Original Article
A comparative study of the image of Krishna in Rajasthani and Pahari miniature paintings
राजस्थानी
एवं पहाड़ी
शैली के
लघुचित्रों
में कृष्ण छवि
का तुलनात्मक
अध्ययन
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Sheryl Gupta 1*, I.U. Khan 2 1 Research Scholar,
Department of Painting, University of Rajasthan, Jaipur, Rajasthan, India 2 Research Director, Department of Painting,
University of Rajasthan, Jaipur, Rajasthan, India |
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ABSTRACT |
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English: In the Indian artistic tradition, the depiction of Shri Krishna exists as a multidimensional cultural, religious, artistic, and poetic heritage. Especially in the Rajasthani and Pahari miniature painting styles, the image of Shri Krishna is portrayed not merely as a divine deity to be worshipped, but as a complete hero, friend, lover, and a playful, dynamic personality. Thus, Krishna is not only a historical or mythological figure but a living symbol of India’s cultural consciousness. Primarily, literary works such as the Bhagavata Purana, Bihari Satsai, Gita Govinda, and Rasikpriya have expanded and enriched Krishna’s imagery. For painters inspired by Vaishnavism, Krishna served as a subject encompassing the totality of aesthetic emotions (rasas), emotional maturity, and vast possibilities of visual imagination. Generally, in these miniature painting traditions, the image of Shri Krishna provided a unique aesthetic vision and profound emotional expression to the miniature art tradition. Both these styles, in accordance with their distinct geographical conditions, cultural backgrounds, and religious inclinations, gave tangible form to various representations of Krishna’s divine plays (leelas), emotions, and relationships. Hindi: भारतीय
कला परम्परा
में
श्रीकृष्ण
का चित्रण एक
बहुआयामी
सांस्कृतिक,
धार्मिक,
कलात्मक
एवं
काव्यात्मक
धरोहर के रूप
में विद्यमान
है। विशेषतः
राजस्थानी
एवं पहाड़ी लघुचित्र
शैलियों में
श्रीकृष्ण
की छवि केवल एक
धार्मिक
देवता
अर्थात
आराध्य देव
के रूप में
नहीं, अपितु
एक सम्पूर्ण
नायक, सखा,
प्रेमी
एवं लीलामय
व्यक्तित्व
के रूप में चित्रित
की गई है।
इसीलिए
कृष्ण केवल
एक ऐतिहासिक
या पौराणिक
चरित्र नहीं,
बल्कि
भारतीय समाज
की
सांस्कृतिक
चेतना के जीवंत
प्रतीक हैं।
मुख्य रूप से
भागवत पुराण,
बिहारी
सतसई, गीत-गोविंद
और रसिकप्रिया
आदि प्रेम
कथाओं ने
कृष्ण की छवि को
विस्तार
दिया।
वैष्णव धर्म
से प्रेरित
चित्रकारों
के लिए कृष्ण
एक ऐसे विषय
रहे हैं जिसमें
रसों की
समग्रता,
भावों
की
परिपक्वता
और
दृश्यात्मक
कल्पना की
भरपूर
संभावना
निहित रही
है। प्रायः
इन लघुचित्र
शैलियों में
श्रीकृष्ण
की छवि ने
लघुचित्रण
परम्परा को
एक अद्वितीय
सौंदर्यदृष्टि
और भावमूलक
अभिव्यक्ति
प्रदान की
है। इन दोनों
शैलियों ने
अपनी
भिन्न-भिन्न
भौगोलिक परिस्थितियों,
सांस्कृतिक
पृष्ठभूमियों
तथा धार्मिक
प्रवृत्तियों
के अनुरूप
श्रीकृष्ण
की लीलाओं,
भावनाओं
एवं संबंधों
की विभिन्न
छवियों को
मूर्त रूप
प्रदान किया
है। Keywords: Krishna Image, Comparative Analysis,
