Granthaalayah
BODY ORNAMENT ART TRADITION – ‘TATTOOING

Original Article

Body ornament art tradition – ‘Tattooing’

देह आभूषण कला परम्परा - ‘गुदना‘

 

Tinu Bala 1*, Dr. Aparna Anil 2  

1 Sarojini Naidu Government Girls Post Graduate (Autonomous) College, Shivaji Nagar, Bhopal, Madhya Pradesh, India

2 Professor and Head of Department, Department of Painting, Sarojini Naidu Government Girls Post Graduate, Autonomous, College, Shivaji Nagar, Bhopal, Madhya Pradesh, India  

QR-Code

CrossMark

ABSTRACT

English: Tattooing has been prevalent among tribal women in Madhya Pradesh since ancient times. Tattooing is the art of engraving indelible marks on the skin. This art is prominently practiced by various tribal communities in India. It is created as a form of prestigious ornamentation and beautification and is believed to precede death. Tattoo marks date back to 200 BC. Tattoos were found on the hands of women and on inscriptions found at Bharhut. The word "tattoo" is a form of Devanagari, meaning "writing" or "drawing." Traditionally, this art has been practiced as the process of inscribing figures, symbols, or ornaments on human skin. Each community practicing tattooing has its own meanings for the motifs and body parts. In addition to the body, similar motifs are also seen on walls and books on special occasions such as weddings and festivals.

 

Hindi: मध्यप्रदेश में जनजातीय महिलाओं में गोदना प्राचीन समय से प्रचलित रहा है। गोदना शरीर पर गोदने की एक कला है जो त्वचा की त्वचा में अखाद्य स्थान तय करती है। यह कला भारत में विभिन्न आदिवासी समुदायों द्वारा प्रमुखता से प्रचलित है। इसे प्रतिष्ठित आभूषण और सौंदर्गीकरण के रूप में बनाया जाता है और ऐसा माना जाता है कि यह मृत्यु से पहले है। गोदना के निशान 200 ईसा पूर्व के हैं। भरहुत में मिली महिला के हाथ और शिलालेख पर गोदना अंकित पाया गया । ‘गोदना‘ शब्द देवनागरी का एक रूप है, जिसका अर्थ है ‘लिखना‘ या ‘चित्र बनाना‘। पारंपरिक रूप से यह कला मानव त्वचा पर आकृतियाँ, प्रतीक या अलंकरण अंकित करने की प्रक्रिया के रूप में प्रचलित रही है।। गोदना कला का अभ्यास करने वाले प्रत्येक समुदाय के पास रूपांकनों और शरीर के अंगों के लिए अपने स्वयं के अभिप्राय होते हैं। शरीर के अलावा, विवाह और त्योहारों जैसे विशेष अवसरों पर दीवारों और किताबों पर भी इसी तरह के रूपांकन देखे जाते ह।

 

Keywords: Body, Art, Gudna, शरीर, कला, योनि    

 


प्रस्तावना

मध्यप्रदेश में जनजातीय महिलाओं में गोदना प्राचीन समय से प्रचलित रहा है। गोदना शरीर पर गोदने की एक कला है जो त्वचा की त्वचा में अखाद्य स्थान तय करती है। यह कला भारत में विभिन्न आदिवासी समुदायों द्वारा प्रमुखता से प्रचलित है। इसे प्रतिष्ठित आभूषण और सौंदर्गीकरण के रूप में बनाया जाता है और ऐसा माना जाता है कि यह मृत्यु से पहले है। गोदना के निशान 200 ईसा पूर्व के हैं। भरहुत में मिली महिला के हाथ और शिलालेख पर गोदना अंकित पाया गया । ‘गोदना‘ शब्द देवनागरी का एक रूप है, जिसका अर्थ है ‘लिखना‘ या ‘चित्र बनाना‘। पारंपरिक रूप से यह कला मानव त्वचा पर आकृतियाँ, प्रतीक या अलंकरण अंकित करने की प्रक्रिया के रूप में प्रचलित रही है।। गोदना कला का अभ्यास करने वाले प्रत्येक समुदाय के पास रूपांकनों और शरीर के अंगों के लिए अपने स्वयं के अभिप्राय होते हैं। शरीर के अलावा, विवाह और त्योहारों जैसे विशेष अवसरों पर दीवारों और किताबों पर भी इसी तरह के रूपांकन देखे जाते हैं।

