THE
REVOLUTION OF COMMUNICATION MEDIA IN THE PRESERVATION AND PROMOTION OF MUSIC: A
CRITICAL PERSPECTIVE
संगीत के संरक्षण तथा संवर्धन में संचार माध्यमों की क्रान्तिः एक समीक्षात्मक दृष्टि
1 Associate Professor, Department of Music (Vocal), Aacharya Narendra Dev Nagar Nigam Mahila Mahavidyalaya, Kanpur, India
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ABSTRACT |
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English: Today, music
lovers and connoisseurs across the entire world have acknowledged the eternal
nature, spirituality, and excellence of Indian music. While, on one hand, the
Government of India has taken various policy-related, financial, and cultural
measures to popularize Indian music globally—thereby providing a platform for
Indian musicians on the world stage—on the other hand, the contribution of
diverse communication media in this field must be unequivocally acknowledged.
This is because the modern technologies currently being utilized within the
realm of communication media have transformed Indian music into an integral
part of 'global music.' These communication media—including print media,
electronic media, digital media, and others—have brought about a revolution
in the preservation and promotion of music. Years ago, this very music was the exclusive monopoly of a select few *Gharana*-based artists and musicians, as they imparted their musical knowledge solely to their own sons, grandsons, family members, and a handful of chosen disciples. In that era, due to the absence of technologies such as the gramophone, we were unable to preserve their artistic legacy. Consequently, it was not uncommon for the musical heritage of certain childless musicians to vanish forever with their passing. Even after the advent of the gramophone, some traditionalist musicians remained averse to the idea of recording their music; however, many artists subsequently consented to do so—a decision that enables us to continue listening to their music even after their demise. Today, thanks to the revolution in communication media, the general public can easily access knowledge regarding both the practical and theoretical aspects of music. In this research paper, I have undertaken a critical study of the status of music—both prior to and following the advent of communication media—and the impact exerted upon it. Specifically, I have examined when and by which inventions our music was influenced, and how these communication media have served to preserve and enrich our musical heritage. Hindi: आज सम्पूर्ण विश्व के संगीत प्रेमी तथा संगीत-मर्मज्ञ भारतीय संगीत के शाश्वत स्वरूप, उसकी आध्यात्मिकता एवं उत्कृष्टता को स्वीकार कर चुके हैं। विश्व में भारतीय संगीत को लोकप्रिय बनाने में जहाँ एक ओर भारत सरकार ने कई नीतिगत, वित्तीय व सांस्कृतिक कदम उठाये है, जिससे भारतीय संगीतज्ञों को विश्व पटल पर मंच प्रदान किये जा सकें, वहीं दूसरी ओर इस क्षेत्र में विविध संचार माध्यमों के योगदान को आवश्यक रूप से स्वीकार करना ही होगा क्योंकि आज संचार माध्यमों के अन्तर्गत जो भी आधुनिक तकनीकी का प्रयोग हो रहा है उससे भारतीय संगीत ‘वैश्विक संगीत’ का अभिन्न अंग बन चुका। इन संचार माध्यमों में प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रानिक मीडिया, डिजिटल मीडिया इत्यादि हैं जिन्होंने संगीत के सरक्षण तथा संवर्धन में क्रान्ति ला दी है। वह संगीत जिस पर आज से वर्षों पूर्व केवल कुछ घरानेदार कलाकारों व संगीतज्ञों का ही एकाधिकार था क्योंकि वे मात्र अपने पुत्र/पौत्रादि, कुटुम्बियों व कुछ गिने-चुने शिष्यों को ही संगीत सिखाते थे। उस समय ग्रामोफोन इत्यादि तकनीक न होने से, हम उनकी कला को संरक्षित नहीं कर पाते थे। यही कारण था कि कभी -कभी ऐसा भी होता था कि कुछ निःसंतान संगीतज्ञों के साथ, उनका संगीत भी चला जाता था। बाद में ग्रामोफोन के आने पर भी कुछ रुढिवादी संगीतज्ञ अपने संगीत को ध्वन्यांकिंत (Record) करने के पक्षधर नहीं थे, जबकि बाद में कई कलाकार इसके लिये सहमत हुये जिस वजह से हम उनके न रहने पर भी उनका संगीत सुन पाते हैं। आज संचार माध्यमों में आई क्रान्ति से संगीत के क्रियात्मक तथा शास्त्र पक्ष की जानकारी आम जनता को सहज ही प्राप्त हो जाती है। अपने इस शोध प्रपत्र में मैंने संचार माध्यम से पूर्व तथा बाद संगीत की स्थिति तथा उस पर पड़ने वाले प्रभाव का समीक्षात्मक अध्ययन किया है कि कब, कौन से आविष्कार से हमारा संगीत कितना प्रभावित हुआ और कैसे इन-संचार माध्यमो ने हमारे संगीत को संरक्षित तथा संवर्धित किया। |
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Received 07 June 2025 Accepted 08 July
2025 Published 31 August 2025 Corresponding Author Abdallah
Ahmed Adam Belal, a.belal@seu.edu.sa DOI 10.29121/granthaalayah.v13.i8.2025.6889 Funding: This research
received no specific grant from any funding agency in the public, commercial,
or not-for-profit sectors. Copyright: © 2025 The
Author(s). This work is licensed under a Creative Commons
Attribution 4.0 International License. With the
license CC-BY, authors retain the copyright, allowing anyone to download,
reuse, re-print, modify, distribute, and/or copy their contribution. The work
must be properly attributed to its author.
