Original
Article
Folk Arts of India: A Study
भारत की
लोक कलाएँ: एक
अध्ययन
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Dr. Premlata Kashyap 1* 1 Incharge, Department of Painting, Gokuldas Hindu Girls College, Moradabad, India |
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ABSTRACT |
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English: The folk arts of India are a natural expression of the country’s cultural diversity and the life of its people. These arts have developed in different regions, inspired by loc al traditions, beliefs, festivals, and nature. Folk painting traditions such as Madhubani, Warli, Pattachitra, Phad, and Gond are the result of collective experiences and knowledge passed down from generation to generation. The use of natural colors, symbols, and simple line drawings is a major characteristic of these arts. Folk arts are not only an expression of aesthetic sense but also protectors of social values and cultural identity. Despite the impact of the market and globalization in modern times, their importance remains intact, and the need for their preservation has become even greater. Folk art is a form of popular creative expression of the human mind, which takes shape through forms and is expressed through lines. It is deeply woven into our daily lives in various forms that we use in our homes during festivals and celebrations as means of expressing our inner self. Regardless of caste or religion, folk art is that space in life where our soul resides, because the soul is connected with every expression that is natural and simple. This simplicity and spontaneity are the core essence of folk art. Therefore, the culture of any country or region can be understood through its folk art, folk songs, folk dances, and folk languages. In these forms, human beings find the complete material for their thoughts and social development. All the experiences reflected in folk paintings become the subjects of folk art. Hindi: भारत
की लोक कलाएँ
देश की
सांस्कृतिक
विविधता और
यहाँ के
लोगों के
जीवन की एक
स्वाभाविक अभिव्यक्ति
हैं। ये
कलाएँ
अलग-अलग
इलाकों में स्थानीय
परंपराओं,
मान्यताओं,
त्योहारों
और प्रकृति
से प्रेरित
होकर विकसित
हुई हैं।
मधुबनी,
वारली,
पट्टचित्र,
फड़
और गोंड जैसी
लोक पेंटिंग
परंपराएँ
पीढ़ी-दर-पीढ़ी
मिले-जुले
अनुभवों और
ज्ञान का नतीजा
हैं।
प्राकृतिक
रंगों, प्रतीकों
और सरल रेखा
चित्रों का
इस्तेमाल इन
कलाओं की एक
बड़ी खासियत
है। लोक
कलाएँ न केवल
सौंदर्य बोध
की
अभिव्यक्ति
हैं, बल्कि
सामाजिक
मूल्यों और
सांस्कृतिक
