Original Article
the logic of art, the imagination of science
कला के
तर्क विज्ञान
की कल्पना
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1 Assistant Professor,
Painting, Government Arts College, Kota, Rajasthan, India |
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ABSTRACT |
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English: Art expresses the mind, while science reveals its physical manifestation. Art and science are companions on the same path- For both, the pursuit of truth is the ultimate goal. Art is the goddess of beauty and science is the god of the sublime. One embodies emotion and sensitivity, while the other embodies rationality. Humans not only create images through imagination and find solutions through logic but imagination also leads to inventions and logic gives rise to principles of creation. Although art and science are distinct fields, they are so intertwined that the existence of one without the other is difficult. In the creative process of art, when observation, understanding, and imagination culminate in giving form to a creation, an understanding of the technical aspects of the medium becomes absolutely essential. This craftsmanship is science. The colors of painting, the meter of poetry the grammar of literature—all are aspects of science that adorn a creation with beauty. Every work of art has two aspects: its emotional aspect and its technical aspect- When we talk about art, we are usually referring to the emotional aspect, although this is its primary function- Art serves to express human emotions, but without the technical aspect] these emotions cannot be expressed effectively. Mere sentimentality alone does not lead to achievement unless it is accompanied by skillful execution.This is where science plays its role. There are many techniques in art that are considered scientifically sound- In painting, for example, principles such as perspective, dimension theory, the Loomis method, color theory, the golden ratio, the Vitruvian man, and chiaroscuro etc have made art education simpler and more accessible- In the Indian context scientific principles like the Shadanga (six limbs of painting), Rasa theory, and iconography have created wonderful expressions of abstract subjects like religion and spirituality. Art uses the logic of science to create, while science uses the imagination of art to explore truth. Hindi: कला
मन की
अभिव्यक्ति
है, जबकि
विज्ञान
उसका भौतिक
स्वरूप
प्रकट करता है।