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Keywords: Indian Music, Print Media, Electronic
Media, Gramophone, भारतीय
संगीत, प्रिंट
मीडिया, इलेक्ट्रानिक
मीडिया, ग्रामोफोन |
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1. प्रस्तावना
आज भारतीय
शास्त्रीय
संगीत न केवल
भारत में वरन्
विश्व के
कोने-कोने में
सुना तथा
सराहा जा रहा
है तथा विदेशी, भारतीय
संगीत को
इसलिये नहीं
सुन तथा सीख
रहे कि वे
भारतीय
शास्त्रीय
संगीतज्ञ
बनना चाहते
हैं वरन् वे
अपने संगीत से
हमारे संगीत
की तुलना कर
रहे हैं, हमारे
संगीत में
अनुसंधान कर
रहे हैं तथा
उसके
सौन्दर्य, स्वर, राग, लय, ताल, भाव, संगीत
के सूक्ष्म
अलंकरणों से
प्रेरणा प्राप्त
कर पाश्चात्य
संगीत को नवीन
रूप प्रदान करना
चाहते हैं। आज
न केवल वे
भारतीय
कलाकारों को
अपने यहाँ
आमंत्रित कर
उन्हें मंच
प्रदान कर रहे
हैं तथा
सम्मानित कर
रहे हैं वरन, उनके
कार्यक्रम की
रिकार्डिग कर
उसे प्रसारित
कर व सुरक्षित
रख कर उससे
लाभ भी
प्राप्त कर
रहे हैं। वे
भारतीय संगीत
को नितान्त
सम्मान की दृष्टि
से देखते हैं।
विश्व भर में
भारतीय संगीत
का जो
प्रचार-प्रसार
हुआ है उसमें
आधुनिक संचार
माध्यमों की
अहम् भूमिका
रही है।
प्रारम्भ
के समय में
संगीत के
जीवन्त
कार्यक्रम जब
प्रस्तुत
किये जाते थे
तो श्रोता
कार्यक्रम के
प्रत्यक्ष
दर्शन व श्रवण
के माध्यम से
ही कार्यक्रम
का आनंद उठा
पाते थे यदि
वे किन्हीं
कारणवश
कार्यक्रम
सुनने अथवा
देखने नहीं जा
पाते थे तो
उनके पास
अफसोस करने के
सिवा और कोई
मार्ग नहीं रह
जाता था, क्योंकि
बाद में मौखिक
चर्चाओं का
बाज़ार गर्म
रहता था कि
अमुक
कार्यक्रम
में अमुक
कलाकार ने
उत्कृष्ट
कोटि का
गायन/वादन
किया या कोई
नवीन युवा
प्रतिभा
संगीताकाश
में चमकने के
लिये तैयार हो
रही है।
‘‘संचार-माध्यमों
के पूर्व यह
स्थिति
साहित्य-गोष्ठियों, विज्ञान-प्रदर्शनियों, नव-
अनुसंधान आदि
प्रत्येक
क्षेत्र में
एक समान थी।
जानकारियाँ, विचार-विनिमय-सम्बन्धित
रुचि वाले
वर्ग-समूह तक
ही सीमित रहते
थे। लेकिन
संचार -
माध्यमों के
विकास के साथ
ही समस्त
उपयोगी कलाओं
एवं अन्य
विषयों से
सम्बद्ध
धारणाओं के
प्रचार-प्रसार
का यथासम्भव
दायरा बढ़ा और
हर प्रकार के आयोजनों