Cultural, Religious, Poetic, Artistic, Stylistic Features, Various Forms,
Figure Depiction, Love Scenes, Aesthetic Basis, कृष्ण
छवि,
तुलनात्मक
विश्लेषण, सांस्कृतिक, धार्मिक, काव्यात्मक, कलात्मक, शैलीगत
विशेषताएँ, विविध
रूप,
आकृति
अंकन,
प्रेम
दृश्य,
सौन्दर्यशास्त्रीय
आधार |
||
प्रस्तावना
प्रस्तुत
शोध आलेख का
उद्देश्य
राजस्थानी एवं
पहाड़ी
चित्रशैलियों
में कृष्ण की
चित्रित
छवियों का
तुलनात्मक
अध्ययन करना
है,
जिससे यह
स्पष्ट किया
जा सके कि किस
प्रकार इन
शैलियों ने
अपने-अपने
सौन्दर्यशास्त्रीय
एवं
आध्यात्मिक
दृष्टिकोण के
अनुसार कृष्ण
के विविध
रूपों को
चित्रकला में
सजीव रूप प्रदान
किया। इस आलेख
में इन दोनों
शैलियों में
कृष्ण की छवि
के प्रत्यक्ष
व अप्रत्यक्ष
प्रतीकों,
रंग
प्रयोग, भावाभिव्यक्ति,
परिप्रेक्ष्य
संयोजन, तथा
सांस्कृतिक
विशिष्टताओं
आदि का तुलनात्मक
अध्ययन
प्रस्तुत
किया गया है।
मूल
आलेख
भारतीय
कला में कृष्ण
छवि अंकन की
परम्परा अत्यधिक
प्राचीन रही
है। कृष्ण के
प्रेममय सौन्दर्यपक्ष
से सम्बन्धित
आलम्बन, उद्दीपन
और अनुभावों
के विभिन्न
लघुचित्र अंकित
हुए हैं।
कवियों और
चित्रकारों
का मन जितना
अधिक कृष्ण
में रमा है,
उतना अन्य
किसी विषय में
नहीं। कृष्ण
के विविध
स्वरूपों का
चित्रांकन
मार्मिकता,
गम्भीरता
और कलात्मकता
की दृष्टि से
राजस्थानी
एवं पहाड़ी
लघुचित्र कला
के क्षेत्र
में बेजोड़ है।
राधा-कृष्ण की
प्रेममयी
लीलाओं का चित्रण
कर
चित्रकारों
ने कृष्ण का
जो शृंगारी स्वरूप
प्रस्तुत
किया, वह
अन्यत्र दुर्लभ
है। 1
यूँ
तो भारतीय
लघुचित्र
परंपरा में
भगवान श्रीकृष्ण
की छवि एक
अत्यंत प्रिय
विषय रही है,
जो
विभिन्न
धार्मिक, काव्यात्मक
और
सांस्कृतिक
ग्रंथों से
प्रेरित होकर
विकसित हुई।
मुख्यतः
भागवत पुराण,
हरिवंश
पुराण, गीतगोविंद,
और
रसिकप्रिया
जैसे
अनेकानेक
ग्रंथों के माध्यम
से कृष्ण की
लीलाएं
अर्थात्
बाल्यकाल,
गोपियों
संग रासलीला,
राधा-कृष्ण
की शृंगारिक
स्वरूप
भंगिमाएं आदि
लघु
चित्रकारों
की कल्पना का
केन्द्र बन गईं।
इस संदर्भ में
राजस्थानी और
पहाड़ी शैलियाँ
दो प्रमुख
शैलीगत
प्रवृत्तियाँ
हैं, जिनमें
कृष्ण की छवि
भिन्न सौंदर्यबोध,
रंग योजना
और
सांस्कृतिक
दृष्टिकोण के
साथ चित्रित
होती है।
राजस्थानी
लघुचित्र
शैली 16वीं
शताब्दी से 19वीं
शताब्दी के
मध्य
राजस्थान के
विभिन्न राज्यों
जैसे-मेवाड़,
बूंदी,
कोटा,
जयपुर,
बीकानेर
एवं किशनगढ़
आदि
केन्द्रों
में विकसित
हुई। इस शैली
में वल्लभ
संप्रदाय का
प्रभाव
अत्यधिक रहा,
जिसके
कारण
श्रीकृष्ण की
प्रेम-लीलाओं
एवं श्रीनाथजी
के रूप को
केंद्रीय
विषय के रूप
में अपनाया
गया। वहीं
दूसरी ओर
पहाड़ी शैली
मुख्यतः
हिमाचल
प्रदेश के
कांगड़ा, गढ़वाल,
बसोहली,
चंबा आदि
क्षेत्रों
में 17वीं
शताब्दी के
उत्तरार्ध से
लेकर 19वीं
शताब्दी तक
फली-फूली।
यहाँ कृष्ण को
भक्ति और
सौन्दर्य के
माध्यम से
चित्रित किया
गया। इस शैली
में
गीतगोविंद
एवं
रसिकप्रिया
जैसे
भावप्रकाश
काव्य
ग्रंथों पर
आधारित कृष्ण-छवि
का चित्रण
पहाड़ी शैली का
आधार बना।2
विषयगत
विश्लेषण
भारतीय
चित्रकला की
विविधतापूर्ण
परंपरा में
भगवान
श्रीकृष्ण एक
अत्यंत
लोकप्रिय और सशक्त
नायक हैं। वे
बाल स्वरूप की
लीलाओं से लेकर
युवा अवस्था
में गोपियों
संग रास रचैया,
राधा के
प्रियतम, भावनात्मक
प्रेमी, भक्ति का
केन्द्र, आदर्श
राजा
और
धर्मस्थापक
आदि रूप में
विविध भावों
में चित्रित
किए गए हैं।
कृष्ण केवल एक
पौराणिक