पहचान की
रक्षक भी
हैं। आधुनिक
समय में
बाज़ार और ग्लोबलाइज़ेशन
के असर के
बावजूद,
उनका
महत्व
बरकरार है,
और
उनके
संरक्षण की
ज़रूरत और भी
बढ़ गई है। लोक
कला इंसान के
मन की
लोकप्रिय
रचनात्मक
अभिव्यक्ति
का एक रूप है,
जो
रूपों के
माध्यम से
आकार लेती है
और रेखाओं के
माध्यम से
व्यक्त होती
है। यह हमारे
दैनिक जीवन
में विभिन्न
रूपों में
गहराई से
जुड़ी हुई है
जिसका उपयोग
हम अपने घरों
में
त्योहारों
और उत्सवों
के दौरान
अपने अंदर के
आत्म को व्यक्त
करने के साधन
के रूप में
करते हैं।
जाति या धर्म
से परे,
लोक
कला जीवन में
वह जगह है
जहाँ हमारी
आत्मा बसती
है, क्योंकि
आत्मा हर उस
भाव से जुड़ी
होती है जो स्वाभाविक
और सरल होता
है। यही
सादगी और
सहजता लोक
कला का मूल
सार है।
इसलिए, किसी
भी देश या क्षेत्र
की संस्कृति
को उसकी लोक
कला, लोक
गीतों, लोक
नृत्यों और
लोक भाषाओं
के ज़रिए
समझा जा सकता
है। इन रूपों
में इंसान को
अपने
विचारों और
सामाजिक
विकास के लिए
पूरा
मटीरियल
मिलता है।
लोक पेंटिंग
में दिखने
वाले सभी
अनुभव लोक कला
का विषय बन
जाते हैं। Keywords: Folk Art, Freedom, Self-Expression, and
Folk Life, लोककलाए, स्वच्छंदता, आत्मअभिव्यक्ति, लोकजीवन |
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प्रस्तावना
भारत
विविधताओं का
देश हैए जहाँ
भाषाए वेशभूषाए
रीति.रिवाज और
जीवन.पद्धति
की भिन्नता के
साथ कला की भी
अद्भुत
बहुलता दिखाई
देती है। भारतीय
लोक कलाएँ
जनजीवन की सहज
अभिव्यक्ति हैं।
ये कलाएँ किसी
एक कलाकार की
निजी कल्पना का
परिणाम नहींए
बल्कि
सामूहिक
अनुभवए परंपरा
और लोक.आस्था
की सजीव
अभिव्यक्ति
हैं। लोक कला
में ग्रामीण
जीवन की
सादगीए
धार्मिक विश्वासए
उत्सव.परंपराएँ
और प्रकृति के
साथ सामंजस्य
स्पष्ट रूप से
दिखाई देता
है। किसी भी
देश का लोक
साहित्य उस
देश के जनमानस
का प्रतिबिंब
है लोक
संस्कृति में
जहां लोक
मूल्य और लोक
संस्कारों का
महत्व है वहां
लोक साहित्य
और लोक कला का
भी है लोक कला
अनंत लोक जीवन
की धारा है जो
ना रूकती है
और न हीं काल
के प्रभाव से
बिछिनन होकर
गतिहीनता और
शुष्कता को
प्राप्त होती
है भारतीय
जीवन में
भारतीय जीवन
का महत्व तो
है ही लोक
जीवन में भी
धार्मिक
अनुष्ठानों
की एक लंबी
कड़ी प्राप्त
होती है
परंपरा रीति
.रिवाज इसके
कलेवर में रीड
की हड्डी की भांति
अपनी
प्रतिष्ठा के
महत्व को
चरितार्थ करते
हैं जिससे
इसका लोकतत्व
परिष्कृत रूप
में प्रस्तुत
होता है
प्रत्येक
त्योहार पर
उससे संबंधित
मांगलिक
चिन्हो व
रूपों को
बनाया जाता है
लोककला हमारे
जीवन का अविच्छिन्न
अंग है वह
हमारे
प्रतिदिन के
जीवन में विभिन्न
रूप से गुथी
हुई है लोक
कला मनुष्य की
स्वाभाविक
अभिव्यक्ति
का सहज रूप
होने के कारण
आशा
एआकांक्षाए
आनंद उत्साह
आदि मंगलमय भावनाओं
से ओत.प्रोत
होती है लोक
कलाएं संस्कृति
का श्रृंगार
करती हैं
चुनौतियों से
जूझते हुए लोक
कलाएं समाज को
ऊर्जा और
चेतना प्रदान करती