की रिपोर्ट घर
बैठे आम आदमी
तक सहज रूप
में पहुंचने
लगी।’’1
आज हम यह
कह सकते हैं
कि भारत सरकार
के प्रयासों, कलाकारों
के व्यक्तिगत
प्रयासों
एवम् संचार
माध्यमों के
प्रचार-प्रसार
से विदेशों
में निःसन्देह
भारतीय संगीत
की
लोकप्रियता
बढ़ी है,
किन्तु
दुर्भाग्य का
विषय है कि
जितना सम्मान
हमारे
शास्त्रीय
संगीत तथा
संगीतज्ञों
का विदेशी
मीडिया तथा
पाश्चात्य
देश करते उसका
10
प्रतिशत भी
हमारे देश की
आम जनता नहीं
करती है।
उनमें
शास्त्रीय
संगीत को
सुनने का तनिक
धैर्य ही आ
जाये,
वही बहुत है।
आवश्यक यह
नहीं कि
प्रत्येक व्यक्ति
को संगीत के
शास्त्र पक्ष
का ज्ञान हो
जाये किन्तु
अन्य विषयों
की भांति वे
शास्त्रीय
संगीत के
सामान्य ज्ञान
से परिचित हों, इतनी
तो अपेक्षा की
ही जा सकती
है। संगीत
शिक्षिका
होने के नाते
यह मेरा
व्यक्तिगत
अनुभव रहा है
कि आम जनता
संगीत को
मात्र गजल, भजन, लोकगीत, सुगम
संगीत तथा
फिल्मी संगीत
तक ही सीमित
मानती है उनके
लिये यदि
शिक्षण
-संस्थाओं में
आप संगीत विषय
चुन रहे हैं
तो यह मात्र
एक प्रयोगात्मक
विषय है और
इससे इसमें
अच्छे अंक मिल
जायेंगे, जिससे
विद्याथियों
का ळतंकम सुधर
जायेगा। कुछ
गैर सांगीतिक
लोगों का
स्पष्ट कहना
होता है कि
संगीत में
करना ही क्या
होता है? मात्र ‘सा‘,‘सा’
ही तो करना
होता है, अत्यन्त
दुख का विषय
है कि वे
भारतीय
संस्कृति की
इस अमूल्य
धरोहर का
जाने-अनजाने
अपमान कर रहे
होते हैं
जिसके आगे
समस्त विश्व
के संगीतज्ञ
तथा संगीत
प्रेमी
नतमस्तक हैं।
दूसरा
मुख्य कारण आज
के दौर में
चित्रपट-संगीत
की चकाचैंध है, आज
जहाँ विदेशी
भारतीय संगीत
से प्रभावित
है, वहीं
भारतीय जनता
अपनी
संस्कृति को
भूलकर पाश्चात्य
संस्कृति के
रंग में रंगी
जा रही है।
यदि
प्रारम्भ की
स्थिति देखी
जाये तो वह
स्थिति
अत्यन्त विकट
थी, संगीत
पर कुछ एक
लोगों का ही
एकाधिकार था
किन्तु इन
संचार
माध्यमों की
अचानक आई
क्रान्ति ने
जनसामान्य को
शास्त्रीय
संगीत से
परिचित कराया।
‘‘प्रेस, जनसंचार
का एक प्रमुख
माध्यम है।
मुद्रित शब्द
को पढ़ना और
समझना सरल
होने के कारण
इसका महत्व और
प्रभाव अधिक
है। इसका मानस
पटल पर अधिक
स्थायी
प्रभाव पड़ता
है और संभवतः
इसीलिए मैकलुहान
ने इसे ‘गर्म
माध्यम’ का
नाम दिया है।’’2.