चरित्र नहीं
हैं, वे
अध्यात्मिक
प्रेम के
प्रतीक हैं।
उनकी छवि
लोकाचार में
बसे हुए नायक
की भाँति है,
जो कभी
शृंगारी व
चंचल बालक,
तो कभी
धर्मस्थापक व
राजस्व की है।
अतएव कृष्ण की
छवि विशेष रूप
से भक्तिमूलक
और
सौंदर्य-संवेदनशीलता
से युक्त पाई
जाती है।
पहाड़ी शैली
में कृष्ण की
छवि अत्यंत ही
भावुक, कोमल और
आत्मीय नायक
के रूप में
चित्रित हैं,
जो मनुष्य
के हृदय में
प्रेम और
भक्ति का संचार
करते हैं। इस
प्रकार कृष्ण
एक ऐसे नायक
हैं, जिनकी
छवि समय, समाज और
संस्कृति के
साथ विविध
रूपों में चित्रित
होती रही है।
अनेकानेक
लीलाओं से
परिपूर्ण
उनके
जीवन-चरित्र
ने कवियों और
चित्रकारों
को
शताब्दियों
तक प्रेरित
किया है।
विशेषकर
राजस्थानी
लघुचित्र
शैली में
कृष्ण की छवि
ने शृंगार,
भक्ति,
प्रेम,
विरह,
और
लोकसंस्कृति
के आयामों को
समेटते हुए
चित्रकला को
गहन
सांस्कृतिक अर्थवत्ता
प्रदान की है।
वहीं पहाड़ी
लघुचित्र
शैली, जिसमें
सौंदर्य, भक्ति और
प्रकृति का
अद्वितीय
समन्वय मिलता है।
इस शैली में
भगवान कृष्ण
की छवि को एक
आत्मीय, करुणामयी,
और
भावनात्मक
रूप में
चित्रित किया
गया है। यहाँ
वे केवल एक
धार्मिक
चरित्र नहीं,
बल्कि एक
ऐसे प्रियतम,
एक ऐसे
आत्मबोध के
प्रतीक हैं जो
मानव भावनाओं
के हर स्तर को
स्पर्श करते
हैं। इन
लघुचित्रों
में कृष्ण की
छवि का
कलात्मक, शैलीगत,
और
सांस्कृतिक
दृष्टि से
विवेचन ही
उनके महत्व को
स्पष्ट करता
है।3
हालाँकि
कृष्णलीला से
सम्बन्धित दो
महत्वपूर्ण
ग्रन्थों
श्रीमद्भागवत
महापुराण एवं जयदेव
विरचित
गीतगोविन्द
के नयनाभिराम
लघुचित्रों
में कृष्ण का
बाल-लीला
चित्रण, वंशी की
मोहिनी तान,
कालिया
मर्दन, गोवर्धन
धारण, राधा और
गोपियों के
विविध प्रेम
प्रसंगों को यहाँ
के
चित्रकारों
ने
चित्रांकित
करने में अभूतपूर्व
तन्मयता, दक्षता
एवं कला की
उदात्त गहनता
का परिचय दिया
है। निश्चित
रूप से कृष्ण
छवियों में
चित्रकार
अपने मूल
विचार की
भावभूमि को
सुरक्षित रखते
हुए यहाँ उनका
नया एवं
विस्तृत
संशोधित रूप
प्रस्तुत
करतेहै, जिसमें
चित्रभाषा को
और अधिक
प्रभावशाली,
शोधपरक
एवं
प्रवाहपूर्ण
बनाने का
प्रयास किया
गया है।
कृष्ण
छवि की
चित्रोपयोगिता
का विस्तृत
एवं तुलनात्मक
अध्ययन
श्रीकृष्ण
के चरित्र का
चित्रकला में
अनुपम स्थान
है,
जिसका मूल
कारण उनकी छवि
की सघन
भावात्मकता,
दृश्यात्मक
समृद्धि और
जनमानस में
व्याप्त उनकी
गहरी आस्था
है। निम्नवत
चित्रांकनों
के विवेचन से
यह स्पष्ट
होता है कि
कृष्ण न केवल
एक धार्मिक या
पौराणिक
पात्र हैं,
बल्कि
चित्रकला के
लिए एक अत्यंत
उपयोगी और समृद्ध
विषय भी हैं।
चित्रकारों
ने कृष्ण की अत्यंत
प्रभावशाली
छवि को अपनी
कला और भक्ति
का केन्द्र
बनाया है। यह
छवि सगुण
भक्ति की मूर्त
परंपरा से
अनुप्राणित
होकर मनोहारी
सौंदर्य की
संवाहक बन
जाती है, जो जनमानस
को सहज ही
आकर्षित करती
है।4
राजस्थानी
और पहाड़ी
शैलियों में
कृष्ण का चित्रण
न केवल भक्ति
की
अभिव्यक्ति
है,
बल्कि
प्रत्येक
शैली की
सांस्कृतिक,
क्षेत्रीय
और
सौंदर्यपरक
विशेषताओं का
भी प्रतिबिंब
है। इन दोनों
शैलियों में
कृष्ण के चित्रण
में समानताएँ
और भिन्नताएँ
दोनों ही दृष्टिगोचर
होती हैं,
जो इस
तुलनात्मक
विश्लेषण का
आधार बनती
हैं। एक ओर
राजस्थानी
शैली की कृष्ण
छवि में उत्सव,
शक्ति,
दृश्य
वैभव है, वही दूसरी
ओर पहाड़ी शैली
की कृष्ण छवि
में शृंगार,
प्रकृति,
भावुकता,
लय का
अद्भुत
समन्वय है।5
राजस्थानी
शैली में
कृष्ण छवि को
प्रायः गहरे
नील वर्ण में