कला और
विज्ञान एक
ही पथ पर चलने
वाले साथी
हैं—दोनों का
ही अंतिम
लक्ष्य सत्य
की खोज है।
कला सौंदर्य
की देवी है और
विज्ञान
उदात्तता का
देवता। एक
भाव और
संवेदनशीलता
का प्रतीक है,
जबकि
दूसरा तर्क
का। मनुष्य न
केवल कल्पना
के माध्यम से
चित्र बनाते
हैं और तर्क
के माध्यम से
समाधान
खोजते हैं,
बल्कि
कल्पना
आविष्कारों
को जन्म देती
है और तर्क
सृजन के
सिद्धांतों
को जन्म देता
है। यद्यपि
कला और
विज्ञान
अलग-अलग
क्षेत्र हैं,
फिर
भी वे इतने
परस्पर
जुड़े हुए
हैं कि एक के बिना
दूसरे का
अस्तित्व
असंभव है।
कला की सृजनात्मक
प्रक्रिया
में, जब
अवलोकन, समझ
और कल्पना
मिलकर किसी
रचना को आकार
देते हैं, तो
माध्यम के
तकनीकी
पहलुओं की
समझ अत्यंत
आवश्यक हो
जाती है। यही
शिल्प कौशल
विज्ञान है। चित्रकला
के रंग, कविता
की लय, साहित्य
का
व्याकरण—ये
सभी विज्ञान
के पहलू हैं
जो किसी रचना
को सौंदर्य
से सुशोभित
करते हैं।
कला के
प्रत्येक
कार्य के दो
पहलू होते हैं:
भावनात्मक
पहलू और
तकनीकी
पहलू। जब हम
कला की बात
करते हैं, तो
आमतौर पर
हमारा
तात्पर्य
भावनात्मक
पहलू से होता
है, हालांकि
यह इसका
प्राथमिक
कार्य है।
कला मानवीय
भावनाओं को
व्यक्त करने
का माध्यम है,
लेकिन
तकनीकी पहलू
के बिना इन
भावनाओं को
प्रभावी ढंग
से व्यक्त
नहीं किया जा
सकता। केवल भावुकता
से ही
उपलब्धि
प्राप्त
नहीं होती,
जब
तक कि इसके
साथ कुशल
निष्पादन न
हो। यहीं पर विज्ञान
अपनी भूमिका
निभाता है।
कला में कई ऐसी
तकनीकें हैं
जिन्हें
वैज्ञानिक
रूप से सही
माना जाता
है। उदाहरण
के लिए, चित्रकला
में
परिप्रेक्ष्य,
आयाम
सिद्धांत,
लूमिस
विधि, रंग
सिद्धांत,
स्वर्ण
अनुपात, विट्रुवियन
मैन और
चियारोस्कोरो
आदि सिद्धांतों
ने कला
शिक्षा को
सरल और अधिक
सुलभ बना दिया
है। भारतीय
संदर्भ में,
षडांग
(चित्रकला के
छह अंग), रस
सिद्धांत और
प्रतिमा
विज्ञान
जैसे वैज्ञानिक
सिद्धांतों
ने धर्म और
आध्यात्मिकता
जैसे अमूर्त
विषयों की
अद्भुत
अभिव्यक्ति
की है। कला
सृजन के लिए
विज्ञान के
तर्क का
उपयोग करती
है, जबकि
विज्ञान
सत्य की खोज
के लिए कला की
कल्पना का
उपयोग करता
है। Keywords: Fact, Fiction, Nature, Beauty,
Science, Exploration, Difference, Interrelationship, तथ्य, कल्पना, प्रकृति, सौंदर्य, विज्ञान, अन्वेषण, अंतर्भेद, अंतर्सम्बन्ध |
||
प्रस्तावना
विज्ञान
प्रकृति को
समझने में
अनवरत किए जा
रहे अन्वेषण
की प्रक्रिया
है।यह समस्त
विषयों के मूल
में उपस्थित
आत्म विषय है।
किसी भी क्षेत्र
की समस्याओं
का सत्यनिष्ठ
निराकरण विज्ञान
से ही संभव
है। भारतीय
दर्शन के
उद्गम वेदों
में विज्ञान
को भौतिकी से
बढ़कर आध्यात्मिक
क्षेत्र तक
विस्तृत किया
गया है।
विशिष्ट
ज्ञानं इति
विज्ञानंम्
इस
तरह किसी भी
विषय का
विशिष्ट
ज्ञान जो उस विषय
के
सार्वभौमिक
सिद्धांत
स्थापित करे
विज्ञान
कहलाता है।
विज्ञान में
सतत प्रयोग और
जांच का क्रम
चलता रहता है
जिससे
प्राप्त निष्कर्ष
सर्वसम्मत