गोदना प्रथा प्राचीन काल से चली आ रही है। महाभारत काल में श्री कृष्ण गोदनेवाले का रूप धारण करके राधा को गोदना गोदने गए थे। यह बताना कठिन है कि इसकी शुरुआत कब और कैसे हुई होगी। किन्तु यह बात सच है कि इस प्रथा की शुरुआत अपने कुनबे की पहचान के लिए हुई होगी। यही कारण है कि हिंदू धर्म में लगभग सभी जातियों में गोदना प्रथा का प्रचलन है। अपने हाथों में नाम लिखवाना या कोई धार्मिक शब्द लिखवाना इस प्रथा को बल देता है। कहीं जगह उल्लेख मिलते हैं कि ईसा से 1300 साल पहले मिस्र में गोदना गोदने की प्रथा प्रचलित थी। 1300 इसवीं पूर्व ही साइबेरिया में भी गोदना का प्रचार था। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गोदना को एक्यूपंचर का रूप मान सकते हैं। चीन में शरीर में सुई चुभाकर अनेक बीमारियों को ठीक किया जाता है। भारत में एक्यूपंक्चर पद्धति वर्ष 1959 में आई। इस पद्धति से शरीर के न्यूरो हार्मोनल सिस्टम को क्रियाशील किया जाता है। जनजातीय समुदाय के लोग इस तथ्य को मानते हुए स्वीकार करते हैं कि गोदना से सुंदरता के साथ-साथ वात रोग, चोट का दर्द व अन्य प्रकार के दर्द से राहत मिलती हैं।

भारत में गोदना की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। आदिवासी समाज, ग्रामीण महिलाएँ और विभिन्न जातीय समुदाय इसे अपनी सांस्कृतिक पहचान के रूप में अपनाते रहे हैं। कई जनजातियों में गोदना न केवल सौंदर्य का साधन है, बल्कि यह सामाजिक स्थिति, वैवाहिक पहचान और धार्मिक आस्था का भी प्रतीक है। गोदने के प्रतीक या अभिप्राय अक्सर प्राकृतिक तत्वों, देव-देवियों, पशु-पक्षियों, ज्यामितीय आकृतियों और पारंपरिक प्रतीकों से प्रेरित होते हैं।

गुदना जब अंग में गोदा जाता है तो इसका प्रमुख उद्देश्य सौंदर्य-वृद्धि ही होता है। कुछ आदिम कबीलों में यह प्रथा नितान्त भिन्न स्तर पर आनुष्ठानिक महत्व रखती है। किसी समय बिना गुदा अंग स्त्रियों के लिए लज्जा का विषय था। अर्द्ध-सभ्य एवं आदिम जातियों में आज भी इस प्रथा का प्रचलन है। गोदनों का आरम्भमूलरूप से दो उद्देश्यों के कारण हुआ-प्रथम कारण था गोदना के प्रतिरोधक अभिप्रायों का अलंकरण करके प्रतिकूल अभिचारों और जादू टोन्हें से सुरक्षात्मक कवच का निर्माण करना और दूसरा कारण था प्रजनन शक्ति को जागृत कर मातृत्व को अनुनेय बनाना। अतः यह तथ्य इन बातों से स्पष्ट हो जाता है कि गोदनों का आरम्भशारीरिक अलंकरण के उद्देश्य से कदापि नहीं हुआ था, जैसा कि अनेक नृतत्वशास्त्री मानते हैं। कालान्तर में अवश्य ही गोदना अंकन में सौन्दर्यपरक दृष्टिकोण का समावेश होने लगा और उसका विकास अलंकरण के रूप में स्थापित हो गया।