चित्रित किया
जाता है। उनका
रूप शक्तिशाली,
नायक-सदृश
और
प्रभुत्वशाली
होता है।
वस्त्र, मुकुट और
आभूषणों में
लाल, सुनहरा
और गाढ़े रंगों
का प्रयोग
किया जाता है।
कुछ इसी
प्रकार के रूप
का प्रयोग
बसोहली शैली
की कृष्ण छवि
में भी
दृष्टिगत है।
परन्तु पहाड़ी
शैली की अन्य
उप शैलियों
में कृष्ण का
स्वरूप अधिक
कोमल, सौम्य और
कांतिमय होता
है। रंगों में
हल्के नीले,
हरे, गुलाबी,
पीले तथा
प्राकृतिक
रंगों का
उपयोग किया
जाता है, जिससे एक
भावनात्मक और
लयात्मक
सौंदर्य की अनुभूति
होती है।
कृष्ण
संबंधित
चित्रों में राधा,
गोपियाँ,
यशोदा,
नन्द,
बलराम आदि
पात्रों की
उपस्थिति ‘आलम्बन’
के रूप में
दृष्टिगत
होती है, जबकि
यमुनातट, वंशीवट,
निकुंज,
वृन्दावन
की
कुंजगलियाँ,
गोकुल-वृन्दावन
का ग्राम्य
वातावरण आदि
‘उद्दीपक’
तत्त्वों के
रूप में कार्य
करते हैं। इन
समस्त
तत्त्वों का
सामूहिक
प्रभाव कृष्ण
चित्रण को
अत्यंत
प्राणवान बना
देता है।6
कृष्णचरित्र
की सबसे बड़ी
विशेषता
पहाड़ी शैली के
लघुचित्रों
में यह है कि
उसमें हाव-भाव,
मुद्राएँ
और अनुभावों
की इतनी
विविधता और सूक्ष्मता
है,
जो किसी
अन्य चरित्र
में दुर्लभ
है। उनके प्रेम,
बाल्यलीलाएँ,
रासलीला,
माखनचोरी,
गोवर्धनधारण,
कालिया
मर्दन आदि
प्रसंगों में
ऐसे असंख्य दृश्य
हैं जिन्हें
चित्र के
माध्यम से
अत्यंत प्रभावपूर्ण
ढंग से व्यक्त
किया जा सकता
है। चित्रण की
सीमा रेखाएँ
जहाँ अन्य
विषयों को बाधित
करती हैं,
वहीं
कृष्णचरित्र
अनुभावों की
बहुलता के कारण
उन सीमाओं को
लांघ जाता है
और चित्रकार
को एक व्यापक दृश्यात्मक
आयाम प्रदान
करता है।
इन
दोनों ही
शैलियों में
चित्रकारों
ने ‘आलम्बन’ और
‘उद्दीपन’ को
दृश्यात्मकता
के माध्यम से
भावों की
गहराई तक
पहुँचाने का
कार्य किया है,
जिसमें
कृष्ण की छवि
को सबसे अधिक
चित्रोपयोगी
माना गया है।
साथ ही, कृष्णभक्त
कवियों की
रचनाओं ने
चित्रकारों को
विषयवस्तु
एवं सौंदर्य
दृष्टि
प्रदान की।
भक्तिकाव्य
में निहित
भावनात्मक
गहनता, माधुर्य
रस की कोमलता
और सगुण भक्ति
की साकारता ने
चित्रकला को
एक स्थायी
प्रेरणा दी।
राजस्थानी
लघुचित्रों
की पृष्ठभूमि
अपेक्षाकृत
संगठित, योजनाबद्ध
और सीमित होती
है। शृंगारिक
तत्त्व, प्रकृति,
वृक्ष,
भवन, दरबार आदि
को प्रतीक रूप
में दिखाया
जाता है। कृष्ण
की आकृति
प्रकृति अधिक
अमूर्त
प्रतीत होती
है। पहाड़ी
लघुचित्रों
में
राधा-कृष्ण के
साथ प्रकृति
का अत्यंत
मर्मस्पर्शी
और जीवंत
चित्रण होता
है। वन, नदी, पुष्प,
पर्वत,
बादल आदि
में कृष्ण और
राधा के भाव
एकाकार हो जाते
हैं, जिससे
चित्र कविता
जैसे प्रतीत
होते हैं।7
काव्य
और चित्रकला
के इस
अन्तःसंबंध
ने कृष्ण की
छवि को कला के
विभिन्न
माध्यमों में
चिरंजीवी बना
दिया। कवियों
द्वारा
वर्णित कृष्ण का
रूप ही बाद के
चित्रकारों
के लिए आदर्श
रूप में
स्वीकृत हुआ।
चित्रशैली
में भी उन्हीं
रूपों और
लीलाओं की
प्रधानता रही,
जिन्हें
साहित्य में
व्यापक
स्वीकृति
मिली थी। सगुण
भक्ति की
सरलता और मधुर
भावनाओं की प्रधानता
ने चित्रकला
को विस्तार
देने का कार्य
किया। इस
प्रकार
राजस्थानी
शैली की कृष्ण
छवि में
रेखांकन तेज,
स्पष्ट और
दृढ़ होता है।
चित्रों में
सामूहिकता,
गति और
भव्यता
प्रमुख होती
है। वही पहाड़ी
शैली में
कृष्ण रूप में
रेखाएँ मुलायम,
प्रवाही
और लयपूर्ण
होती हैं।
चित्रों में एकांत,
माधुर्य
और
संगीतात्मक
सौंदर्य पर बल
होता है।
सामान्यतः
धार्मिक
आचार्यों तथा
समाज में व्याप्त
सगुण भक्ति की
प्रवृत्तियों