होते हैं। कला
भी प्रकृति के
गूढ़ रहस्यों
को खोजती है।न
केवल खोजती है
बल्कि नई
सृष्टि भी
रचती है। कला
जिस मन की
अभिव्यक्ति
करती है
विज्ञान उसके
भौतिक होने को
प्रकट करता
है। कला
विज्ञान की
सहपथगामिनी
है। दोनों ही
के लिए सत्य
को जानना ही
उनका उद्देश्य
है। कला
सौंदर्य की
देवी है तो
विज्ञान उदात्त
का देवता। एक
में भाव
संवेदना है तो
दूसरे में
बुद्धिनिष्ठता।
मनुष्य कल्पना
से केवल चित्र
ही नहीं बनाता
और न तर्क से
केवल समाधान
ही खोजता है
बल्कि कल्पना
से आविष्कार
भी होते हैं
और तर्क से
सृजन के
सिद्धांत भी
बनते हैं। आज
भले ही कला और
विज्ञान की
परिभाषाएं
बदल गई हैं
अपितु यह
मनुष्य जाति
की आदिमावस्था
से ही पथ
प्रदर्शक रहे
हैं। जंगलों में
किए गए शिकार
के चित्रों से
मानव की आत्मिक
अभिव्यक्ति
हुई तो उनमें
भरे रंगों ने
उसका रसायन से
परिचय कराया।
वस्तुत
कला,धर्म,दर्शन,विज्ञान
यह सभी मानव
की तीव्र
जिज्ञासा से
उपजे
प्रश्नों के
समाधान खोजने
के भिन्न
विकल्प रूप
हैं जो कहीं
कहीं एक दूसरे
की धाराओं में
विलीन होते
दिखाई देते
हैं। कला में
स्व को व्यक्त
करने वाले
कलाकार को कभी
धर्म से आख्यान,दर्शन से
आदर्श तो कभी
विज्ञान से
तकनीक की आवश्यकता
होती है। कला
कोरी भावुकता
तो नहीं होती, उसमें
कौशल का भी
तत्व रहता है
जो अभ्यास से
सीखा जाता है।
उसमें माध्यम
के स्वभाव को
समझना,भावों
के अनुकूल रंग,मिट्टी का
चयन करना सृजन
का ही भाग
है।किसी भी
कला में यह
शिल्प रहता ही
है जो विज्ञान
ही है। इसी
तरह भौतिकी की
किसी गम्भीर
पहेली में
उलझे
वैज्ञानिक को
परिकल्पना
करनी होती है।
कलाकार की तरह
उसे भी अनेक विचार
श्रृंखलाओं
को जोड़ना होता
है। वैज्ञानिक
भी सृजन करता
है जिसे उसका
आविष्कार कहा
जाता है।
यथार्थ में
आने से पहले
यह आविष्कार
विचारों में
होता है जहां
कई संभावनाओं
की कल्पना की
जाती है।
शैक्षणिक
विकास से अलग
अलग विषयों का
आविर्भाव
हुआ। प्रकृति
एवं
कार्यक्षेत्र
के अनुसार
विषयों में
विविधता
दिखाई देती
है। आरम्भ में
कला व शिल्प
एक थे।बाद में
ललित कला व
उपयोगी कला के
रूप में उनका
विभाजन हुआ।
ललित कलाएं
सौंदर्य
अनुभूति के
अधिक समीप हैं
जबकि उपयोगी
कलाएं दैनिक
जीवन को सरल
करने के। इसी
प्रकार
विज्ञान भी
प्राकृतिक
विज्ञान व
सामाजिक
विज्ञान में
विभाजित है।
प्राकृतिक
विज्ञान में
अनुभवजन्य
विधियों से
भौतिक जगत का
अध्ययन किया
जाता है।
भौतिकी,रसायन,गणित इसके
भाग हैं
सामाजिक
विज्ञान मानव
व्यवहार,समाज का
मनोविज्ञान
है।कला का
विषय भी
सामाजिक विज्ञान
के अंतर्गत
आता है।वैसे
विज्ञान से
हमारा
तात्पर्य
प्राकृतिक
विज्ञान से ही
रहता है। इस
लेख में भी
प्राकृतिक
विज्ञान व
ललित कला के
मध्य चर्चा की
गई है।
प्रबुद्धजनों
में प्राय
विविध विषयों
के अंतर्संबंधों
पर प्रश्न बना
रहता है।इससे
दोनों विषयों
के स्वभाव को
समझने में
आसानी तो होती
ही है साथ ही
उन विषयों के
विकास को भी
दिशा मिलती
है।अंतर्संबंधों
के साथ साथ
