Original Article
Flowing Colors in the Paintings of Contemporary Experimental Artist Afzal Pathan: Reflections of Rural Landscape and Social Science and Their Interrelationship
समकालीन
प्रयोगवादी
कलाकार अफजल
पठान के
चित्रों के
बहते रंगों
में ग्रामीण
परिदृश्य और
समाजिक
विज्ञान की
झलक तथा अंतः
संबंध
प्रस्तावना
मराठा
रियासत कालीन
सिपाही, दफेदार, घुड़सवार, श्रीमान
अकाम खान तथा
माता हकीमन
बाई की कोख से
जन्मे अफ़ज़ल
खान का जन्म 1 अगस्त 1936 को हुआ।
अफ़ज़ल खान ने
अपनी
प्रारंभिक
शिक्षा आलोट
पाइंगा स्कूल
से प्राप्त
की। 1955
में श्रीनाथ
प्राथमिक
विद्यालय
देवास से कला
शिक्षक के रूप
में शुरूआत
करके 15
वर्ष तक
प्राथमिक
शिक्षक के पद
पर रहे! इसी के साथ
अफ़ज़ल जी ने
एलीमेंट्री
ग्रेड
परीक्षा के साथ
हाईस्कूल, इंटरमीडिएट
तथा नेशनल
डिप्लोमा इन
फाइन
एंड एप्लाइड
आट्र्स, इंदौर से
प्राप्त
किया।1968
में विक्रम
विश्वविद्यालय
से
स्वाध्यायी छात्र
के रूप में
चित्रकला में
स्नातकोत्तर
की उपाधि 1968 में ली।
(मध्य प्रदेश
राज्य लोक
सेवा आयोग से उच्च
शिक्षा में
सहायक
प्रोफेसर के
पद पर चयनित
हुए।
ग्वालियर में
गवर्मेंट
कॉलेज में सेवाएं
देकर शासकीय
गल्र्स कॉलेज, इन्दौर
एवं शासकीय
गल्र्स कॉलेज
देवास में अपनी
सेवाएं देकर 1990में
सेवानिवृत्त
होकर 1अक्टूबर
2000 को संसार
लोक को छोड़कर
अनंत यात्रा
पर निकल गए।
कला
यात्रा एवं
कला
प्रेरणाएं
अफ़ज़ल
पठान जी
सरकारी नौकरी
के साथ-साथ
अपनी सृजन में
अंतिम समय तक
लगे रहे और
लगभग 5000ज्ञात
चित्र
विभिन्न
अज्ञात चित्र
बनाएं।अपने
जीवन की
संपूर्ण
यात्रा में
महत्वपूर्ण कला
प्रदर्शनियों, कला
शिविरों तथा
कला समारोहों
में पठान जीने
भागीदारी की
जिनमें से कुछ
निम्न है-
1962: अखिल
भारतीय टैगोर
कला
प्रदर्शनी, इंदौर
1968: 77वीं
वार्षिक कला
प्रदर्शनी, आर्ट
सोसायटी, मुंबई
1970: 5वीं
अखिल भारतीय
कला
प्रदर्शनी
राजमुंदरी, आंध्र
प्रदेश
1972:
राष्ट्रीय
कला
प्रदर्शनी
ललित कला
अकादमी, नई दिल्ली
1974:
मध्यप्रदेश
कलाकार
प्रदर्शनी, भोपाल
आदि।
अफ़ज़ल
पठान सर ने कई
सोलों
प्रदर्शनियां
भी की जैसे
जहांगीर आर्ट
गैलरी, मल्हार
स्मृति मंदिर, देवास
प्रनति भारत
भवन भोपाल
आदि।
उन्होंने
पूरे भारत में
बहुत ग्रुप
प्रदर्शनियां
तथा दो आर्ट
केम्प भी किए।
1987: जम्मू--कश्मीर
एकेडमी ऑफ़
आर्ट एंड
कल्चर, श्रीनगर
1996: मध्य
प्रदेश
आर्टिस्ट
कैंप भोपाल
आदि।
अफ़ज़ल
की कला यात्रा
यथार्थ से
शुरू होकर
प्रभाववाद, उत्तर
प्रभाववाद, एवं वस्तु
निरपेक्ष,अमूर्त
कला के चरम
स्थिति को
प्राप्त
करतीहै अतः
कलाकार के
संपूर्ण
रचनाकाल को हम
तीन भागों में
बांटा जा सकता
है
1)
लैंडस्केप
·
यथार्थवादी
अध्ययन चित्र
·
अभिव्यंजनावादी
दृश्य चित्र
2)
पोट्र्रेट(शबीह)
चित्र
3)
अमूर्त
(वस्तुनिरपेक्ष)
चित्र।
19वीं सदी
के तीसरे दशक
के
उत्तरार्धमें
जन्मे अफ़ज़ल
अपने समझ के
साथ ही
रेखांकन व
चित्रांकन करने
लगे थे।
नेशनल
डिप्लोमा इन
ड्राइंग से
प्राप्त कर फाइनल
सबमिशन मुंबई
के जे.जे.