ने भी चित्रकला
को प्रेरित
किया। जहाँ
निर्गुण भक्ति
में अमूर्तता
और निराकार
चिंतन की
प्रवृत्ति थी,
वहीं सगुण
भक्ति में
मूर्तिमत्ता,
दृश्यता
और
रूप-संवेदना
को प्रधानता
मिली, जिससे
चित्रांकन को
मान्यता और
प्रश्रय मिला।
इसीलिए
चित्रों में
कृष्ण के
विविध रूपों और
लीलाओं का
चित्रण अधिक
हुआ।
मध्यकालीन भारतीय
चित्रकला,
विशेषतः
राजस्थानी और
पहाड़ी
लघुचित्र
परंपराएँ,
कृष्ण के
विविध भावों,
लीलाओं और
रूपों से
पूर्णतः
समृद्ध हैं।
चाहे वह
रासलीला हो,
राधा-कृष्ण
की संयोग या
वियोग की
भावभूमि हो,
बालकृष्ण
की लीलाएँ हों
या यशोदा के
वात्सल्य भाव
हों, इन
सबने
चित्रकारों
को एक विराट
कल्पनालोक और
अभिव्यक्ति
का अद्भुत
अवसर प्रदान
किया।
यद्यपि
राजस्थानी और
पहाड़ी
लघुचित्र
परंपराओं में
कृष्ण की छवि
विशिष्ट
प्रतीकात्मकता,
रंग
प्रयोग और
भावाभिव्यक्ति
के माध्यम से
अभिव्यक्त
होती है।
दोनों
शैलियों में
कृष्ण लीला का
चित्रण भिन्न
दृष्टिकोणों
से हुआ है,
जहाँ
प्रत्यक्ष और
अप्रत्यक्ष
प्रतीकों का गहन
प्रयोग दिखाई
देता है।
प्रत्यक्ष
एवं
अप्रत्यक्ष
प्रतीक
राजस्थानी
शैली में
कृष्ण की
पहचान उनके
गहरे नीले
वर्ण, मोर मुकुट,
वैजयंती
माला और
पीताम्बर
वस्त्र से
होती है। ये
तत्व उनके
दिव्य स्वरूप
और
वीर-पुरुषत्व का
प्रत्यक्ष
संकेत देते
हैं। वहीं,
पहाड़ी
शैली में
कृष्ण की छवि
को प्रकृति के
आलंबन में
अधिक सूक्ष्म
रूप से
दर्शाया गया
है। वृक्षों
की लचक, मेघों की
आकृति, और जलधारा
की गति
अप्रत्यक्ष
रूप से उनके
प्रेम और
माधुर्य भाव
को व्यक्त
करते हैं,
परन्तु
यहाँ भी
बसोहली शैली
की आकृतियाँ
राजस्थानी
शैली के
निकटतम हैं।
रंग
प्रयोग:
राजस्थानी
शैली में सूचक
रंगों का
प्रयोग गाढ़ा
और तीव्र है-
गहरे लाल,
पीले और
नीले रंग के
विपरीत
संयोजन से
चित्रों में
उत्साह और
ऊर्जा का
संचार होता है,
यह प्रभाव
बसोहली शैली
में भी
दृष्टिगत है।
इसके विपरीत,
पहाड़ी
चित्रों में
कोमल और
पारदर्शी
रंगों का
प्रयोग
प्रमुख है,
जो
प्राकृति के
साथ सामंजस्य
और शांत भाव
का संकेत करता
है। हरे-नीले
रंगों की
सघनता से पर्वतीय
वातावरण का
अहसास कराते
हुए कृष्ण को
रसमय और कोमल
रूप में
चित्रित किया
गया है।8
भावाभिव्यक्ति
एवं
परिप्रेक्ष्य:
राजस्थानी
शैली में
रेखाएँ
स्पष्ट और
कठोर हैं,
जिससे
वीरता, शक्ति और
नाटकीयता
प्रकट होती
है। आकृतियों का
अनुपात स्थूल
होते हुए भी
सज्जित
आभूषणों और
वस्त्रों से
भव्यता को
बढ़ाता है।
इसके विपरीत,
पहाड़ी
चित्रों में
रेखाएँ कोमल
और लचीली हैं,
जिनसे
लावण्य और
रसाानुभूति
प्रकट होती
है। यहाँ
परिप्रेक्ष्य
में गहराई के
लिए परिदृश्य
का विस्तार और
धुंधले
पहाड़ों व
पारंपरिक ग्रामीण
आवास का
क्रमिक
संयोजन दिखाई
देता है।
सांस्कृतिक
विशिष्टताएँ: राजस्थानी
शैली का
चित्रण शौर्य,
वल्लभ
संप्रदाय का
राजसी वैभव और
मरुस्थलीय परिवेश
से प्रेरित
है। इसके
विपरीत, पहाड़ी
शैली भक्ति,
प्रकृति
और सौम्यता की
संवेदनाओं से
ओतप्रोत है,
जहाँ
कृष्ण
रागात्मक और
कोमल हृदय के
प्रतीक रूप
में उभरते
हैं। अतः
दोनों
शैलियों में
कृष्ण छवि के
माध्यम से न
केवल धार्मिक
भावनाएँ, बल्कि
क्षेत्रीय
संस्कृति,
प्रकृति
और सौंदर्य
दृष्टि का
अद्वितीय संगम
दिखाई देता
है।
चित्रात्मक
अवलोकन: प्रस्तुत
दोनों चित्र 1 और चित्र 2 भारतीय
लघुचित्र
परंपरा के
अंतर्गत
निर्मित हैं
तथा भगवान
श्रीकृष्ण की
लीलाओं को
केंद्र में
रखते हैं,
किंतु
उनकी शैली,
रचना,
भावाभिव्यक्ति
और रंग योजना
में स्पष्ट
अंतर
दृष्टिगत
