मानव जीवन का समूचा अस्तित्व पर्यावरण पर आधारित है। जहाँ पर्यावरण का सन्तुलन विकास मार्ग का सन्तुलन विकास मार्ग की प्रगति को प्रषस्त करता है। वहीें पर्यावरण का असन्तुलन व्यक्ति ही नहीं समूचे समाज और मानव संसाधनों के विनाष का प्रमुख कारण है। सुन्दरलाल बहुगुणा का कहना है कि ‘‘पहले मनुष्य प्रकृति का ही एक अभिन्न हिस्सा था। प्रकृति से उसका रिष्ता अहिंसक और आत्मीयता का था। स्वार्थ और भोग संस्कृति के कारण अब यह न केवल बदल गया बल्कि विकृत हो गया।’’
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