मानव जीवन का अस्तित्व, प्रगति विकास संसाधनों पर निभ्रर करता है । आदिकाल से मनुष्य प्रकृति से विभिन्न प्रकार की वस्तुएँ प्राप्त कर अपनी आवष्यकताओं को पूरा करता है वास्तव में संसाधन वे है जिनकी उपयोगिता मानव के लिए हो, अन्य जीवों के समान ही मानव भी पर्यावरण का ही एक अंग है परन्तु एक विभिन्नता जो सहज ही परिलक्षित होती है वह यह है कि अन्य जीवों की तुलना में मानव अपने चारों ओर के पर्यावरण को प्रभावित तथा कुछ अर्थो में उसे नियंत्रित कर पाने की पर्याप्त क्षमता है यही कारण है कि मानव का पर्यावरण के साथ संबंधों को इतना महत्व दिया जाता है ।
आधुनिक जीवन में मानव तथा पर्यावरण के संबंधों की समस्या से अधिक उत्सुकता का अन्य कोई विषय नहीं है । इस जागरूकता की गति विकासषील देषों में मंद रही है तथा इसका समाधान संपूर्णता से अभी-अभी ही अनुभव किया जाने लगा है ।
विगत् कुछ दषकों में पर्यावरणीय सजगता का वैष्विक आयाम प्रकट होने लगा है । यह महसूस किया गया है कि पृथ्वी की प्रकृति व्यवस्था से भूमि, वायु, जल आदि का अप्रत्याषित नुकसान किया जा रहा है पृथ्वी पर जीवों की भावी उत्तरजीविता को खतरा उत्पन्न होने लगा है अब समग्र रूप से सोचने की आवष्यकता पड़ रही है अब यह महसूस किया जाने लगा है कि विष्व का शग्य हमारे हाथो में है ।
मनुष्य को प्रकृति के प्रति तिरस्कार का परिणाम भी सहना पड़ा है । इस सबके कारण ही आज इस बात की प्रबल आवष्यकता अनुभव की जाने लगी है कि किस प्रकार प्रकृति का उपर्युक्त संतुलन पुनः प्राप्त किया जा सकता है अब हमें अपने तकनीकी कौषल का उपयोग अपने खोये हुए पर्यावरण को पुनः प्राप्त करने के तरीकों में करना होगा ।
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