होता है। चित्र 1
(कृष्ण की
गोवर्धन
पर्वत धारण
लीला) बीकानेर
शैली का अनुपम
उदाहरण है।
इसमें कृष्ण
को केंद्रीय
आकृति के रूप
में दर्शाया
गया है, जो अपनी
छोटी उंगुली
पर गोवर्धन
पर्वत उठाए हुए
खड़े हैं। उनका
नीला शरीर,
पीताम्बर
वस्त्र और
रत्नजटित
मुकुट उनकी दिव्यता
और सामर्थ्य
को रेखांकित
करते हैं। उनके
चेहरे पर
करुणा और
आत्मविश्वास
का अद्भुत समन्वय
ब्रजवासियों
के रक्षक
स्वरूप को स्पष्ट
करता है।
पृष्ठभूमि
में बादल और
हरियाली इंद्र
के प्रकोप एवं
प्रकृति की
सजीवता का संकेत
देते हैं। इस
चित्र में
आकृतियों का
सूक्ष्म
रेखांकन, गहरे रंगों
का प्रयोग,
शास्त्रीय
अलंकरण और
सघनता
बीकानेर शैली
की विशेषताओं
को उजागर करता
है। रचना में
स्थिरता और
संतुलन है,
जो
सामूहिक
सुरक्षा और
आश्रय का भाव
प्रकट करती
है।
|
चित्र 1
|
|
चित्र 1 भागवत
पुराण- कृष्ण
की गोवर्धन
पर्वत धारण
लीला, बीकानेर
शैली, वर्ष- 1690, चित्रकार-
उस्ताद
साहिबदीन, संग्रह
स्रोत-
ब्रिटिश
म्यूजियम, लंदन। |
|
चित्र 2 |
|
|
|
चित्र 2 भागवत
पुराण-
कालिया
मर्दन, कालिया की
पत्नियाँ
अपने पति नाग
कालिया को मुक्त
करने के लिए
कृष्ण से
प्रार्थना
करते हुए, कांगड़ा
शैली, वर्ष- 1785, संग्रह
स्रोत-
राष्ट्रीय
संग्रहालय, नई दिल्ली। |
दूसरी
ओर,
चित्र 2 (कालिया
मर्दन लीला)
कांगड़ा शैली
की कोमलता,
लयात्मकता
और
भावप्रवणता
का श्रेष्ठ
उदाहरण है।
इसमें कृष्ण
को यमुना में
नागराज के फन पर
संतुलित
नृत्य की
मुद्रा में
दिखाया गया है।
उनकी शांत और
निर्भीक
मुद्रा दैवी
सामथ्र्य और
संतुलन का
प्रतीक है।
वृक्षों की
शाखाओं पर रखे
मुकुट और
वस्त्र उनकी
बालसुलभता को
दर्शाते हैं।
नागराज के
फनों की ऐंठन
और पीड़ा, नाग
पत्नियों की
शरणागत
मुद्राएँ तथा
कमल पुष्प का
अर्पण चित्र
में दया, क्षमा और
भक्तिभाव का
वातावरण रचते
हैं। पृष्ठभूमि
में वृक्षों
की हरियाली,
जल की
तरंगें और
नीली-हरित
छाया
प्राकृतिक
सौंदर्य और लय
का संचार करती
हैं। कांगड़ा
शैली की
विशिष्टताओं,
कोमल
रेखांकन, भावपूर्ण
मुखाकृतियाँ,
स्वाभाविक
रंग योजना और
नारी
आकृतियों की
कोमलता का
यहाँ
उत्कृष्ट
प्रदर्शन हुआ
है।
तुलनात्मक
दृष्टि से,
बीकानेर
शैली का चित्र
शास्त्रीय
गरिमा, अलंकरण और
स्थिरता का
प्रतीक है,
जिसमें
सामूहिक
सुरक्षा और
शक्ति का भाव
विद्यमान है।
जबकि कांगड़ा
शैली का चित्र
गति, लयात्मकता
और
भावनात्मकता
से युक्त है,
जो
भक्तिभाव,
दया और
करुणा को
अभिव्यक्त
करता है। एक
ओर बीकानेर
शौली के चित्र
में कृष्ण की
छवि अद्वितीय
बल,
राजसी
सौंदर्य और
अलंकरण की
परंपरा का
प्रतिनिधित्व
करती है, वहीं
दूसरी ओर
कांगड़ा चित्र
प्रकृति, कोमलता और
मनोवैज्ञानिक
गहराई का बोध
कराता है।
निष्कर्षतः
दोनों चित्र
भारतीय
लघुचित्र
परंपरा की विविधता
और समृद्धि का
दर्पण हैं। इस
प्रकार एक में
शक्ति और
संरक्षण का
आदर्श, तो दूसरे
में साहस,
दया और
सौंदर्य का
अद्भुत संगम
दृष्टिगत होता
है।
अन्य
चित्रों को
देखें तो चित्र 3 और
चित्र 4 रासलीला
विषयक दृश्य
से संबंधित
हैं तथा मेवाड़
व बसोहली शैली
की लघुचित्र
परंपरा की
शैलीगत
विशेषताओं की
कुछेक
भिन्नताओं को
दर्शाते हैं,
किंतु एक
ही भाव, रचना और
रंग योजना लिए
हुए हैं। चित्र 3
(राधा की
मधुर हंसी और
कृष्ण की
रासलीला)
मेवाड़ शैली से
समृद्ध है,
जिसे दो
खंडों में
विभाजित किया
है-ऊपरी भाग में
वृक्ष के नीचे
श्रीकृष्ण और
राधा का नयनाभिराम
तथा गोपी
द्वारा कृष्ण
को राधा का
संदेश-संवाद
देते दर्शाया
गया है, इसीलिए