पुरातन समय से ही पुरूषों की अपेक्षा स्त्रियों को गोदना से अधिक अलंकृत देखा गया है। पुरुषों के अंगों पर शौकिया कोईं चिन्ह या उनके नाम या कभी-कभार ‘ॐ‘ आदि धार्मिक चिन्ह बनवाते देखा गया हैं। प्रदेश के भील, कोरकू, गोंड, बैगा, देवार, बिझवार, अगरिया, कंवर, कमार, भतरा, माड़िया, मुरिया, और अबूझ माड़िया स्त्रियाँ अपने अंगों पर बहुत अधिक गोदने गोदवाती हैं। अधिकांश आदिवासियों में पृथक-पृथक अभिप्रायों को गुदवाने का प्रचलन है। चेहरे पर, बाँह पर, वक्षस्थल पर, हाथों पर, जंघा पर, पिंडलियों पर और पीठ पर तथा पैर के पंजो और टखनों पर गोदने गुदवाये जाते हैं। नितम्ब एवं कटि प्रदेश में गोदने अंकित करवाना वर्जित है, उसका कारण शायद इन अंगों का वस्त्रों से ढका होना हो सकता है, दंडामी माड़िया, अबूझमाड़िया और बैगा स्त्रियाँ मस्तक पर भी गोदने गुदवाती हैं तथा भील स्त्रियाँ मस्तक पर सूर्य चन्द्रमा तथा आँखों की कोर और कनपटी के बीच में ‘चिरल्या‘ अभिप्राय गुदवाती हैं। प्रत्येक जनजाति के गोदने के अपने अभिप्राय हैं और वे अभिप्राय विशेष अंगों पर ही अंकित कराये जाते हैं कुछ जनजातियों में प्रचलित गोदना अभिप्राय अनेक अभिप्रायों को सम्मिलित करके एक संयुक्त अभिप्राय के रूप में अंकित किये जाते हैं। प्रायः शरीर के इन विभिन्न स्थानो पर गोदना के भिन्न-भिन्न अभिप्रायों को चित्रित कर शरीर के सौंदर्य को बढाया जाता है। जनजातीय समाज में गोदना सौंदर्य, सुरक्षा, पहचान, धार्मिक आस्था एवं सामाजिक संस्कार से जुड़ा होता है।

इसी कारण गोदना करते समय मिथकीय कथाएँ, देवी-देवताओं के स्मरण मंत्र, लोकगीत एवं परंपरागत कथन बोले जाते हैं, जिससे यह क्रिया पवित्र अनुष्ठान का रूप ले लेती है। प्रदेश की कुछ प्रमुख जनजातियां जो अपने गोदने के प्रतीक चिन्हो  के लिए भी जाने जाते है।

 

 

सहरियाओं ने राम-सीता लक्ष्मण के ग्रहस्थ जीवन के अनेक उपकरणों को गुदनों में शामिल कर उन्हें युगान्तर प्रतिष्ठा प्रदान की है। सहरिया महिलाएं कपाल पर टीका (अर्द्धचन्द्र और बीच में बिन्दी) गुदना सात-आठ साल की उम्र में गुदवाती हैं। यह कार्य-माता पिता के घर में समारोह-पूर्वक किया जाता है। फिर नाक पर चार दाना त्रिभुजाकार में बायें नथुने पर गुदवाये जाते हैं जिसका अर्थ चार कोठी अनाज है। बारीक-बारीक रेखाओं से उसकी सज्जा की जाती है। आसपास फूल, कंगूरे और दाने बनाये जाते हैं। सीता रसोई गोदने का अर्थ घर की सम्पन्नता से है। लौंग,सुपारी, पान तम्बाखू और पैसे रखने के लिये प्रचलित बटुवे का कलात्मक गुदना सहरियाओं के समृद्धि काल का द्योतक है।

 

 

भील स्त्रियाँ हथेली के पीछे की ओर या बाँह पर ‘राम जी का मुकुट‘ गुदवाती हैं। इन्हीं दोनों स्थानों में से एक स्थान पर ‘चैक‘ का अभिप्राय भी गुदवाया जाता है तो दूसरे पर राम जी के मुकुट का। दाहिने हाथ के अँगूठे के पृष्ठ भाग पर बिच्छू का अभिप्राय गोदा जाता है। दूसरे हाथ की हथेली के पृष्ठ भाग पर कमल के फूल का अभिप्राय गोदा जाता है। आंबामोर पिंडलियों पर या भुजापर गोदा जाता है। जिसमें आम के वृक्ष पर मयूर का अभिप्राय अंकित किया जाता है, जो पुष्पित आम्रवृक्ष के बौर के रस का पान करता हुआ होता है और यह अभिप्राय प्रजनन का प्रतीक है। बिच्छू का अभिप्राय सदैव ही अँगूठे पर गुदवाया जाता है और वह पुरुष के षिष्न का अभिप्राय है तथा प्रजनन की भावना उत्तेजित करने के उद्देश्य से अंकित करवाया जाता है।