शास्त्रीय
संगीत के
प्रचार-प्रसार
में समाचार
पत्र की अहम्
भूमिका है।
भारत के कौन
से शहर में
कौन सा
सांगीतिक
समारोह तथा
सम्मेलन होने
जा रहा है
उसकी रूपरेखा, पूर्वसूचना, तिथि
तथा स्थान के
साथ प्रकाशित
होने से संगीत
प्रेमी
श्रोता
इन्हें देख
तथा सुन सकते
हैं।
कार्यक्रम के
उपरान्त इसकी
प्रेस
रिपोर्टिंग
भी की जाती
है। कभी-कभी
समाचार
पत्रों में
किन्हीं
संगीतकारों
के
साक्षात्कार
तथा संगीत
सम्बन्धी लेख
भी प्रकाशित
होते हैं।
‘‘संगीत से
सम्बन्धित
विषय जो
समाचार
पत्रों में छपते
हैं उन्हें
संगीत के
पुस्तकालयों
में संग्रहीत
किया जाता है।
इनके संग्रह
की नीति के
पीछे संस्थान
के
शोधार्थियों
को विषय से
सम्बन्धित
सूचनाएं
प्राप्त
कराना मुख्य
उद्देश्य होता
है। जो
पुस्तकालय इस
क्लिपिंग्ज
को संजोकर
रखते हैं, इन
क्लिपिंग्ज
पर उस
समाचार-पत्र
का नाम,
दिन,
दिनांक आदि
सूचनाएं
अंकित कर देते
हैं।’’3.
कुछ
प्रमुख
समाचार पत्र
जैसे दैनिक
जागरण,
अमर उजाला, नवभारत
टाइम्स,
टाइम्स ऑफ
इण्डिया, इत्यादि
के नाम लिये
जा सकते है जो
इस दिशा में
कार्यरत हैं।
किन्तु पिछले
कुछ वर्षों से
इन समाचार
पत्रों ने
अपने
दायित्वों के
निर्वहन से
मुँह मोड़ लिया
है। वे
पूर्णतः
व्यवसायिक हो
गये हैं। वे
यह भूल गये
हैं कि समाचार
पत्रों का
कार्य मात्र
समाचार देना
नहीं है वरन् हमारे
कला, संस्कृति
की रक्षा एवं
प्रचार-प्रसार
में सक्रिय
रूप से
सहभागिता
करना भी है।
समाचार
पत्रों के
अतिरिक्त
अन्य मुद्रित
माध्यमों के
अन्तर्गत
पत्र-पत्रिकायें
आती हैं जो कि
संगीत के
संरक्षण तया
संवर्धन में
महत्वपूर्ण
भूमिका निभा
रही हैं। ये
पत्रिकायें
मासिक,
त्रैमासिक, अर्धवार्षिक
तथा वार्षिक
अंकों में
प्रकाशित
होती हैं तथा
इनमें संगीत
सम्बन्धी
विविध लेख
एवम्
जानकारियाँ
संगीत के
शिक्षकों, विद्यार्थियों
तथा
शोधार्थियों
एवम् संगीत
प्रेमियों को
समय-समय पर
मिलती रहती
है। ‘‘भारत में
संगीत की पहली
मासिक
पत्रिका
दक्षिण-भारतीय
‘चिन्नास्वामी
मुदलियार’ की
अंग्रेजी भाषा
में ‘ओरिएंटल
म्यूज़िक इन
स्टाफनोरेशन’
कही जा सकती
है, जो
19वीं
शताब्दी के
अन्त में
प्रकाशित हुई
थी। इसी
प्रकार 1883 में
संगीत-दर्पण
नामक
द्वैमासिक
पत्रिका, 1886 में
‘संगीत
मीमांसक’, 1905 मे
‘संगीतामृत-प्रवाह’, 1932
में
द्वैमासिक
‘भारतीय-संगीत’, ‘लक्ष्य-संगीत
एवम ‘सुरच्छन्दा’