दूर होते हुए
भी यह दृश्य
राधा-कृष्ण के
आत्मिक एकत्व
का प्रतीक है।
जबकि निचले
भाग में कृष्ण
और गोपियों की
रास नृत्य की
लयात्मकता को
प्रस्तुत
किया गया है।
चित्र में
मेवाड़ शैली की
दृढ़ रेखाएँ,
गाढ़े
रंगों का
संतुलित
विकास सूचक
प्रयोग, और
सौंदर्यपूर्ण
भाव-व्यंजना
देखने को मिलती
है। इस चित्र
में माधुर्य,
लय और
रसात्मकता
समाहित है।
इसके विपरीत चित्र 4 (रास में
रमे श्याम:
सखी की राधा
से शिकायत) के
दाहिनी ओर
श्रीकृष्ण
गोपियों के
आलिंगन में हैं,
जो उनकी
रास
अभिव्यक्ति
और शृंगार को
व्यक्त करते
हैं, वहीं
चित्र के
बायीं ओर सखी
अपनी प्रिय
राधिका को
कृष्ण की तरफ
संकेत देते
हुए, उनकी
रासलीला का
वर्णन कर रही
है। पीली
पृष्ठभूमि,
सीमित
प्रकृति और
स्थिर
आकृतियाँ इसे
बसोहली या
प्रारंभिक
पहाड़ी शैली की
ओर इंगित करती
हैं। दोनों
चित्रों में
कृष्ण केंद्र
में हैं- एक
में रास के
नायक, दूसरे में
प्रेम के
आलंबन रूप
में। ये चित्र
राधाकृष्ण
प्रेम के
विविध भावों
और रसों को सजीव
रूप में
प्रस्तुत
करते हैं।
अतएव एक
दृष्टिकोण से
देखा जाए तो
मेवाड़ और
बसोहली
शैलियों में
आकृतियों की
संरचना एवं
संकेतात्मक
रंग संयोजन
में
उल्लेखनीय
समानताएँ
दृष्टिगोचर
होती हैं।
विशेष रूप से,
श्रीकृष्ण
की आकृति
दोनों ही
शैलियों में
गहरे नीले रंग
में चित्रित
की गई है, जो उनके
दैवी स्वरूप
और विशिष्टता
को रेखांकित
करती हैं।
|
चित्र 3
|
|
चित्र 3 रसिकप्रिया-
राधा की मधुर
हँसी और
कृष्ण की रासलीला, मेवाड़ शैली, वर्ष- 1630-35, चित्रकार-
साहिबदीन, संग्रह
स्रोत-
राजकीय
संग्रहालय, उदयपुर। |
|
चित्र 4
|
|
चित्र 4 गीत
गोविंद- रास
में रमे
श्यामः सखी
की राधा से
शिकायत, बसोहली
शैली, वर्ष- 1730-35, चित्रकार-
मनकू, संग्रह
स्रोत-
विक्टोरिया
और अल्बर्ट
संग्रहालय, लंदनध्ब्रिजमैन
आर्ट
लाइब्रेरी, लंदनध्न्यूयॉर्क। |
प्रस्तुत
दोनों चित्र 5 और
चित्र 6 भगवान
श्रीकृष्ण की
लीलाओं को
केंद्र में रखते
हुए विभिन्न
शैलीगत एवं
भावात्मक
विशेषताओं को
प्रकट करते
हैं। चित्र 5
(कृष्ण की
वस्त्रहरण
लीला) बीकानेर
शैली का उत्कृष्ट
उदाहरण है,
जिसमें
श्रीकृष्ण
वृक्ष की डाल
पर बैठकर गोपियों
के वस्त्र
चुराए हुए
हैं। यह
प्रसंग शृंगारिक
माधुर्य और
हास्य के
भावों से
ओत-प्रोत है।
गोपियाँ
सरोवर में
स्नान के
पश्चात् जल से
बाहर निकलने
हेतु लज्जा और
संकोच में
कृष्ण से
अनुनय कर रही
हैं, कुछ
गोपियाँ
वृक्षों के
पीछे लज्जावश
छिपती हुई भी
दर्शाई गई
हैं।
पृष्ठभूमि
में गुलाबी पहाड़ियाँ,
वृक्ष,
पक्षी,
गौएँ और
हल्का नीला
आकाश एक
अलौकिक, रमणीय
वातावरण
निर्मित करते
हैं। रेखांकन
अत्यंत
सूक्ष्म है,
विशेषकर वृक्षों,
गोपियों
के केश और
वस्त्रों
में। रंग
योजना कोमल और
संयत है- हरा,
गुलाबी और
नीले का सुंदर
सामंजस्य
दृश्य को माधुर्य
प्रदान करता
है।
भावाभिव्यक्ति
में कृष्ण के
मुख पर हास्य और
शरारत, गोपियों
के मुख पर
लज्जा और विनय
स्पष्ट है,
जिससे
चित्र में
नाटकीयता और
सौंदर्य का
अद्भुत
संतुलन
दृष्टिगत
होता है।
|
चित्र 5
|
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चित्र 5 भागवत
पुराण- कृष्ण
की
वस्त्रहरण
लीला, बीकानेर
शैली, वर्ष- 1690-1700, संग्रह
स्रोत- आर्थर
एम. सैकलर
गैलरी, कैथरीन
ग्लिन
बेनकेम से
आंशिक उपहार
और खरीदा
गया। |
|
चित्र 6
|
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चित्र 6 भागवत
पुराण- नटखट
श्रीकृष्ण
की माखनचोर
लीला, बसोहली
शैली, वर्ष- 1750, संग्रह
स्रोत- एन.सी.