हैं हमारे देश
में पृथ्वी को
धरती माता कहा
गया है
मातृभूमि तो
इसका
सांस्कृतिक
तथा विकसित
रूप है इसी
भारतीय इसी
धरती माता का
श्रद्धा से
अलंकरण करके
लोक मानव ने
अपनी आत्मकथा
का परिचय दिया
हमारे देश में
प्रत्येक
राज्य में अलग
नाम से लोक
कला को जाना
जाता है कहीं
रंगोलीए
मांडना तो
कहीं
सांझीएअल्पना।
हर क्षेत्र
में जनमानस
ने
किसी न किसी
रूप में
अपने मन के उद्गारों को लोक
कला के रूप
में व्यक्त
किया है जो
सराहनीय है
लोक कला
से अभिप्राय
लोक
कला के उद्भव
और विकास की
कहानी अनंत है
मानव जीवन के
अभ्युदय के
साथ लोक कला
का भी जन्म
हुआ है मानवता
के विकास के
साथी वह भी
आगे भी बढ़ी
हैलोक कला से
अभिप्राय उस
कला से है जो सामान्य
जनजीवन की
सहजए
स्वाभाविक और
सामूहिक
अभिव्यक्ति
के रूप में
विकसित होती
है। ष्लोकष्
का अर्थ है
जनसामान्य या
समुदायए और
ष्कलाष् का
अर्थ है
सृजनात्मक
अभिव्यक्ति।
अतः लोक कला
वह कला है जो
किसी विशेष
वर्ग तक सीमित
न होकर समाज
के व्यापक
वर्ग द्वारा
सृजित और
संरक्षित की
जाती है। यह
कला
शास्त्रीय
बंधनों से
मुक्त होकर
परंपराए
अनुभव और आस्था
पर आधारित
होती है।लोक
कला का उद्भव
मानव की दैनिक
आवश्यकताओंए
धार्मिक
विश्वासोंए
उत्सवों और
प्रकृति के
साथ उसके
संबंधों से
जुड़ा है।
इसमें जीवन के
सुख.दुखए
रीति.रिवाजए
विवाहए जन्मए
फसल कटाईए
पर्व.त्योहार
आदि का चित्रण
प्रमुखता से
मिलता है। लोक
कलाकार प्रायः
औपचारिक
शिक्षा
प्राप्त नहीं
होतेए किंतु
उनकी कला में
गहन संवेदनाए
प्रतीकात्मकता
और
सौंदर्यबोध
विद्यमान
रहता है।प्राकृतिक
रंगोंए
स्थानीय
सामग्री और
पारंपरिक रूपांकनों
का प्रयोग लोक
कला की
विशेषता है। यह
पीढ़ी.दर.पीढ़ी
मौखिक परंपरा
से हस्तांतरित
होती रही है।
इस प्रकार लोक
कला केवल
सौंदर्य की अभिव्यक्ति
नहींए बल्कि
सांस्कृतिक
पहचानए सामाजिक
मूल्यों और
सामुदायिक
चेतना की सशक्त
अभिव्यक्ति
है।
प्रत्येक
क्षेत्र की
जनता की अपनी
कला होती है
जिसके पीछे
वहां के आम
आदमी की
श्रद्धा आस्था
परिलक्षित
होती है हमारा
देश देवों की
भूमिका कहा
जाता है इसमें
कोई संदेह
नहीं जनमानस की
ईश्वर के
प्रति आज भी
आस्था है
जिसको हर क्षेत्र
में अपने.अपने
तौर तरीकों से
अपनी परंपरा
द्वारा बनाकर
अपनी आस्था को
व्यक्त किया
जाता है
जगह.जगह की
लोक परंपरा का
संक्षिप्त
में विवरण इस
प्रकार है.
मांडना
कला
राजस्थान
मांडना कला
राजस्थान की
एक प्राचीन
लोक अलंकरण
परंपरा हैए
जिसका संबंध
मुख्यतः
ग्रामीण एवं
जनजातीय जीवन
से है।
ष्मांडनाष्
शब्द का अर्थ
हैकृसजाना या
अलंकृत करना।
यह कला विशेष
अवसरों जैसे
दीपावलीए
होलीए विवाहए
संक्रांति और
अन्य मांगलिक
उत्सवों पर
घरों की दीवारों
तथा आँगनों
में बनाई जाती
है। परंपरागत रूप
से इसे
महिलाएँ
बनाती हैंए जो
इसे पीढ़ी.दर.पीढ़ी
सीखती और
सिखाती आई
हैं।मांडना
बनाने के लिए
भूमि या दीवार
को पहले गोबर
और मिट्टी से
लीपकर समतल
किया जाता हैए
फिर खड़िया (चूने) या सफेद
मिट्टी से
विभिन्न
