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THE Interrelationship of music and poetry in fine arts
ललित
कलाओं में
संगीत व काव्य
का
अंतर्संबंध
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Vineeta Verma
1 1 Head of Department,
Instrumental Music M. L. B.Sc. Bath. College Fort Ground, Indore, India |
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ABSTRACT |
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English: Art is humanity's eternal companion. Art originated with humanity's arrival on Earth. Art evolved alongside human development. The field of art holds a vast treasure, and its manifestations are diverse. Art mirrors society, and its function is therefore to fully express social life within society. In the rhythms of poetry, the colors of painting, the rhythms of dance, and the notes of music, the soul awakens to its fundamental form and merges with the Supreme in nature. Hindi: कला
मानव की
चिरसंगिनी
है। मानव के
पृथ्वी पर अवतरण
के साथ ही कला
का उद्गम
हुआ। मानव
विकास के साथ
ही कला का
विकास हुआ।
कला के
क्षेत्र में
अपार कोष है
तथा उसके
प्रत्यक्षीकरण
में विविधता
है। कला समाज
का दर्पण है
अतः कला का कार्य
अपने समाज
में सामाजिक
जीवन की
पूर्णरूपेण
अभिव्यक्ति। कविता
के छंदों में, चित्रकला
के रंगों में,
नृत्य
की लय में,
संगीत
के स्वरों
में, जो
आत्मा होती
है वह अपने
आधारभूत रूप
में जागृत हो
जाती है तथा
परम के साथ
प्रकृति रूप
में लीन हो
जाती है । Keywords: Arts, Music, Nada Brahma, कला, संगीत, नाद
ब्रह्म |
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प्रस्तावना
कला
मानव की
चिरसंगिनी
है। मानव के
पृथ्वी पर अवतरण
के साथ ही कला
का उद्गम हुआ।
मानव विकास के
साथ ही कला का
विकास हुआ।
कला के
क्षेत्र में
अपार कोष है
तथा उसके
प्रत्यक्षीकरण
में विविधता
है। कला समाज
का दर्पण है
अतः कला का कार्य
अपने समाज में
सामाजिक जीवन
की पूर्णरूपेण
अभिव्यक्ति। कविता
के छंदों में, चित्रकला
के रंगों में, नृत्य की
लय में, संगीत के
स्वरों में, जो आत्मा
होती है वह
अपने आधारभूत
रूप में जागृत
हो जाती है
तथा परम के
साथ प्रकृति
रूप में लीन
हो जाती है ।
संगीत
आनंद का
आविर्भाव
है।
आनंद ईश्वर
का स्वरूप है।
इसमें साध्य
और साधना
दोनों ही सुख
रूप है।
संपूर्ण
ब्रह्मांड
नाद
ब्रह्मा के
दो मुख्य
तत्वों से
सुसज्जित है व
शब्द ध्वनि
इसी की रूप
रेखा है। ध्वनि
जब अर्थ का
आवरण लेती है
तो शब्द का
रूप ले लेती
है। ध्वनि जब
रंजकता
प्रदान करती
है तो सांकेतिक
ध्वनि कहलाती
है।
वहीं
दूसरी ओर
काव्य वैभव का
स्मरण आते ही
उन प्रवृत्तियों
की ओर ध्यान
जाना
स्वाभाविक है
जिसके कारण
तत्कालीन
काव्य में
कलागत विशेषताओं
का प्राचुर्य
हुआ। इनकी
चकाचैंध में हमारी
दृष्टि काव्य
और संगीत के
चिरंतन समवाय के
आंतरिक मोक्ष
रूप से हटकर
उसे युग के
कवियों के
बाह्य
सौंदर्य
प्रदर्शन में
ही उलझ कर रह
जाती है।
परंपरागत गीत
शैली के ह्रास
के कारण इस
कला में काव्य
और संगीत का
शाश्वत संबंध
प्रच्छन्न
रूप में सामने
आता है। संगीत
के अनुस्यूत
काव्य माधुरी
युग युग में
मानव हृदय को रसप्लावित
करती आ रही
है। हृदय की
कल्पनाओं को
संगीत मानो
पंख प्रदान कर
देता है।
भारतीय
दृष्टि से
यद्यपि संगीत
के समान काव्य
स्वतः एक कला
नहीं है।
किन्तु काव्य
में भावों को
उत्कर्ष
प्रदान करने
के लिए काव्य
को विभिन्न
कलाओं का
सहारा लेना ही
पड़ता है।
कविता का
कला-पक्ष यही