स्कूल आफ
आट्र्स में
जाकर करना
पड़ता था।
जिसका कारण
जे.जे. के तत्कालीन
कला शिक्षक
एवं टाइम्स आफ
इंडिया के प्रथम
कला संपादक
मिस्टर लेंग
हेमर का
प्रभाव पड़ा
तथा उस समय के
तत्कालीन
कलाकार
एस.एच.रजा, विष्णु
चिंचालकर, एन.एस.
बेंद्रे, श्रैणिक जैन, डी. जे.
जोशी जैसे
दृश्य
चित्रकारों
का प्रभाव भी
उस समय के नए
कलाकारों को
दृश्य चित्रण
की ओर खींच
रही थी, परंतु अफ़ज़ल
के लैंडस्केप
यूरोपीय
यथार्थवादी
लैंडस्केप की
परंपरा की
समान भारत में
एक स्वतंत्र
लैंडस्केप की
शुरुआत करते
थे।
स्वतंत्र
दृश्य चित्रण
की जो परंपरा
भारतीय चित्रकला
के इतिहास में
उस समय नहीं
थी या कह सकतें
हैं की विषय
के रूप में
दृश्य चित्र
नहीं बने
थे।प्रथम बार
गुरुदेव
रविंद्र नाथ
टैगोर ने
लैंडस्केप को
एक विषय के
रूप में
चित्रित किया
और उनके
लैंडस्केप
अभिव्यंजनावादी
थे। इस
तारतम्यता
में ही अफ़ज़ल
जी के
लैंडस्केप भी
ऐसे होते थे
कि वह यथार्थ
तो है परंतु
यथार्थ
प्रकाश के साथ
वस्तुओं या
प्राकृतिक
उपादानों की
छाया का अभाव
था।
कला
शिक्षक होने
के नाते
वहअपने दृश्य
चित्रण में
दृश्य का
अध्ययन ’ऑन द
स्पॉट’ करते
थे इन चित्रों
में गांव,सड़क, पगडंडी, खेत, खलिहान, तालाब, नगर, गालियां आदि
को अपनी स्केच
बुक में
प्रकाश के साथ
बनाते थे। इस
तरह अपनी
स्केच बुक में
प्रकाश की
रंगंतों को
तथा इंटेसिटी
को चिन्हित कर
अपनी ड्राइंग
बुक में पेन
और पेंसिल से
प्रकाश की
आखिरी अंश को
पकड़ने का
प्रयास करते
थे।
लैंडस्केप
बनाते समय
उत्तर
प्रभाववादियों
या
फाववादियों
की तरह ओपेक
रंगों को ब्रश
तथा चाकू की
सहायता से
मोटी मोटी
परतों में वह
लगाकर दृश्य
चित्र बनाते
थे। प्रकाश के
रंग को और
अधिक चमकदार
बनाने के लिए
पोस्टर(टेंपरा)
रंगों में
ग्लिसरीन के
साथ-साथ गाय
और बकरी का दूध
मिलाकर साथ
में सफेद रंग
मिलाकर
विभिन्न प्रकार
की रंगतोका
प्रयोग करते
रहते जिससे
दृश्य एकदम
चमकदार हो
जाता है।
धूप
की अनेकानेक
रंगों को
ध्यान से
देखने पर दर्शन
इन रंगों से
रूबरू हो जाता
है जलरंगी दृश्य
चित्रों को
बनाते भी यह
कलाकार चित्र
समय एंजेल
रंगों की चमक
को बढ़ाने के
लिए गायब बकरी
के दूध का
इस्तेमाल
करते थे इनके
दृश्य चित्र में
पेड़ों की
पृष्ठभूमि के
रूप में आकाश
या पहाड़ व खेत
ही नजर आते
हैं पठान जी
के चित्र यथार्थ
सादृश्यता से
अलग आत्म
प्रेरित होते
दिखाई देते
हैं।
एक
तरफ पठान जी
कलाकार
ऑन द स्पॉट
दृश्य चित्र
बनाते वहीं
दूसरी ओर
स्टूडियो में
अपनी कल्पना
से चित्रों को
बनाकर
अभिव्यंजनावादी
प्रभाव को
कैनवास पर