ज्यामितीयए पुष्पीय
तथा
प्रतीकात्मक
आकृतियाँ
अंकित की जाती
हैं। इसमें
स्वस्तिकए
कमलए चौपड़ए
दीपए
पगचिह्नए
पशु.पक्षी और
देवी.देवताओं
से जुड़े
प्रतीकों का
विशेष स्थान
होता है।
आकृतियों में
संतुलनए लय और
समरूपता का
सुंदर संयोजन
दिखाई देता
है।मांडना
कला केवल
सजावट भर नहींए
बल्कि शुभताए
समृद्धि और
पारिवारिक
मंगलकामना का
प्रतीक है। यह
राजस्थान की
सांस्कृतिक
चेतना और
स्त्री.सृजनशीलता
की सशक्त अभिव्यक्ति
हैए जो आज भी
ग्रामीण जीवन
में अपनी जीवंत
उपस्थिति
बनाए हुए है।
अल्पना (पश्चिम
बंगाल)
अल्पना
पश्चिम बंगाल
की एक
पारंपरिक लोक
अलंकरण कला
हैए जो विशेष
रूप से
धार्मिक एवं
मांगलिक
अवसरों पर
बनाई जाती है।
ष्अल्पनाष्
शब्द संस्कृत
के ष्अलेपनष्
से बना हैए
जिसका अर्थ
हैकृलेप करना
या सजाना। यह
कला प्रायः
घरों के आँगनए
पूजा.स्थल और
द्वार पर चावल
के घोल (पिठार) से
बनाई जाती है।
इसे मुख्यतः
महिलाएँ
तैयार करती
हैं और यह
परंपरा
पीढ़ी.दर.पीढ़ी
हस्तांतरित
होती रही
है।अल्पना
में
ज्यामितीय
आकृतियाँए
कमलए शंखए
पाँव के
चिन्हए
सूर्यए चंद्र
तथा
देवी.देवताओं
से जुड़े
प्रतीक बनाए
जाते हैं।
दुर्गा पूजाए
लक्ष्मी
पूजाए विवाह
और अन्य
धार्मिक
अनुष्ठानों
में इसका विशेष
महत्व है। इन
आकृतियों में
लयए संतुलन और
सजावटी
सौंदर्य
स्पष्ट दिखाई
देता है।अल्पना
केवल सजावट का
माध्यम नहींए
बल्कि शुभताए
समृद्धि और
आध्यात्मिक
आस्था की
अभिव्यक्ति
है। यह पश्चिम
बंगाल की
सांस्कृतिक
परंपराए लोक
विश्वास और
स्त्री.सृजनशीलता
का सुंदर
प्रतीक मानी
जाती हैए जो
आज भी आधुनिक
समय में अपनी
प्रासंगिकता
बनाए हुए है।
सांझी
उत्तर
प्रदेशद्ध.सांझी
कला उत्तर
प्रदेशए विशेषतः
मथुरा.वृंदावन
क्षेत्र की एक
प्राचीन
धार्मिक लोक
कला हैए जिसका
संबंध मुख्य
रूप से
राधा.कृष्ण
भक्ति परंपरा
से है।
ष्सांझीष्
शब्द
ष्सांझष् से
बना हैए
क्योंकि यह
कला संध्या
समय मंदिरों
और घरों में
बनाई जाती थी।
परंपरागत रूप
से यह कला
कागज़ को
बारीकी से काटकर
स्टेंसिल
तैयार करने और
उसके माध्यम
से रंग भरने
की तकनीक पर
आधारित
है।सांझी
चित्रों में
श्रीकृष्ण की
लीलाएँए रास
नृत्यए गोप.गोपियों
के दृश्यए
वृंदावन के
उपवन तथा
यमुना तट के
दृश्य प्रमुख
रूप से अंकित
किए जाते हैं।
इसमें अत्यंत
सूक्ष्म
रेखांकन और
सजावटी शैली
का प्रयोग
होता हैए जो
कलाकार की
कुशलता को
दर्शाता है।
प्रारंभ में
यह कला
मंदिरों की
सजावट और
भक्ति.भाव की
अभिव्यक्ति
का माध्यम थीए
किंतु समय के
साथ यह कागज़ए
कपड़े और अन्य
माध्यमों पर
भी विकसित
हुई।सांझी
कला केवल
चित्रांकन
नहींए बल्कि
भक्तिए
सौंदर्य और
सांस्कृतिक
परंपरा का
संगम है। यह
उत्तर प्रदेश
की समृद्ध
वैष्णव
परंपरा और लोक
सृजनशीलता की
अनुपम
अभिव्यक्ति
मानी जाती हैए
जो आज भी अपनी
विशिष्ट
पहचान बनाए
हुए है।
इसी
प्रकार
गढ़वाल का
अपना तथा
बिहार का ओपन
आदि सब
धर्मानित लोक
कला का देवता
है यह मंगल का
अपना का कार्य
भारत में सदा
से नई ही करती