आदि
संगीत-पत्रिकाएँ
भी प्रकाशित
हुई।’’4
आज संगीत
की कुछ प्रमुख
पत्रिकायें
जैसे- संगीत
कार्यालय
हाथरस द्वारा
प्रकाशित
‘संगीत’ पत्रिका, अखिल
भारतीय
गंधर्व
महाविद्यालय
मंडल द्वारा
प्रकाशित
‘संगीत कला
विहार’
पत्रिका, भारत
सरकार के
संस्कृति
मंत्रालय के
अन्तर्गत
संगीत नाटक
अकादमी
द्वारा
प्रकाशित
‘संगीत नाटक
पत्रिका, त्याग
भारती संगीत
शिक्षा मिशन, मेलकोटे, कर्नाटक
द्वारा
प्रकाशित
‘इंडियन
म्यूजिक जर्नल’
पत्रिका, उत्तर
प्रदेश संगीत
नाटक अकादमी
(लखनऊ) द्वारा
प्रकाशित
‘छायानट’
पत्रिका तथा
वदसपदम पत्रिकायें
जैसे- रोलिंग
स्टोन
इण्डिया, रॉक
स्ट्रीट
जर्नल,
द स्कोर
संगीत
गैलेक्सी तथा
स्वर सिंधु
इत्यादि अपने
बहुमूल्य
लेखों के
माध्यम से
संगीत कला का
संरक्षण-संवर्धन
तथा
प्रचार-प्रसार
कर रही हैं।
पत्र-पत्रिकाओं
के अतिरिक्त
ग्रंथ तथा
पुस्तकें
महत्वपूर्ण
मुद्रित
माध्यम है।
संगीत के
क्षेत्र में
अनेक संगीत
शास्त्रियों
ने महत्वपूर्ण
ग्रंथों की
रचना की। चाहे
भरतकृत
‘नाट्यशास्त्र’
हो, मतंगकृत
‘वृहद्देशीय’
अथवा
शारंगदेवकृत
‘संगीतरत्नाकर’, ये
सभी संगीत के
आधार ग्रंथ
हैं। इनके बाद
भी अनेक
सुयोग्य
संगीतज्ञों
तथा लेखकों के
ऐसे अनेक
अनगिनत ग्रंथ
तथा पुस्तकें
प्रकाशित हुई
एवम् हो रही
है जो कि
शोधार्थियों
हेतु सूचना
प्राप्ति का प्रमुख
स्रोत है, इन
सभी मुद्रित
माध्यमों से
संगीत की
उत्पत्ति से
लेकर,
आधुनिक युग
तक संगीत की
स्थिति,
उसमें आये
परिवर्तन तथा
भविष्य की
सम्भावनायें, संगीत
के
क्रियात्मक
तथा शास्त्र
पक्ष तक की जानकारी
प्राप्त होती
है।
मुद्रित
संचार माध्यम
(प्रिंट
मीडिया) के
अतिरिक्त
विद्युतीय
संचार माध्यम
(इलेक्ट्रानिक
मीडिया), तथा अंकीय
संचार माध्यम
(डिजिटल
मीडिया) ने संगीत
कला की उन्नति
में
क्रान्तिकारी
परिवर्तन
लाया है।
‘‘आज
के वैज्ञानिक
युग में
इलेक्ट्रानिक्स
टैक्नोलॉजी
की नित्य
प्रति नवीन से
नवीन एवं अत्याधुनिक
इलेक्ट्रानिक
ध्वन्यंकन
उपकरणों ने
संगीत की अपार
सहायता की है
आज हम इन्ही उपकरणों
की सहायता से
अपने संगीत को
संग्रहीत भी
कर सकते हैं
और पुनः जब
चाहे सुन भी
सकते हैं। यदि
यह पद्धति
प्राचीन काल
में होती तो
तानसेन,
बैजूबावरा, स्वामी
हरिदास आदि
महान
संगीतज्ञों
का गायन भी आज
इन्हीं
ध्वनिसंग्रह
इलेट्रानिक
संयत्रों
द्वारा पुनः
सुनना सम्भव
हो जाता।’’5.