दिखाते।इस
प्रकार वांग
गांग एवं
जॉर्ज बार्क
के समान रंगों
की मोटी
अपारदर्शी
परतों के रूप
में देशज एवं
लोकजीवन की
रंगतोका
इस्तेमाल
करके रवींद्र
नाथ टैगोर तथा
अमृता शेरगिल
की कला परंपरा
के आसपास खड़े
नजर आते।
व्यक्ति
चित्रों की
रचना कला
शिक्षक होने
के नाते
अकादमिक शैली
में तो करते
थे इसके अलावा
वह अपनी
व्यक्तिगत
शैली में भी
शबीह चित्र बनाते।
जिसमें सभी
एकेडमिक
सीमाओं को
तोड़कर आगे
निकल जाते हैं
तथा तकनीक व
माध्यम में
लगातार
प्रयोग करते
थे जैसे कोलाज,वाटर कलर, ऑयल कलर ,टेंपरा
आदि। जो भी
खास व्यक्ति
उनके संपर्क में
आता वह उनकी
व्यक्ति
चित्रों का
विषय वस्तु बन
जाता था इनमें
मुख्य रूप से
उनके छात्र मित्र, कवि, लेखक, गायक, नेता, साइकिल
रिपेयर करने
वाले, सभी
उनके चित्र
में हुआ करते
थे।


अफ़ज़ल
जी अपने काम
को चाहे वह
व्यावसायिक
हो या
अकादमिकअपनी
शैली व शर्तों
में ही किया
करते थे
व्यक्ति
चित्रों में
वह सूरत से
ज्यादा सीरत
को महत्व देना
पसंद करते थे, सभी चित्र
में व्यक्ति
सादृश्यता का
पक्ष उनकी
व्यक्ति
चित्रण में
गौंण था। अफजल
जी ने कई
महत्वपूर्ण
व्यक्तियों
के चित्र बनाए
और उन्हें
भेंट भी किया
पंडित कुमार
गंधर्व ,रज्जब अली
खान, साहब, महादेवी
वर्मा, श्रीमती
इंदिरा गांधी, लेखक
मित्र प्रभु
जोशी जैसी
हस्तियों के
साथ कई आम
मित्रों
केभी। आरंभ से
ही अफ़ज़ल ने
तकनीक को
तपस्या की तरह
महत्व देखकर
संपूर्ण रचना
काल में
प्रयोगवादी
बनी रहे और
प्रगति करते
गए इसलिए अफजल
की रचना
प्रक्रिया
में उन्हें
कभी अपनी भाव
को प्रकट करने
में कोई
मुसीबत का
सामना नहीं
करना पड़ा।
सामाजिक
विज्ञान तथा
ग्रामीण
परिवेश की झलक
उनके
चित्रों में
दिखाई देने
वाली
यूरोपियन प्रभाव
की छाप से यह
मतलब नहीं कि
वे पश्चिमी कलाकार
क्यूबे, दोमिये, मोने, पिसारो
तथा वान गॉग
आदि की चित्र
परंपरा का अनुसरण
कर रहे थे।
लेकिन पिसारो
की तरह
उन्होंने
बहुत अधिक
व्यक्ति-चित्र
बनाए, जो
यथार्थ से
कहीं दूर
निकलकर अधिक
अभिव्यंजनात्मक
नज़र आते हैं
तथा उनमें
प्रयोगात्मकता
की झलक स्पष्ट
दिखाई देती
है।
समकालीन
प्रयोगवादी
कलाकार अफ़ज़ल
जी के लैंडस्केप
में ब्रश के
स्ट्रोक्स
पोट्र्रेट की
अपेक्षा अधिक
बोल्ड बनते
हैं और अमूर्त
चित्रों में, जैसा कि
चित्र संख्या
में दिखाया
गया है, यही बोल्ड
स्ट्रोक अपना
आकार बड़ा कर
लेते हैं।
उनके चित्रों
में तकनीक के
साथ-साथ
माध्यम में
किए गए
प्रयोगों से
कुछ खिड़कियाँ
स्वयं खुल
जाती हैं। इन
खिड़कियों से
निकलता
प्रकाश चित्र
के परिवेश को
रोमांचक बना