उनके मूल अंतर
को भी समझना
चाहिए।कला और
विज्ञान के मध्य
की समानता को
देखने से पहले
इनके
विरोधाभास को
भी इंगित किया
जाना आवश्यक
है।
कला
व विज्ञान के
अंतर्भेद
कला
भाव व्यंजना
के लिए किया
जाने वाला
कार्य है।कलाकार
के सृजन से
ग्राही भी
इसका आनंद लेते
हुए उसमें लीन
भावों को
ग्रहण करता
है।संप्रेषण
के आनंद की इस
क्रिया में
मानवीय संवेदनाएं
अहम होती
हैं।विज्ञान
का कार्य
संवेदना
उत्पन्न करना
या उनमें रस
ढूंढना नहीं
होता।उसका
कार्य उन
शारीरिक
गतिविधियों
के नियंत्रण
का अध्ययन
करना है जिनसे
भाव जन्म लेते
हैं या रस की
अनुभूति होती
है।इस तरह
विज्ञान का
कार्य भौतिक
जगत के पदार्थ
चिंतन पर
मुख्य केंद्रित
हो जाता
है।बिना
बाहरी सत्ता
के किसी
निष्कर्ष पर
पहुंचना संभव
नहीं होता जबकि
कला प्रकृति
के आंतरिक
सौंदर्य को
खोजती है।कला
का लक्ष्य ठोस
प्रमाण
जुटाना नहीं
होता।
विज्ञान
में
पुनरावृत्ति
का विशेष
महत्व है जिन्हें
सामान्यत
पैटर्न कहा
जाता है।जीव विज्ञान
में किसी पादप
की संरचना या
किसी प्राणी
के व्यवहार के
अध्ययन में वह
गतिविधियां भी
शामिल होती
हैं जो उस
प्राणी
द्वारा बार
बार दोहराई
जाती
हैं।पदार्थ
जगत में
अधिकतर ऐसा होता
है।यह
गतिविधियां
संबंधित
प्राणी या पदार्थ
के गुण स्वभाव
को दर्शाती
हैं।कला में भी
पुनरावृत्ति
होती है जिससे
किसी चित्र में
लय,प्रवाह का
संचार होता
है। यह रंग,रूप,पोत या शैली
से जुड़ी हो
सकती है।पर
कलागत पैटर्न
के परिणाम
सदैव एक जैसे
नहीं
होते।सदियों से
लोक कलाकार
चुनिंदा
विषयों को
लेकर कार्य करते
आ रहे हैं।
यामिनी राय ने
बार बार वही
चित्र बनाए जो
वह पहले से ही
बना चुके थे
पर कला में हर
बार नवीन रचना
प्रस्तुत
होती है।
विज्ञान
के परिणाम
सर्वसम्मत
होते हैं।निर्धारित
मापदंड पर
किसी प्रयोग
को दोहराने पर
सदैव एक समान
परिणाम मिलते
है यदि कोई
त्रुटि न
हो।जबकि कला
में कलाकार की
रचना
प्रत्येक सौंदर्यग्राही
के लिए भिन्न
अर्थ लिए हुए
होती है।समय
के अलग अलग
पटल पर एक ही
कृति के अर्थ एक
ही दर्शक के
लिए भी बदल
जाते हैं।
बदलते समय के
साथ साथ कला
की
पुनर्व्याख्या
की जाती रही
है।
विज्ञान
कला के
सापेक्ष अधिक
सार्वभौमिक
जान पड़ता है
हालांकि कला
की कोई
भौगोलिक सीमा
है ऐसा नहीं
कहा जा सकता
पर कला
प्रादेशिकता
से ओत प्रोत
होती है।कला
में क्षेत्र
विशेष की लोक
अभिरंजना रची
बसी होती
है।रामायण,महाभारत
के दृष्टांत
या बाइबल के
कथानक धर्म विशेष
को प्रभावित
करते हैं।
यूरोपीय कला
की नग्न
आकृतियों से
भारतीय मंदिर
शिल्प की मिथुन
आकृतियां
विपरीत अर्थ
आनंद व्यक्त
करती हैं।इस
अर्थ में
आधुनिक
अमूर्त कला
अधिक सार्वभौमिक
स्वरूप लिए
होती है
परन्तु वह भी
क्षेत्रीय
मूल्यों के
बिना मात्र
तकनीकी कौशल
ही बनकर जाती
है।संस्कृति
कला की पोषक
तत्व है।
विज्ञान
सांस्कृतिक
मूल्यों की
अपेक्षा
भौतिक तथ्यों
पर आधारित
होता है अतः
सभी दशाओं में
एक समान अर्थ
लिए होता है।
उपरोक्त
अंतर्भेदों
से कला व
