासकम्मा‘, ‘परकारयाट गल गॅसीम’ तथा ‘बेगल‘ आदि कहानियों में अलंकारिकता विद़यमान है।
इस प्रकार प्रेमचंद तथा मार्टिन विक्रमसिंह विशिष्ट प्रकार से भाषा में चित्रात्मकता तथा अलंकारिकता लाकर पाठकों को आकर्षित करने में सफल हुए।
?  Cumulative Rating: (not yet rated)
Creator
Publisher
Classification
Date Issued 2017-08-31
Resource Type
Format
Language
Date Of Record Creation 2021-04-24 07:14:56
Date Of Record Release 2021-04-24 07:14:56
Date Last Modified 2021-04-24 07:14:56

Resource Comments

(no comments available yet for this resource)