देता है और ये
खिड़कियाँ
कैनवास के
चित्रपट पर
छोटे-छोटे सूर्यों
में तब्दील
होती जाती
हैं। इन
खिड़कियों से
निकलता
प्रकाश ऐसा
प्रतीत होता
है मानो किसी
बालक की कोमल, मधुर
खिलखिलाहट ने
पूरे चित्रपट
को रोशन कर दिया!
अफ़ज़ल
एक साथ कई
शैलियों और
माध्यमों में
कार्य करते थे, क्योंकि
उन्हें अपने
छात्रों के
बीच रहकर विभिन्न
तकनीकों, विद्याओं और
माध्यमों में
डेमोंस्ट्रेशन
देना पड़ता था।
इसके बावजूद
उनके कार्य की
मौलिकता उस
समय एक अत्यंत
महत्वपूर्ण
स्थान रखती थी।
कला
समाज का दर्पण
है एक और कला
समाज को प्रतिबिंबित
तथा आकार देता
दूसरी ओर समाज
कला को प्रेरणा, विषयवस्तु
और सजाता
सवांरता है।
मानव या कलाकार
समाज का ही
अभिन्न अंग
होता है मानव
की आवश्यकताओं
के लिए तकनीक
तथा विज्ञान
की आवश्यकता
होती है
प्रकृति की
भयंकरता हो या
सुंदरता, समाज की पीड़ा
या ।ऋंसदी, कलाकार की
सुखद कल्पना
या संवेदना, यथार्थता
सभी को कलाकार
प्राचीन
प्रागैतिहासिक
काल से ही
अपने कलागत
तत्व रेखा और
रंगों के
माध्यम से
प्रकट करता
रहा है वह समय
के साथ-साथ
समाज व प्रगति
में हो रहे
परिवर्तन से
अछूता नहीं
रहा। अतः समाज
कला और कलाकार
तीनों में एक
अंतर संबंध
होता है
माध्यम जो भी
हो
प्रागैतिहासिक
काल में
चट्टानों पर
गेरू, खड़िया
से,
सिंधु
घाटी में धातु
की मूर्तियां
मिट्टी की मूर्तियों
से,
प्रारंभिक
काल में पत्थर
की नक्काशी या
गुफाओं, दीवारों पर
चित्रों का
निर्माण कर, मध्यकाल
में प्राथमिक
चटक रंगों का
प्रयोग कर
सूक्ष्म
बारीक
आकृतियां, आधुनिक
काल में
प्राचीन
परंपरा को
त्याग कर कला
तथा कला की
तकनीकों तथा
माध्यमों में
प्रयोग कर एक
नए रूप का
निर्माण,जिसे हम आज
अमूर्त कला के
रूप में भी
जानते हैं।तात्पर्य
है कि हर युग
की कला उस युग
की समकालीन
होती है और
उसके संस्कारों, विचारों
को
संभाल कर
रखती है
अफजल
पठान जी के
चित्रों में
प्रकृति तथा
सामाजिकता
20वीं सदी
की समकालीन
कला में
कलाकारों ने
प्रयोगों के
माध्यम से कला
के कई रूपों
को प्रकट किया
मिक्स मीडिया, इंस्टॉलेशन, वीडियो
आर्ट, प्रयोगवादी
कला आदि।इन
प्रयोगों के
माध्यम से ही
मध्य प्रदेश
के समकालीन
कलाकार अफजल
पठान ने अपनी
अमूर्त
चित्रकला में
रंगों के बहते
रूपाकारों के
माध्यम से
अपनी भावनाओं
और विचारों को
व्यक्त किया।
उनके चित्रों
में प्रकृति
के टूटे-फूटे
किनारे, सीढ़ियां
चट्टानें तथा
ग्रामीण
अंचलों को प्रदर्शित
किया।अफजल जी
के चित्रों
में टूटे किनारे, बहते
रूपाकारों, ठोस पत्थर
सीउनकी
उपस्थिति और