विज्ञान की
मूल प्रकृति
समझी जा सकती
है।विरोधाभासी
प्रवृति के
लगने वाले कला
और विज्ञान के
क्षेत्र विमुख
नहीं होते
बल्कि एक
दूसरे के पूरक
होते हैं।शुष्क
विज्ञान मानव
जाति के लिए
अभिशाप बन सकता
है यदि कला
आनंद के स्रोत
सुखा दिए
जाएं। कला भी
विज्ञान के
आलंबन से
पल्लवित हुई
है। कुछ ऐसी
समानताएं भी
हैं जो कला और
विज्ञान को एक
साथ जोड़ती
हैं।
कला
व विज्ञान के
अंतर्सम्बन्ध
विज्ञान
में समस्या
समाधान के लिए
व्यवस्थित
प्रक्रिया का
पालन किया
जाता
है।अवलोकन,परिकल्पना,निरीक्षण,विश्लेषण,पुनर्विचार
व
निष्कर्ष।विज्ञान
की इस चरणबद्धता
के अनुरूप ही
कला में भी
सृजन
प्रक्रिया के
चार चरण हैं -
अवलोकन,अवबोध,कल्पना,अभिव्यक्ति।कलाकार
एक वैज्ञानिक
की तरह प्रकृति
का अध्ययन
करता है और
उसके
प्रतिबिंबों
को अपने मन के
भावों के
समरूप चुनता
है।कल्पना
प्रश्नों के
विकल्प
तलाशती
है।विषय के सर्वाधिक
निकट
विकल्पों पर
अन्वेषण किया
जाता है जो
तर्कों,तथ्यों पर
आधारित होते
हैं।कलाकार
भी ऐसे विकल्प
पर मनन करता
है जो सृजन को
मौलिक
रूप दे सके।
नवाचार
कला और
विज्ञान को
समीप जोड़ता
है।विज्ञान
रूढ़िगत
आडंबरों से
पर्दा हटाता
है तो कला
परम्परा से
गतिमान
मूल्यों की
सार्थकता में
नवोन्मेष
करती है।एक
तरह से
विज्ञान के
अकाट्य तर्क
मनुष्य के
पूर्वाग्रहों
पर अंकुश लगाते
हैं तो कला की
मौलिकता
मनुष्य की
स्वतंत्र सोच
को विस्तार
देती है।
अमूर्त
अवधारणाओं के
धरातल पर भी
कला और विज्ञान
समान दिखाई
देते
हैं।यथार्थ
में आने से पहले
कोई विचार मन
मस्तिष्क में
अमूर्त रहता है
जिस पर
वैज्ञानिक
एवं कलाकार
द्वारा चिंतन मनन
किया जाता
है।उपलब्ध
डाटा या
साहित्य प्रमाण
के आधार पर यह
विचार नया रूप
धारण करता है।यथार्थ
सृष्टि विचार
सृष्टि का ही
दृश्य रूप
होता है।इस
संबंध में
घनवादी
कलाकार हान ग्रीस
का प्रसिद्ध
कथन है कि कील
लोहे से नहीं बल्कि
कील से ही से
बनाई जाती है
यदि कील की कल्पना
न की होती तो
कील के अलावा
कुछ और बन
जाता।अमूर्त
अवधारणाओं से
ही अंतरिक्ष
क्षेत्र,भूगर्भिक
क्षेत्र के
प्रयोग सिद्ध
होते हैं।
दादावाद,अतियथार्थवाद,प्रत्ययवाद
जैसे कला
आंदोलन भी
अमूर्त विचार
श्रृंखलाओं
की ही देन
हैं।
कला
और विज्ञान के
अंतर्संबंधों
पर एक रोचक शोध
का वर्णन करना
अच्छा
रहेगा।यह
महत्वपूर्ण
न्यूरोलॉजिकल
शोध
कैलिफोर्निया
विश्वविद्यालय
के वी एस
रामचंद्रन और
विलियम
हर्स्टन
द्वारा किया
गया और
उन्होंने
पाया कि मनोविज्ञान
में भेदभाव
अधिगम में
प्रयुक्त “पीक
शिफ्ट
सिद्धांत” कला
पर पूर्णतः
लागू होता है
जिसमें किसी
जानवर को किसी
पदार्थ या
कार्य के लिए
अधिक
प्रतिक्रियावादी
बनाया जाता
है।उदाहरण के
रूप में किसी
चूहे का वर्ग
या आयत में से
किसी एक को
चुनना।यदि
आयत की भुजाओं
को और अधिक
फैला दिया जाए
तो वह उसे
ज्यादा आसानी
से चुन
सकेगा।यही
पीक शिफ्ट
सिद्धांत है
जो कला के
प्रति आकर्षण
को पहचानने
में मदद करता
है।कला किसी
विशेष
संवेदना को
