मानव और प्राकृतिक संसाधनों में अन्योन्य आश्रित संबंध है। मानव प्रकृति से प्राप्त जैविक-अजैविक सम्पदा पर ही अपने ज्ञान एवं कौशल का उपयोग करके उन्हें बहुमूल्य सेवा एवं वस्तुओं में परिवर्तित करता है एवं आर्थिक विकास को दिशा एवं गति प्रदान करता है। मानव के बिना प्रकृति की इस सम्पदा का कोई मूल्य नहीं है। मानव ही विकास का साधन एवं साध्य दोनों है। प्रो. पी.एल. रावत ने कहा है कि, मनुष्य आर्थिक विकास का आदि एवं अंत दोनों है किन्तु जब मानव अपनी बढ़ती हुई आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए इन प्राकृतिक संपद¨ का अत्यधिक शोषण या दोहन करने लगता है तो मानव व प्रकृति के बीच संतुलन बिगड़ने लगता है और ज¨ पर्यावरणीय समस्याओं के जन्म का कारण भी बनता है। आज लगभग संपूर्ण विश्व तीव्र वृद्धि के कारण मानव एवं प्रकृति के बिगड़ते संतुलन का सामना कर रहा है। हमारा देश एवं राज्य भी इस समस्या से अछूता नहीं है। इस असंतुलन को राज्य में जनसंख्या दबाव एवं भूमि उपयोग के स्वरूप में आए परिवर्तन के द्वारा भी स्पष्ट किया जा सकता हैं।
Cumulative Rating:
(not yet rated)
(no comments available yet for this resource)
Resource Comments