है। इसके
संयोग से
काव्य की कृति
में
प्रेरणीयता आ
जाती है।
अलंकार, छन्द और
संगीत से
अलंकृत एवं
कला- संयुक्त
होकर कविता
दर्शन और
विज्ञान से
अलग हो जाती
है,
किन्तु इस
प्रकार काव्य
में जो
सौन्दर्य प्रस्फुटित
होता है वह
उसका साधन है, साध्य
नहीं। मनुष्य
को मनुष्यता
प्रदान करने
वाले जो भाव
हैं वे स्वतः
रसपूर्ण होते
हैं। भावों में
प्रभावोत्पादकता
उत्पन्न करने
का काम अभ्यासलभ्य
कला ही करती
है।
भावाभिव्यक्ति
की मार्मिकता
जिन बाह्य
उपादानों पर
निर्भर है, वे उपादान
काव्य के
सुगठित
कला-पक्ष पर
ही आधारित हैं
और इस
कला-पक्ष के
लिए संगीत
संदिग्ध रूप
से
उत्कर्षाधायक
सिद्ध होता
है।
निश्चय
ही काव्य की
आत्मा रस है।
वही उसका प्राण
है,
किन्तु
जिस प्रकार
प्राण का एक
मात्र आधार शरीर
है उसी प्रकार
काव्य के
भाव-पक्ष के
लिए उसका
कला-पक्ष
महत्वपूर्ण
है। भाव तो
वस्तुतः हैं
ही चिरन्तन, हां, उनकी
अभिव्यक्ति
का ढंग अवश्य
कवि की निजी
विशेषता है।
ऐसी कृतियाँ
किसी
वर्ग-विशेष को
नहीं अपितु
मानव मात्र को
आनन्द प्रदान
करती हैं।
व्यक्ति-विशेष
के विचारों
अथवा
अभिव्यक्ति
के माध्यम में
तो अन्तर हो
सकता है, किन्तु भाव
सदा एकरस और
सनातन हैं। ये
ही भाव काव्य
और संगीत के
विषय हैं, जो
अभिव्यंजन-कौशल
से समृद्ध होकर
सौन्दर्यानुभूति
की परिष्कार
और तृप्ति की
श्रेयभूत
क्षमता
प्राप्त कर
लेते हैं।
कविता
और संगीत में
इतना अधिक
सामंजस्य हैं
कि,
अनेक
पाश्चात्य
विज्ञान
कविता की
परिभाषा उपस्थित
करते समय उसकी
संगीतात्मकता
का भी उल्लेख
करना
अनिवार्य
समझते है।
संगीत जब आनंद
दायक विचारों
से युक्त होता
है,
तब उसे
कविता कहते
है।
पाश्चात्य
मनीषियों ने
भाषा
सौन्दर्य
निरूपण, कल्पना, छन्द आदि के
साथ संगीत को
भी काव्य के
लक्षणों में
महत्वपूर्ण
स्थान प्रदान
किया गया है।
विभिन्न ललित
कलाओं में से
संगीत और
काव्य का संबंध
इस कारण भी
गहरो हो जात
है कि, इतर
कलाए स्थित
रूप में रहकर
आनंद का
उद्रेक करती
है।
उदाहरणार्थ
कोई मूर्ति, कोई भव्य
भवन अथवा कोई
चित्र अपनी
पूर्णता के पश्चात्
स्थिर रूप
हमारे
नेत्रों के
सम्मुख आता है, किन्तु
संगीत और
काव्य दोनों
ही गतिशील
कलाएं है और
दोनों ही
कर्णेन्द्रिय
के माध्यम से
आनन्दोद्रेक
करती है। वैसे
संगीत के
अन्तर्गत गीत, वाद्य और
नृत्य तीनों
का समावेश हैं
इधर नृत्य का
विकसित रूप
नाटक है। अतः
दृश्य काव्य
और नृत्य
दोनों ही
नेत्र
ग्राह्य बन
जाते है। ध्वाने
और लय का
उपयोग कविता
और संगीत में
समान रूप से
होता है, संगीत जिन
भावनाओं की
सुक्ष्म और
निराकर अभिव्यक्ति
करता है, उन्हीं को
कविता साकार
रूप प्रदान कर
देती है।
उदाहरण के रूप
में सूरदास जी
के प्रद
जिनमें
भावानुकूल
राग योजना भी
काव्य के
भाव-वैभव की
समृद्धि में
अत्यधिक
सहायक हुई है।
उदारहणार्थ
पद दृष्टण्य
है
‘‘निस दिन
बरसत नैन
हमारे।
सदा
रहाते पावस
ऋतु हम पर जब
से स्याम
सिधारे’’
इस
उपरोक्त पद
में सूरदास जी
द्वारा
मल्हार राग का
चयन सोच समझकर
ही हुआ। इस
राग में स्वरों
की आर्द्रता, सुकुमरता
व्याकुलतता
और वेदना में
डूब कर सूरदास
जी की
भावाभिव्यक्ति
द्विगुणित
रूप से प्रभावशालिनी
हो उठी है।
कविता
जब तक गायी
नही जाती, तब तक वह
अपना पूर्ण
प्रभाव नही
डाल पाती और संगीत
भी जब तक गीत
से युक्त नही
हो तो तब तक
पूर्णतः
प्रभावोत्पादक
नही बनता। ताल
और स्वर के
साँचे में
ढलकर जब कविता
के शब्द आगे
बढ़ने लगते है, तब
प्रत्येक
पंक्ति में
जहाँ एक-एक
स्वर मार्मिक
संकेत
उपस्थित करता
है। वहां उसी
के साथ प्रयुक्त
होने वाला
एक-एक शब्द उन
संकेतों को मार्मिक
स्पष्टता
प्रदान करने
लगता है।
क्षेत्र
के विचार से