उजागर करती है
और उसे बढ़ाती
है।कलाकार
किसी विषय की
अनावश्यक जानकारी
को छोड़कर उसके
मूल तत्व को
स्पष्ट अंकित
करने का
प्रयास करते
हैं जो दर्शक
को सीधे तौर
पर आकर्षित
करता है तथा
उसके
मनोवेगों को और
अधिक आनंदित
करता
है।भारतीय
कला में इसे ही
रस कहा जाता
है।इसका आशय
यह हुआ कि
हमारे जटिल
शरीर की
तंत्रिका
संरचना में
ऐसे तंत्र हैं
जो हमें
सौन्दर्य के
प्रति अधिक
संवेदनशील बनाते
हैं। कला में
विज्ञान की
सिद्धता के
लिए यह
महत्वपूर्ण
खोज है।
रंग
एक ओर अहम घटक
हैं जो सीधे
तौर पर कला और
विज्ञान
दोनों से जुड़े
हैं। वर्णिका
भंग के रूप में
रंग चित्रकला
के मुख्य
तत्वों में
शामिल हैंै।वैज्ञानिक
इसाक न्यूटन,मैक्सवेल, कार्ल
हेरिंग,सी वी रमन
इत्यादि के
रंग विज्ञान
संबंधी आविष्कारों
ने कला को
समृद्ध किया।
प्रभाववादी,नवप्रभाववादी
कलाकारों की
रंग संबंधी
अवधारणाओं ने
कला की
परम्परागत
रंगांकन
पद्धतियों को
ही बदल
दिया।खनिज
रंगों से लेकर
जलरंग,तैलरंग,टेम्परा,एक्रेलिक,ड्राई और
ऑयल पेस्टल,जैसे कई
रंग प्रकार
हैं जिनमें
प्रत्येक के प्रयोग
के लिए विशेष
दक्षता
आवश्यक होती
है।रंगों के
इन
आविष्कारों
ने चित्रकला
को उन्नत किया
है। चित्रकला
के अतिरिक्त
रंग
प्रिंटिंग,ग्राफिक,सिरेमिक,इंस्टालेशन,फोटोग्राफ,सिनेमा,स्टेज,फैशन,डिजिटल
संचार जैसी कई
विधाओं में
प्रयुक्त होते
है CMYK, RGB, HEX CODE इत्यादि
रंग संयोजन की
विविध
प्रणालियां
विकसित हुईं
हैं जिनसे
उपरोक्त
क्षेत्रों
में अभूतपूर्ण
प्रगति हुई
है।रंगों का
व्यापक मनोवैज्ञानिक
प्रभाव पड़ता
है।आयुर्वेद
में भी रंग
चक्र के
माध्यम से रोग
निदान के उपाय
बताए गए
हैं।भरतमुनि
के
नाट्यशास्त्र
में स्थाई भाव
के निश्चित
रंग भी वर्णित
हैं।यह वर्गीकरण
विज्ञान
सम्मत माना
जाता है।इस
प्रकार रंग
कला में भावों
का श्रृंगार
है तो विज्ञान
में औषधि है।
विज्ञान
के अन्वेषणों
से
कलाक्षेत्र
ने अभूतपूर्व
तरक्की की
है।विशुद्ध
ज्यामितीय रूपाकारों
में तार्किक
सौंदर्य
निहित होता है।यह
मत सुकरात,प्लेटो के
समय से ही चला
आ रहा
है।आधुनिक
युग में भी
सर्वोच्चवाद,विशुद्धवाद,नेत्रीय
कला जैसी
शैलियां
विज्ञान के
सिद्धांतों
को लेकर आगे
बढ़ी।मध्यकालीन
कलाकारों में
वैज्ञानिक
सोच का प्रबल
वेग
था।द्विआयामी
चित्रकला में
परिप्रेक्ष्य
सिद्धांत का प्रयोग,मानव शरीर
शास्त्र का
अध्ययन,धरातल का
स्वर्ण
अनुपात में
विभाजन,वर्ग व आयत को
लेकर
विट्रुवियन
मानव
शरीर का आदर्श
संतुलन,किआरास्कूरो
जैसी
यथार्थबोध की
प्रविधियों
ने कला के हुए
आयाम
गढ़े।लियोनार्दो
द विंची को तो
वैज्ञानिक
कलाकार कहा ही
जाता है।उनके समकक्ष
माइकल एंजेलो,राफेल ने
भी जटिल
गणितीय
वास्तु
योजनाएं बनाई
थी।कलाकार
मात्र भाव
संप्रेषण ही
नहीं करता
कौशल के
प्रयोग भी
करता है जो
कला में नवीनता
बनाए रखते
हैं।भारतीय
कला संदर्भों
की बात की जाए
तो भरत मुनि
के नाट्य
शास्त्र की
वैज्ञानिकता
इतनी सिद्ध है
कि सभी कलाओं
के चिंतन में
इसका रस
सिद्धांत सही