 

इसी प्रकार बैगाओं में सबसे पहले कपाल पर गुदना गुदवाये जाते हैं। इसे बैगानी बोली में ‘कपाड गोदाय‘ कहते हैं। आठ साल तक पहुँचते-पहुँचते बालिका के कपाल पर भृकुटी के बीचो-बीच ‘व्ही‘ आकार का चूल्हा, तीन टिपका, खड़े वेंड़ा, और आडा बेंडा गुदवाते हैं। ‘व्ही‘ के बीच में एक बिन्दु या टिपका लगाया जाता है। जो अग्नि का प्रतीक है। खड़े और आड़े बेड़ा पेड़ पौधे प्रकृति का प्रतीक हैं जिस पर मनुष्य का जीवन चक्र केन्द्रित है। चूल्हा आदिम ऊर्जा और क्रियाशीलता का प्रतीक है, जिस पर मनुष्य का भौतिक जीवन निर्भर है।

 

 

 

गोंड जनजाति, हाथ, पोहचा, गले, छाती, मस्तक, पैर आदि शरीर के विभिन्न भागों में छ. सात वर्ष की उम्र से गुदवाना शुरू करते हैं। बैतूल में सबसे पहले भृकुटी पर अर्द्ध चन्द्राकार आकृति बिन्दु सहित गुदवाई जाती हैं।मंडला के गोंड सबसे पहले पोहचा गुदवाते हैं, फिर चेहरे पर बायीं आँख और गाल पर टिपका गुदवाया जाता है। नाक पर तीन टिपका गुदवाते हैं।

 

 

भारिया महिलाएँ मस्तक के गोदने के कारण अलग पहचानी जा सकती हैं। भारिया महिलाएँ बैगा आदिवासियों की तरह मस्तक पर बिन्दु कोण और बराबर आड़ी-खड़ी रेखाएं गुदवाती हैं, परन्तु दोनों भौहों पर धनुषाकार रेखा गुदवाने की प्रथा केवल भारिया आदिवासी महिलाओं में ही देखी गई है और यही भारिया महिलाओं की मौलिक पहचान है। इसे भारिया महिलाएं ‘कोर गुदवाना‘ कहती है। विवाह से पूर्व प्रत्येक लड़की को कोर गुदवाना अनिवार्य है।

 

 

कोरकू स्त्रियाँ पोंहचे और भुजा पर बहुत सुंदर और समृद्ध गुदने गुदवाती हैं। भुजा पर कोरकू स्त्रियाँ बाजूबँद, फूलखोपा, चिड़िया के पैर, बबूल, हिरण, बिच्छू की कतारें, विभिन्न प्रकार की घास, राम सीता सिहासन, नागमोरी, सूर्य, परेंडी, पदचिन्ह, चैक मांडना लिखवाती है। जाँघों पर विभिन्न प्रकार की घास, जिसे झारा गुदना कहते हैं, से अलंकरण किया जाता है। घास के विभिन्न रूप में फसलों के अंकुरित पौधे लहलहाते हुए दिखाई देते हैं। जांघ के घेरे में पंक्तिबद्ध हरित क्यारियां खेत का आभास देती हैं। जाँघ पर उकेरी गई अंकुरित फसल और वृक्ष के गुदने प्रजनन और वंशवृद्धि का संकेत है।

 

 