अजीब सा उड़ता, बहता, रुकता,ठहरता
माहौल दर्शक
को कुछ सोचने
पर मजबूर ही नहीं
करता बल्कि
उसे देखने को
उकसाता है। यह
देखना
अचंम्भे से भर
जाता है इसमें
कोई परिचित रूप
नहीं है उनके
चित्रों में
एक दूसरे में
घुसते-फसतें, उलझते, अपरिचित
रूपाकर, अपने किनारो
से फटे- बहते
रंग लिए दर्शक
के मन में ऐसे
चित्र का बिंब
बनाते हैं जो
अपरिचित होते
हुए भी परिचित
होने का एहसास
दिलाता है। दर्शक
के मन में
उत्सुकता
पैदा होती है।
वह उनसे जुड़ा
हुआ महसूस
करने लगता है।
यह प्रयोगवादी
समकालीन
कलाकार अफजल
के असरदार
चित्रों का एक
दुर्लभ गुण
है।


चित्रों
में बहते
रंगोंके
रेखाओं तथा
रूपों की
संवेदना
अफजल
पठान की
चित्रकला में
रंगों की बहती
हुई संरचना और
उनका संयोजन
अत्यंत
आकर्षक है, अफजल के
चित्र बहते
हुए दरिया की
तरह दर्शक को
भिगोते हैं।
उनके उजले-
धुले अलौकित
रूपाकार में
प्रवाह है
बहने का, बहते रहने का
स्वभाव है।
प्रकृति की
गोद में पले
बढ़े अफजल पठान
जी के चित्रों
में समाज की गंभीरता
और प्रगति
रूपी विज्ञान
का एक अद्भुत संबंध
देखने को
मिलता है।
उनके चित्रों
को देखकर लगता
है कि उनके
चित्र स्थिर
नहीं है रूपाकार
स्थिर नहीं है
किंतु उनके
भीतर स्थिरता, गंभीरता, शांत
प्रियता और
गतिशीलता
देखने को
मिलती है। वह ठोस
चट्टान की तरह
लगातार बह रहे
हैं उनके चित्रों
में न्यूट्रल, म्युटेट
लाइट
बैकग्राउंड
पर तेल रंगों
का उपयोग कर
जल् रंगों के
समान वाश
तकनीक से रंग
लगाना,उनकी
प्रमुख
विशेषता रही
है। मुख्यतः
वह दबे हुए
तथा हल्के
धरातल पर गहरे
रंगों का
प्रयोग करते
थे।उनके
चित्रों में
ज्यादातर
पीला, काला
भुरा ,नीला, हरा, ओकर रंग
देखने को
मिलता है चटख
रंगों का
प्रयोग न करके
हमेशा गहरे
तथा
शांतप्रिय
म्युटेट रंगों
का प्रयोग
किया।
कहीं-कहीं
उन्होंने एकरंगीय
चित्रण भी
किया है जिसे
देखकर उनके
व्यक्तित्व
की गंभीरता
तथा चिंतनशील
प्रवृत्ति का
पता चलता है
प्रवाह और
गतिशीलता
उनके चित्रों
की विशेषता है
टेक्सचर्स और
रंगों की छोटी-छोटी
स्ट्रोक का
प्रयोग कर
अमूर्त चित्रों
के माध्यम से
उन्होंने
अपनी एक अलग
निजी शैली का
विकास किया, अनजाने ही
ऐसी विधियां
खोज ली जो
उनकी अभिव्यक्ति
के अनुकूल थी, जिन पर
उन्होंने
अपनी जिद में
फतह हासिल की।
वह जैसा चाहते
वैसा ब्रश
चलाते,रंग
भरते,जैसा
रूपाकार
चाहते वैसा
रूप धर लेते
थे। रूपाकार
उनकी मर्जी से
ठोस होते और
बहते। एक ही तकनीक
में काम करते
हुए भी उनके
अनेक चित्रों
में साम्यता
खोजना असंभव
है।
प्रयोग
शब्द जो
वैज्ञानिक
भाषा का शब्द
है,उनके