ठहरता
है।भारतीय मंदिरों
के
वास्तुशिल्प
कला के
सर्वोच्च आदर्श
होने के साथ
विज्ञान की
उन्नत तकनीक
के प्रतिमान
भी
हैं।भारतीय
प्रतिमा
विज्ञान के आदर्श
रूपों में
धर्म और
अध्यात्म
जैसे अमूर्त
विषयों की भी
अद्भुत
सृष्टि की गई
है।षड़ांग सिद्धांत
चित्रकला के
संयोजन,वर्णबोध को
प्रकट करता
है।
कला
और विज्ञान से
संबंधित दो
महान
व्यक्तित्व
लेखांकित किए
जाने आवश्यक
हैं। आधुनिक
भारत के महान
वैज्ञानिक डॉ
होमी जहांगीर
भाभा विज्ञानी
होने साथ एक
श्रेष्ठ
कलाकार भी थे।
डॉ सी वी रमन
ने उन्हें
भारत के
लियोनार्दो द
विंची के रूप
में वर्णित
किया
है।कलाओं को
लेकर डॉ भाभा
ने कहा था - “कला,संगीत,कविता और
बाकी सब कुछ
जो मैं करता
हूं उसका एक ही
लक्ष्य है
मेरी चेतना और
जीवन की
तीव्रता बढ़ाना।
”वह एक सक्रिय
कला संरक्षक
भी थे।नव स्थापित
कला समूह पैग
के रजा,हुसैन,गायतोंडे,हेब्बार
तथा और भी
समकालीन
कलाकारों के
चित्र उन्होंने
खरीदे।टाटा
इंस्टीट्यूट
ऑफ फंडामेंटल रिसर्च
(TIFR) के
निदेशक पद पर
रहते हुए
उन्होंने बजट
का 1% कला
संरक्षण पर
खर्च किया। TIFR
जैसे विज्ञान
भवन में हुसैन
का भारत भाग्य
विधाता
भित्तिचित्र
डॉ भाभा के ही
कलाप्रेम की देन
है।उन्होंने
पहचाना कि
विज्ञान की
जटिल गुत्थियों
में उलझे
वैज्ञानिकों
को कला से ही
विश्रांति
मिल सकती है।
डॉ भाभा की
तरह ही सतीश
गुजराल ने
चित्रकला से
आगे बढ़कर
विज्ञान की
ज्यामितीय
संरचना को
लेकर विश्व
प्रसिद्द
वास्तु शिल्प
का निर्माण
किया।1980 में
उनके द्वारा
डिजाइन
बेल्जियम
दूतावास के
वास्तु को
विश्व की
सर्वश्रेष्ठ
इमारतों में
से एक के रूप
में माना जाता
है।यह ईंटों
से बना व
बौद्ध वास्तुकला
से प्रेरित एक
अद्भुत
डिजाइन है
जिसे विश्व
धरोहर सूची
में अंकित
किया
गया।सतीश
गुजराल ने और
भी कई भवनों
के डिजाइन
तैयार किए जिनमें
गोवा
विश्वविद्यालय, सीएमसी
हैदराबाद,गांधी
संस्थान
मॉरिशस,अल मुघतारा
पैलेस रियाद,प्रधानमंत्री
निवास बहरीन
इत्यादि
प्रमुख हैं।सतीश
गुजराल ने
विभाजन की
त्रासदी पर भावना
प्रधान चित्र
बनाए तो
प्रगतिशील
भारत की इमारतें
भी डिजाइन
की।कला और
विज्ञान का
इससे अनुपम
उदाहरण ओर
क्या होगा!
कला
में
युगांतरकारी
परिवर्तनों
पर विज्ञान की
स्पष्ट छाप
है।वैज्ञानिक
अनुसंधानों ने
कला क्षेत्र
में कुशलता से
अभिव्यक्त
होने में
योगदान दिया
है।कला भी गूढ़
अनसुलझी विज्ञान
की पहेलियों
को सुलझाने
में अहम
भूमिका निभाती
है।सिंधु
घाटी की
मूर्तियों से
आज की संस्थापन
कला तक
विज्ञान का
मिश्रण देखा
जा सकता है।
कला और
विज्ञान
दोनों में
अमूर्त से मूर्त
का दिग्दर्शन
होता है। अतः
कह सकते हैं
कि कला
विज्ञान के
तर्क का आधार
लेकर सृष्टि
का निर्माण
करती है तो
विज्ञान कला
की कल्पना से सत्य
का अन्वेषण।
ACKNOWLEDGMENTS
None.
REFERENCES
साखलकर,
र. वि. (2010). आधुनिक
चित्रकला का
इतिहास.
जयपुर:
राजस्थान ललित
कला अकादमी।
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