आई है इन सभी
लोक कलाओं में
नारी का ही
योगदान रहा है
वही अपने
परिवार की
मंगल कामना के
लिए घर में
रहकर विभिन्न
देवी देवी
शक्तियों की
विभिन्न
प्रकार के
क्रियाकलापों
से अर्चना पूजा
करती है
प्राचीन काल
से अभी तक
चिन्ह और आकृतियों
की दैविक
शक्ति के रूप
में यह परंपरा
चली आ रही है
और यह है यही
लोक चित्रकार
के रूप में आज
तक हमारे
सामने आती है
इन लोग
चित्रों में
एक प्रकार के
लिए गति रंग आदि
की समुचित
योजना होती है
इन चित्रों
में अलौकिक
आकर्षण होता
है रंगों का
संयोजन
पृष्ठभूमि को
देखते हुए
किया जाता है
यदि प्रश्नों
में लाल या
अन्य गहरे रंग
की है तो सफेद
खादी है या
चावल को पीसकर
सफेद रेखाओं
से आकृतियां
बनाई जाती हैं
सफेद
पृष्ठभूमि पर
गेरुआ या लाल
में पीले
रंगों का
चित्रण किया
जाता है चावल
आटा हल्दी और
गैरों का
प्रयोग लगभग
सारे देश के लोग
चित्रों में
प्रयोग मिलता
है चित्र सादगी
वह धार्मिक
भावना से वह
स्रोत होते
हैं इन्हें
देखते ही मन
में श्रद्धा
वह धर्म की
भावना जागृत
होती है लीला
गोडवानी की प्रथा
भी हमारे देश
में बहुत
पुरानी है
इसमें शरीर पर
नीले रंग से
खाल में किसी
यंत्र द्वारा
चित्रण कराया
जाता है जो
जीवन पर्यंत
बना रहता है
निष्कर्ष
इस
प्रकार
उपयुक्त
विवरण से हम
कह सकते हैं
कि लोक
चित्रकारों
से भी हमारे
चित्रकारों
को बड़ी
प्रेरणा
मिलती है लोक
कला पर आधारित
नए प्रयोग आज
के कलाकारों
को अपूर्व
सफलता की ओर
ले जा रहे हैं
इस प्रकार लोक
कला सोते ही
अपने सहज और
निर्मल रूप
में हमारे
जीवन का एक
अंग बन गई है
इस आत्म्यता
तथा निकटता के
कारण लोक कला का
प्रभाव
मनुष्य पटेल
पर अपनी
चिरस्थाई स्थान
बना लेता है
यदि हम अपने
देश की लोक
कलाइयां का
बारीकी से
अध्ययन करें
तो उसमें हमें
अनेकता में
एकता के दर्शन
भी होते हैं
क्योंकि यह
भारतीय
संस्कृति की
आत्मा वैभव
आत्मक एकता को
सजा अतीत की
महानतम
परंपराओं को
आज भी बनाए
हुए हैं इसमें
सदा से मानव
कल्याण का भाव
छिपा है सर्व
भौतिक सुख
समृद्धि का उन्नति
लोक कला का
आधार है भारत
की लोक कलाएँ देश
की
सांस्कृतिक
आत्मा और
सामाजिक
चेतना की सजीव
अभिव्यक्ति
हैं। ये कलाएँ
केवल सौंदर्याभिव्यक्ति
का माध्यम
नहींए बल्कि
लोकजीवन की
परंपराओंए
आस्थाओंए
उत्सवों और
सामूहिक
अनुभवों का
दस्तावेज भी
हैं। विभिन्न
प्रदेशों में
विकसित विविध
लोक
कलाएँकृजैसे
मधुबनीए
वारलीए
पत्तचित्रए
मांडनाए
अल्पना और
सांझीकृभारत
की
सांस्कृतिक
बहुलता और सृजनात्मक
समृद्धि को
दर्शाती हैं।
लोक
कलाओं की सबसे
बड़ी विशेषता
उनकी सामूहिकताए
प्रतीकात्मकता
और प्रकृति से
निकटता है।
यद्यपि
आधुनिकता और
वैश्वीकरण के
प्रभाव से
इनके स्वरूप
में परिवर्तन
आया हैए फिर
भी इनकी मूल
आत्मा आज भी
सुरक्षित है।
आवश्यकता है
कि इनके
संरक्षणए
संवर्धन और
अध्ययन के प्रति
जागरूकता
बढ़ाई जाएए
ताकि यह
अमूल्य धरोहर
आने वाली
पीढ़ियों तक
सुरक्षित रह
सके।
REFERENCES
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