मेहता
कलेक्शन, अहमदाबाद, गुजरात, भारत। |
इसके
विपरीत, चित्र 6 (नटखट
कृष्ण की माखन
चोरी लीला)
बसोहली शैली
की बाल-सुलभ
चंचलता और
ग्रामीण जीवन
की सहजता को
अभिव्यक्त
करता है।
इसमें
बालकृष्ण
अपने सखाओं के
कंधों पर चढ़कर
मटकी से माखन
निकाल रहे हैं।
उनके चेहरे पर
विजय और आनंद
का भाव, साथ में
माखन का स्वाद
लेते बंदर का
चित्रण हास्य
और जीवंतता को
बढ़ाता है।
पृष्ठभूमि
में यशोदा का
कक्ष और
स्थापत्य
चित्र में
गहराई लाता
है। रंग योजना
में लाल, पीला,
नीला और
हरा जैसे
प्रबल
पारंपरिक
रंगों का प्रयोग
है,
जो चित्र
को लोकजीवन की
ऊर्जा और
उल्लास से भर
देता है।
परिणामस्वरुप
बीकानेर शैली
का वस्त्रहरण
चित्र अलंकरण,
कोमल
रंगों और
माधुर्यपूर्ण
भावाभिव्यक्ति
से युक्त है,
जबकि
पहाड़ी शैली का
माखन चोरी
चित्र
बालसुलभ कौतुहल,
गतिशीलता
और लोकसुलभ
हास्य को
प्रस्तुत करता
है। एक ओर
बीकानेर
चित्र में
नाटकीय
शृंगारिकता
और
आध्यात्मिक
माधुर्य है,
तो दूसरी
ओर पहाड़ी
चित्र में
सहजता, हास्य और
जीवन की
ऊष्मा
है। दोनों
मिलकर कृष्ण
लीलाओं की
विविधता और
भारतीय लघुचित्र
परंपरा की
शैलीगत
समृद्धि को
अभिव्यक्त करते
हैं।
निष्कर्ष
राजस्थानी और पहाड़ी शैलियों में कृष्ण का चित्रण न केवल भक्ति की अभिव्यक्ति है, बल्कि प्रत्येक शैली की सांस्कृतिक, क्षेत्रीय और सौंदर्यपरक विशेषताओं का भी प्रतिबिंब है। इन दोनों शैलियों में कृष्ण के चित्रण में समानताएँ और भिन्नताएँ दोनों ही दृष्टिगोचर होती हैं, जो इस तुलनात्मक विश्लेषण का आधार बनी हैं। कृष्ण की छवि एक सजीव, माधुर्यपूर्ण और भावात्मक चरित्र के रूप में चित्रकला में सर्वाधिक चित्रित और सराहनीय बनकर उभरी है। उनकी लीलाओं की विविधता, भावों की गहराई, लोकानुराग और भक्तिकाव्य से प्राप्त प्रेरणा ने उन्हें चित्रोपयोगिता की दृष्टि से सर्वोच्च स्थान प्रदान किया है। यही कारण है कि भारतीय लघुचित्र परंपरा, विशेष रूप से राजस्थानी और पहाड़ी शैलियों में, कृष्ण की छवियाँ आज भी दर्शकों को आत्मिक सौंदर्य और सांस्कृतिक गौरव का अनुभव कराती हैं।
REFERENCES
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Poetry and Music (भारतीय
चित्रकला,
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of Indian Painting: Medieval Part II (भारतीय
चित्रकला का इतिहास:
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भाग–2).
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Dwivedi, P. S. (2006). Rajasthani
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Beauty in Pahari Painting (पहाड़ी
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सौन्दर्य). Swati Publications, 77.
Vaidya, K., and Handa, O. (1969). Pahari Painting (पहाड़ी चित्रकला). National Publishing House, 45.
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