एक
महत्वपूर्ण
आविष्कार
जिसका उल्लेख
करना यहाँ
अत्यावश्यक
है वह है
‘माइक्रोफोन’
का आविष्कार। 1876 ई०
में एमिल
बर्लिनर के
द्वारा
माइक्रोफोन का
आविष्कार
किया गया
जिसका प्रयोग
टेलीफोन ट्रांसमीटर
के रूप में
होता था तथा
थॉमस एडिसन ने
भी 1877
में कार्बन
माइक्रोफोन
विकसित किया
जिसका प्रयोग
उन्होंने
फोनोग्राफ
(ग्रामोफोन)
में किया।
यद्यपि
बर्लिनर के
डिजाइन को
पहले व्यावहारिक
माइक्रोफोन
में से एक
माना जाता है
किन्तु
कार्बन
माइक्रोफोन
का पहला
पेटेंट 1877 में
एडिसन को मिला
था।
(इलेक्ट्रानिक
मीडिया)
विद्युतीय
संचार माध्यम
को दो भाँगों
में बाँटा जा
सकता है-
1)
श्रव्य
माध्यम
2) दृश्य
श्रव्य
माध्यम
श्रव्य
माध्यम में
सर्वप्रथम
ग्रामोफोन के आविष्कार
ने
संगीत-संसार
में क्रान्ति
ला दी। अब एक
ऐसा उपकरण तथा
माध्यम में
मिल चुका था कि
हम कलाकारों
की कला को
जीवित रख सकते
थे। प्रारम्भ
में कई कलाकार
अपनी
रूढ़िवादी
विचारधारा के
चलते अपनी
गायकी को
ध्वन्कित
(रिकार्ड)
कराने के पक्ष
में नहीं हुआ
करते थे। बाद
में कुछ
कलाकारों ने
पहल की।
सर्वप्रथम उ०
अब्दुल करीम
खाँ ने अपने रिकॉर्डर्स
बनवाये। बाद
में पं०
विष्णु
दिगम्बर, बालकृष्ण
बुआ, अल्लादिया
खाँ, फैयाज़
खाँ तथा अन्य
अनेक
कलाकारों ने
भी रिकार्डिंग
कराई।
ग्रामोफोन
कम्पनियों का
व्यवसाय चल
पड़ा किन्तु यह
एक
युगान्तकारी
परिवर्तन हुआ
जो कि अत्यन्त
सकारात्मक
रहा। लोग संगीतज्ञों
की
रिकार्डिंग
बार-बार सुनने
लगे। शास्त्रीय
संगीत के
क्रियात्मक
रूप का संरक्षण
तथा संवर्धन
तीव्र गति से
होने लगा। बाद
में
आडियो/वीडियो
कैसेट्स, डीवीडी/वीसीडी
इत्यादि
बाजार में आने
लगे। अलग-अलग
तरह की
ध्वन्याकंन
तकनीक बाजार
में आने से
शास्त्रीय
संगीत के
प्रचार-प्रसार
में तेजी आई।
ग्रामोफोन
से हम
रिकार्डिंग
सुन सकते थे
किन्तु इस पर
रिकार्डिंग
करना आसान
नहीं था किन्तु
टेपरिकार्डर
के आविष्कार
से संगीत के
विद्यार्थी
स्वयं के
गायन-वादन की
रिकार्डिंग कर
उसे सुनने में
समर्थ होने
लगे।
रिकार्डिंग की
सुविधा ने
संगीत संकलन
आसान कर दिया।
इस प्रक्रिया
में ध्वनि
पट्टिकाओं
कैसेट्स को प्रयोग
किया जाता था।
बाद में आडियो
कैसेट्स के साथ
वीडियो
केसेट्स भी
आने लगे थे
तथा वीडियो रिकार्डिंग
किया जाना भी
सम्भव होने
लगा।
बीसवीं
सदी के आरम्भ
में ‘ध्वनि
विस्तारक यंत्र’
का आविष्कार
एक
महत्वपूर्ण
घटना रही। ध्वनि
विस्तारक
यंत्र (Loud speaker)
के आविष्कार
से पूर्व
कलाकारों को
अपनी संगीत
प्रस्तुति आम
जनता तक
सभागार में
पहुंचाने से
पहले अपनी
गायकी के साथ
बुलन्द आवाज
पर भी ध्यान
देना पड़ता था।