काव्य, संगीत
की अपेक्षा
विस्तृत है।
काव्य जहां सभी
भावनाओं की
सफल
अभिव्यंजना
में सक्षम है, वहाँ
संगीत
प्रधानतः वीर
करूण शान्त और
श्रृंगारिक
भावनाओं की ही
सफल
अभिव्यक्ति
में समर्थ है, किन्तु
अपने सीमित
क्षेत्र में संगीत
अजेय है, अपराजित है।
काव्य
कला का प्रभाव
मानव और वह भी
सहृदय मानव तक
ही सीमित है, किन्तु
संगीत की
शक्ति से
पत्थर तक पिछल
जाने की बात
यदि न भी मानी
जाय तब भी
संगीत का
प्रभाव
पशु-पक्षियों
पर बराबर देखा
जा सकता है।
कुछ
गुणों में
काव्य संगीत
से श्रेष्ठ है, तो कुछ
में संगीत भी
काव्य की
अपेक्षा उच्च
स्थान गृहण
किये हुये है, जो
विशेषतायें
संगीत में है, वह काव्य
में नही, और जो काव्य
में है, वह संगीत में
नही, इसलिये
काव्य और
संगीत एक
दूसरे की पूरक
कलाएं है, संगीत के
बिना काव्य
अधूरा है और
काव्य के अभाव
में संगीत।
सम्पूर्ण
संसार में
जितना काव्य
साहित्य उपलब्ध
है,
उसका
अधिकांश
छंदों में
लिखा गया है।
छन्दों का
संगीत
शास्त्र से
अटूट संबंध
है। संगीत की लय
मात्रा और ताल
का
विधान-धन्दो
में सम्पूर्ण
रूप में
व्याप्त रहता
है।
मात्राओं
की गणना से
संगीत में जिस
प्रकार विभिन्न
तालों का
निर्माण और
प्रत्येक ताल
के अवयवों का
विभाजन होता
है,
बहुत कुछ
उसी प्रकार
कविता में
छन्दो का विधान
होता है।
संगीत में जो
लय है, उसकी
गणना
मात्राओं से
होती है, इसी प्रकार
छन्द में भी
मात्राओं
द्वारा उसकी
गति का बोध
होता है, जो छन्द
मात्रिक नही
वर्णित होते
है,
उनमें भी
गुरू-लघु और
गणों का क्रम
एक निश्चित लय
के अनुसार
होता है।
कविता और
संगीत का यह घनिष्ठ
संबंध
सर्वथाा
स्पष्ट है।
संगीत
और अर्थ की
रमणीयता के
आभाव में
कविता अपने
वास्तविक
गौरव से वंचित
रहती है। फिर
भी अपने
स्वतंत्र रूप
में संगीत और
वस्तु है और
कविता और
शब्दविहिन
होकर भी संगीत
भावाभवियक्ति
में सफल होता
है।
गायको
में प्रचलित
तराना शैली
इसका स्पष्ट प्रमाण
है,
अर्थ
शून्य
‘‘तोम्, तननन्, देरेना’’
जैसे
निरर्थक
शब्दों से भी
संगीत द्वारा
श्रेाताओं
में, भावोद्दीपन
हो सकता है, किन्तु
संगीत का यह
अर्मूत रूप
है। भावपूर्ण शब्द
योजना के अभाव
में यह संगीत
उसी प्रकार अपनी
प्रभावोत्पादकता
में अधूरा रह
जाता है, जिस प्रकार
संगीत के अभाव
में काव्य।
हिन्दी
साहित्य के
प्रत्येक युग
में जिन विशिष्ट
प्रवृत्तियों
ने काव्य रचना
को सौष्ठव प्रदान
किया, उन्ही
के अनुरूप
संगीत भी
साहित्य के
साथ अपना
अबाध
संबंध
स्थापित किये
हुये बदलता
चला गया। इसका
कारण यही है
कि,
जिस
प्रकार संगीत
रागात्मक
अनुभूति की एक
ऐसी
अभिव्यक्ति
है,
जिसमें
चित रंजन की
क्षमता होती
है,
उसी
प्रकार कविता
भी जीवन की
रागात्मक
मनोवृत्ति
एवं
अन्तदर्शन की
ऐसी कलात्मक
अभिव्यक्ति
है,
जो
जन-मानस के
साथ रागात्मक
संबंध को
अक्षुका ही
नही रखती, अपितु
अपने
संवेदनात्मक
कोमल स्पर्श
से हृदय वीणा
को झंकृत करने
की भी अपूर्ण
क्षमता रखती
है। दोनों ही
सहृदय संवेद्य
है और दोनों
ही अपने
सूक्ष्म
बिम्ब रूप
संवेदनाओं
में आनंदप्रद
अतः कविता
शब्दों में
संगीत और
संगीत स्वरो
में कविता।
REFERENCES
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संगीत का
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सभ्यता
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और संगीत का
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परंपराएँ एवं
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Garg, M. (2010). Literature and Aesthetics (साहित्य और सौन्दर्य-बोध). Kanishka Publishers.
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