गुदने की स्याही बनाने की प्रकिया-मध्यप्रदेश में गोदना की परंपरा सदियों पुरानी है। महिलाएं इसे सौंदर्य और सामाजिक पहचान के रूप में अपनाती थीं। पारंपरिक तौर पर गोदना गुदवाने के लिए प्राकृतिक रंगों का प्रयोग किया जाता था, जो वनस्पतियों और मिट्टी से बनाए जाते थे। एक नुकीले उपकरण से इन रंगों को त्वचा पर उतारा जाता था। यह प्रक्रिया दर्दभरी और समय लेने वाली होती थी, लेकिन इसके सांस्कृतिक महत्व के कारण इसे सहर्ष स्वीकार किया जाता है। विभिन्न जनजातीय समुदाय में गोदना गुदवाने का ढंग अलग-अलग होता है। गोंड जनजाति में पारम्परिकगुदनाकार बदनिन का समाज में बड़ा सम्मान होता है। गुदने की स्याही बदनिन स्वयं तैयार करती हैं। पहले रमतिना को भूंज लेते हैं। भूंजने से रमतिला का लोंदा बन जाता है।लोदे को खपरेल में जलाकर काजल बना लिया जाता है। पानी में काजल को फेंटकर गाढ़ी स्याही बना ली जाती है। त्वचा पर काजल से पहले गुदना आकृति बना लीजाती है। फिर तीन या पांच सुइयों की कलम बनाकर काजल स्याही में डुबो-डुबोकर गुदना आकृति पर बाँधा जाता है। गोदना पूरा हो जाने के बाद गोबर और पानी से शरीर को धो दिया जाता है, इससे गुदना पकता नहीं। गोबर और पानी का घोल एन्टीसेप्टिक का कार्य करता है। बैगा आदिवासियों में बदनिन गुदने लिखने के लिए भिलवां रस, मालवन वृक्ष रस या रमतिला के काजल को तेल में घोल फैटकर तैयार किये लेप का इस्तेमाल करती हैं। बैंगाओं के गुदने मोटी लकीरों में गोदे जाते हैं । इसके लिए बदनिन दस-बारह सुईयों को बाँधकर कलम बनाती हैं। इसी कलम को लेप में डुबो-डुबोकर शरीर में चुभाकर गोदा जाता है। भारियाओं में गोदने का कार्य ओझा महिलाए पारम्परिक रूप से करती हैं। तिल्ली के तेल में काजल को अच्छी तरह फेंटकर तैयार किया गया लेप गोदने में काम आता है। तीन से पाँच सुई के समूह को काजल लेप में डुबोकर त्वचा में चुभाया जाता है। भीली अँचल में मंडला की बादी या ओझा की तरह किसी खास जाति की स्त्रियाँ गोदना कार्य नहीं करती हैं। यहाँ पुरुष भी गोदना कार्य करते हैं। गोदना करने की बहुत पुरानी पद्धति बालोर का रस और बबूल के कांटे हैं। बालोर के रस में काँटे को डुबो-डुबोकर त्वचा में रस को प्रवेश कराया जाता था। बियां के रस से भी गुदने लिखे जाते थे। लगभग सभी जनजातियों में गुदना की स्याही प्राकृतिक सामाग्री से तैयार की जाती है।

 

निष्कर्ष

आज के आधुनिक और वैश्विक समाज में गोदना एक बहुआयामी महत्व रखता है। यह परम्परा और आधुनिकता का संगम है, जो व्यक्ति की पहचान, सोच, आस्था और सौंदर्य का दर्पण बन चुका है। जहाँ पहले यह केवल एक लोक परंपरा था, आज यह आत्म-अभिव्यक्ति और सांस्कृतिक गर्व का प्रतीक बन गया है। गोदना, जिसे आज टैटू के नाम से जाना जाता है, भारत की प्राचीन परम्परा का एक जीवंत हिस्सा रहा है। यह केवल शरीर की सजावट नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक पहचान का प्रतीक रहा है। बदलते समय के साथ इसका स्वरूप बदला है, परंतु इसका महत्व और लोकप्रियता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है।

 

REFERENCES

Hansa, K. (1993–1994). Tribal and Folk Arts of Madhya Pradesh (मध्यप्रदेश आदिवासी और लोक कलाओं पर केंद्रित). Chaimasa, 10(33), 21.

Nirgune, V. (1991). Godna (गोदना). Chaimasa, 8(25), 44.

Nirgune, V. (2018). Cultural Heritage (सम्पदा). Madhya Pradesh Tribal Folk Art and Dialect Development Academy, 65.

Khare, J. (1991). Body Engraving: Godna (अंग रेखांकन – गोदना). Chaimasa, 8(25).

Kumar, A. (2016). Godna Traditions of the Baiga Tribe in Changing Environment (बदलते परिवेश में बैगा जनजाति की गोदना परम्पराएं).

Trivedi, R. (2011). Baiga (बैगा). Vanya Prakashan, 51.

     

 

 

 

 

Creative Commons Licence This work is licensed under a: Creative Commons Attribution 4.0 International License

© Granthaalayah 2014-2026. All Rights Reserved.