जिससे अन्तिम
पंक्ति तक उपस्थित
श्रोतागण
कार्यक्रम का
आनन्द ले सकें।
इस यंत्र के
अभाव में
कार्यक्रम
प्रस्तुतिकरण
में ध्वनि की
अत्यधिक
तीव्रता से
आवाज फटने का
डर रहता था
तथा स्वर
माधुर्य
समाप्त हो
जाता था। यदि
कार्यक्रम
खुले स्थान पर
हों तो कठिनाई
और अधिक बढ़
जाती थी। अब
लाउड स्पीकर
होने से कलाकार
को उतनी मेहनत
नहीं करनी
पड़ती है तथा बड़े-बड़े
संगीत सभागार
एवम् मैदानों
में सांगीतिक
कार्यक्रम
होने लगे हैं
एवम् अधिक लोग
इन कार्यक्रमों
में शिरकत कर
कार्यक्रम का
आनन्द उठाने
लगे हैं।
आकाशवाणी
के आगमन से
संगीत जन-जन
तक पहुँचने लगा।
1930
में भारत
सरकार ने
रेडियो को ऑल
इण्डिया रेडियो
की संज्ञा दी।
‘‘ऑल इण्डिया
रेडियो की
गतिविधियों
में ‘भारतीय
शास्त्रीय
संगीत प्रचार-प्रसार’, नया
ऑडीशन सिस्टम, रेडियो
संगीत
सम्मेलन, भारतीय
संगीत
परिचर्चायें, ऑल
इण्डिया
रेडियो की
सांगीतिक
प्रतियोगिताएं, संगीत
सभाओं व
सम्मेलनों का
प्रसारण, शास्त्रीय
संगीत का
दैनिक
प्रसारण, संगीत
परिचर्चा आदि
कुछ
कार्यक्रम
विशेष रूप से
उल्लेखनीय
हैं।’’6. इन
कार्यक्रमों
के माध्यम से
जनसामान्य
में शास्त्रीय
संगीत के
प्रति रुचि
जाग्रत हुई
तथा वे इससे
परिचित होने
लगे।
आकाशवाणी
के माध्यम से
सांगीतिक
कार्यक्रमों
का श्रवण किया
जाता है जबकि
दूरदर्शन एक
ऐसा माध्यम है
कि जिममें
श्रोतागण, कलाकार
को सुन ही
नहीं वरन्
उनका
प्रत्यक्ष दर्शन
भी कर सकते
हैं। इसमें
कलाकार की
प्रस्तुति
तथा बैठने का
ढंग, कलाकार
की मुद्राएं, भाव-भंगिमायें
वेशभूषा
इत्यादि सभी
दर्शकों को
आकर्षित तथा
प्रभावित
करते हैं।
दूरदर्शन से
शास्त्रीय
संगीत के अनेक
कार्यक्रम जैसे
संगीत का अखिल
भारतीय
कार्यक्रम, संगीत
-पाठ,
ग्रेट
मास्टरर्ज ऑफ
इण्डिया, संगीत के
विविध
धारावाहिक
इत्यादि
प्रसारित
होते रहे हैं।
दूरदर्शन
के इसी क्रम
में डी० डी०
भारती का नाम
लिया जा सकता
है इसका
उद्घाटन 26
जनवरी 2002
को किया गया
था। आज भी यह
सक्रिय है।
प्रसार भारती
द्वारा
संचालित यह
चैनल भारतीय
संस्कृति तथा
कला संगीत से
जुड़े
कार्यक्रम
समय-समय पर
प्रसारित
करता रहता है।
यह चैनल
क्ज्भ्ए ल्वन
ज्नइमए श्रपव
ज्ट पर भी
देखा जा सकता
है।
(डिजिटल
मीडिया) अंकीय
संचार माध्यम
के अन्तर्गत
इण्टरनेट तथा
।प् आते हैं।
‘‘आज के युग का सर्वाधिक
महत्वपूर्ण
इलैक्ट्रानिक
मीडिया कम्प्यूटर-इन्टरनेट
है। इंटरनेट
में संगीत की
लिखित
सामग्री तथा
संगीत
सम्बन्धी
सूचनाओं के
विवरण एवं
आयोजित हो रहे
व होने वाले
कार्यक्रमों
(सेमिनार, वर्कशाप
मंच-प्रदर्शन
आदि) का
ब्योरा
(क्ंजं) मौजूद
है।’’7.