चित्रों में
प्रयोगवादी
तकनीकी पक्ष उतना
ही मजबूत था, जितनी
मुखर उनकी
कल्पना।उनकी
सफाई, उनमें
पारदर्शिता
और
अपारदर्शिता
के ऐसे मेल से
दर्शक
मुखातिब होता
कि उसे सहसा
विश्वास नहीं
होता कि यह
चित्र इंसानी
हाथों या
कलाकार ने
बनाए हुए
हैं।एक बार 80 के दशक
में उनकी
प्रदर्शनी
देखने देवास
में, भोपाल
से प्रसिद्ध
कलाकार
स्वामीनाथन
और रामकुमार
जी आए तो
रामकुमार जी
ने उनके
चित्रों से
हतप्रभ होकर
लिखाः-“चित्रों
को देखकर इतना
सुखद मधुर हुआ
कि मैं अभिभूत
होकर रह गया।
कभी कल्पना
नहीं की थी कि
देवास में इस
प्रकार का सुंदर
मौलिक काम
देखने को
मिलेगा“।
उनके
चित्रों से
प्रभावित
होकर उस वक्त
के कई युवा
कलाकार उस
दरिया में बह
निकले जो आज
भी बह रहे हैं
यह एक अंतहीन
बहना है।यह
अफजल का योगदान
है। अफजल का
अर्थ’श्रेष्ठ’
है और उनके चित्र
अब ’अफजीलियत’
का बोध
स्वाभाविक ही
कराते हैं।
अफजल का होना
एक घटना है और
उनके चित्र घटना
के प्रमाण है।

निष्कर्ष
बवदबसनेपवद
अतः
समकालीन
प्रयोगवादी
कलाकार अफजल
पठान के
चित्रों में
उनकी बौद्धिक
सामाजिक
मानवीय भावना
संवेदना का
परिचय मिलता
है ।अतः उनकी
कला में रंग
बनावट, विभिन्न
स्ट्रोक की
प्रस्तुति
दर्शक को भावात्मक
और बौद्धिक
स्तर पर जोड़ती
है पठान का कलात्मक
दृष्टिकोण
प्रयोगवाद और
परंपरा की संतुलन
को प्रदर्शित
करता है जो
समकालीन कला
में उनकी
विशिष्ट
पहचान को
रेखांकित
करता है समकालीन
प्रयोगवादी
कलाकार अफजल
पठान की कला में
सामाजिकता और
मानविकी
विज्ञान का एक
अद्भुत दृश्य
मध्य प्रदेश
के संदर्भ
में।
Note
This research paper is primarily based on primary data collected through direct observation of Afzal Pathan’s art exhibition. The study closely examines the artist’s use of colour, themes, and visual expression as presented in the exhibited artworks.
REFERENCES
Chaturvedi, M. (n.d.).
Samkālīn Bhāratīya
Kalā. Rajasthan Hindi Granth Academy.
Jain, S. (2018). Experiment Art: Ek analysis. International Journal of Research - Granthaalayah, 6(12), 1110. https://doi.org/10.29121/granthaalayah.v6.i12.2018.1110
Mago, P. (2000). Indian contemporary
art: One prospect. National Book Trust, India.
Verma, M. (2022). Tagore Monographs Series Afzal. Rabindranath Tagore University.
This work is licensed under a: Creative Commons Attribution 4.0 International License
© Granthaalayah 2014-2026. All Rights Reserved.