रिकार्डिंग
के माध्यम से
कुछ स्तर तक
संगीत सीखा जा
सकता है
किन्तु
त्रुटियों का
तत्काल संशोधन
भी आवश्यक है
अतः वीडियो - कॉन्फ्रेंसिंग
के माध्यम से
संगीत सीखा जा
सकता है। इसके
अतिरिक्त
आजकल विभिन्न
कॉन्फ्रेस
तथा सेमीनार
हाइब्रिड मोड
पर हो रहे हैं
जिनमें सुदूर
स्थित जन भी
प्रतिभागिता
कर सकते हैं।
आज इण्टरनेट
पर अनेक
वेबसाइट्स
हैं जिनमें
संगीत के बारे
में जानकारी
प्राप्त की जा
सकती है। आज ‘शोध
गंगा’ पर अनेक
शोध ग्रन्थ
मिल जाते हैं
जिनसे
शोधार्थी यह
आसानी से जान
सकते है कि
किस विषय पर
शोध किया जा
चुका है तथा
किस पर किया
जा सकता है।
आज के दौर
में। प्
कृत्रिम
बुद्धिमत्ता
बहुत तेजी से
प्रचलित हो
रही है।
विदेशों में
कम्प्यूटर का
क्रियात्मक
संगीत में
प्रयोग हो रहा
है किन्तु भारतीय
संगीत
श्रुत्याधारित
तथा भाव
प्रधान होने
के कारण
कम्प्यूटर की
पहुँच अभी
वहाँ तक नहीं
है। यद्यपि
संगीत के
क्षेत्र में
।प् का प्रयोग
आजकल एक बड़ी
चुनौती है तथा
इसमें कुछ सम्भावनाएं
भी हैं तथापि
भारतीय संगीत
की मार्मिकता
तथा
भावप्रवणता
अभी कृत्रिम
बुद्धिमता के
वश की बात
नहीं है।
विज्ञान एवं
तकनीकी हर एक
चीज की नकल
पूर्णतः नहीं
कर सकता
क्योंकि जो
चीज नैसर्गिक
है वह
नैसर्गिक ही
है।
यद्यपि
रिकार्डिंग
स्टूडियो में
आज ऑटो-ट्यून
का भी प्रयोग
होता है तथापि
वहाँ प्रयोग
की जाने वाली
एक से एक
तकनीकियाँ, आवाज़
तथा
कार्यक्रम
प्रस्तुतिकरण
को माधुर्य
युक्त भी बना
रही है। संगीत
के क्षेत्र
में
इलेक्ट्रानिक
तानपुरे तथा
तालमाला का
अविष्कार
श्री जी
राजनारायन ने
किया। यह एक
छोटा बाक्सनुमा
संयन्त्र
होता है जिसमे
तानपुरे की
ध्वनि तथा
विविध तालों
का वादन होता
है। यद्यपि
मूल तानपुरे
में मूल स्वर
के साथ सहायक
नाद अर्थात्
स्वयंभू स्वर
भी झंकृत होते
हैं जिसमे एक
विशेष
सांगीतिक
वातावरण का
सृजन होता है
तथापि इलेक्ट्रानिक
तानपुरे का
प्रयोग
विद्यार्थी अभ्यास
करते समय करते
हैं। कभी -कभी
मंच पर भी मूल
तानपुरे के
साथ
इलेक्ट्रानिक
तानपुरे का प्रयोग
करते हुये
संगीतकार दिख
जाते हैं। मगर
बड़े कलाकार
इलेक्ट्रानिक
तानपुरे की
जगह मूल
तानपुरे को ही
प्राथमिकता
देते हैं। इसी
प्रकार
इलेक्ट्रनिक
तालमाला पर जो
ताल बजती है
वह राग
प्रस्तुतिकरण
में लय बढ़ाते
समय जैसे-बढ़त
अथवा तान आने
पर स्वयं नहीं
बढ़ती अतः इसका
प्रयोग
विद्यार्थी
अभ्यास हेतु
ही करते हैं।
इस प्रकार
हम निष्कर्ष
रूप में यह कह
सकते है कि
जहाँ प्राचीन
काल में संगीत
पर कुछ लोगों
का ही
एकाधिकार था
तथा उनकी
गायकी के
क्रियात्मक
रूप को
सुरक्षित
नहीं रखा जा
सकता था तथा यदि
किसी कलाकार
के पुत्र अथवा
रिश्तेदार न
हो तो वह कला
उसी कलाकार के
साथ सदैव के
लिये चली जाती
थी, वहीं
आज संचार
माध्यमों ने
संगीत संसार
में क्रांतिकारी
परिवर्तन
लाया है संगीत
की पहुँच
सर्वसाधारण
तक हुई है तथा
अधिक लोग अब
इसमें रुचि
रखते हैं।
आज यदि हम
लोग जो इस
ललित कला से
प्रत्यक्ष रूप
से जुड़े हैं
जैसे संगीत
कलाकार,
संगीत
शिक्षक,
विद्यार्थी, संगीत
समालोचक, समाचार
पत्र के
सम्पादक, लेखक तथा
मीडिया इसे आम
जनता के समक्ष
लोकप्रिय
बनाने की
जिम्मेदारी
को समझे तो
हमारे यहाँ के
आम लोग भी
हमारे संगीत
को उतना ही
सम्मान देगें
जितना विदेशी
हमारे
शास्त्रीय
संगीत तथा
संगीतज्ञों
को देते हैं।
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