Original Article
Form and contemporary scenario of Aipan, the folk art of Uttarakhand
उत्तराखण्ड
की लोक कला
ऐपन का स्वरूप
एवं समकालीन
परिदृश्य
प्रस्तावना
भारत
की उत्तरी
सीमा पर स्थित
हिमालय
पर्वतीय
प्रदेश
“उत्तराखंड” न
केवल भारत में, बल्कि
संपूर्ण
पृथ्वी के
धरातल पर
विशिष्ट स्थान
रखता है। यह
विशाल पर्वत
श्रृंखला
भारत की
प्राकृतिक
सीमा बनाकर
अनेक रूपों
में जीवन
प्रदान करती
है। हिमालय का
प्रभाव
भारतीय उपमहाद्वीप
के जीवन, संस्कृति और
इतिहास पर
गहराई से पड़ा
है। यह क्षेत्र
भारत की
जलवायु, वनस्पति, जल-स्रोतों
और धार्मिक
जीवन को
प्रभावित करता
है। यहाँ की
भौतिक संरचना, वनस्पति, जीव-जंतु
तथा
सांस्कृतिक
धरोहर इसे
विशेष बनाते
हैं। हिमालय
क्षेत्र न
केवल भारत
बल्कि समस्त
विश्व के लिए
जल,
वनस्पति
और वन्यजीवों
का
महत्वपूर्ण
भंडार है।
धार्मिक
दृष्टि से यह
आस्था का
केंद्र रहा है, इसलिए इसे
“भारत का जीवन”
या “भारत की
आत्मा” कहा गया
है।“( Kharkwal (2024)
उत्तराखण्ड
हिमालय की गोद
में बसा वह
प्रदेश है
जहाँ लोक जीवन, लोक
संस्कृति और
लोक कला की
गहरी जड़ें
हैं। यहाँ की
प्रत्येक कला
शैली में
प्रकृति और
धर्म का सुंदर
समन्वय
दृष्टिगोचर
होता है।
इन्हीं कलाओं
में से एक है
“ऐपन” - जो
कुमाऊँ अंचल
की विशिष्ट
लोक कला है।
यह कला केवल
सौंदर्य
प्रदर्शन का
माध्यम नहीं, बल्कि
धार्मिक, सामाजिक एवं
सांस्कृतिक
मान्यताओं से
भी गहराई से
जुड़ी हुई है।
पारंपरिक
रूप से
महिलाएँ इसे
विशेष
पर्व-त्योहारों, यज्ञोपवीत, विवाह, नामकरण
संस्कार आदि
अवसरों पर घर
की चैखट, आँगन, पूजन
स्थल और
दीवारों पर
बनाती हैं।
ऐपन में प्रयोग
होने वाले
रूपांकनों
(जैसे
स्वास्तिक, लक्ष्मीपद, सुर्यचक्र, नवदुर्गा
यंत्र आदि)
जीवन की शुभता
और समृद्धि के
प्रतीक हैं।
ऐपण
कुमाऊँ की
पारंपरिक लोक
कला है, जिसका
धार्मिक व
सांस्कृतिक
महत्व
अत्यधिक है।
इसकी
उत्पत्ति
प्रागैतिहासिक
काल से मानी
जाती है और यह
आर्य व अनार्य
दोनों
संस्कृतियों
से जुड़ी है।
चन्द शासन काल
में यह कला विशेष
रूप से
लोकप्रिय
हुई। ऐपण
आरेखण जन्म से
मृत्यु तक के
संस्कारों और
पूजन-अर्चन
में अनिवार्य
भाग है।
चित्र 1
यह
कला बौद्ध
तंत्रों व
हिन्दू
यंत्रों से प्रभावित
है। इसके
रूपांकन में
प्रकृति और
प्रतीकात्मकता
का समावेश
होता है- जैसे
कमल, पक्षी, वृक्ष, मछलियाँ, बिंदु, रेखाएँ व
त्रिभुज। ऐपण
मुख्यतः
महिलाएँ उंगलियों
से गेरू की
पृष्ठभूमि पर
चावल के घोल
से बनाती हैं।
यह परंपरा
पीढ़ी-दर-पीढ़ी
माताओं से
पुत्रियों को
हस्तांतरित
होती आई है।“Rawat Singh (2024)
शोध
उद्देश्य (Objectives of the Study)
1)
ऐपन
कला की
परंपरागत
तकनीक और
प्रतीकात्मक
रूपों का
अध्ययन करना।
2)
ऐपन
कला के
सामाजिक-सांस्कृतिक
महत्व को समझना।
3)
समकालीन
समाज में ऐपन
कला के बदलते
रूप और उसके
व्यावसायिक
उपयोगों का
विश्लेषण
करना।
4)
आधुनिक
कलाकारों
द्वारा ऐपन
कला के नवाचार
और संरक्षण
प्रयासों का
अध्ययन करना।
शोध विधि (Research Methodology)
यह शोध
वर्णनात्मक
एवं
विश्लेषणात्मक
पद्धति पर
आधारित है।
इसमें
ऐतिहासिक स्रोतों, लोककथाओं, सांस्कृतिक
ग्रंथों, साक्षात्कारों, पत्र-पत्रिकाओं, और
वर्तमान समय
में कार्यरत
ऐपन कलाकारों
की जानकारी का
उपयोग किया
गया है। कुछ
क्षेत्रीय
भ्रमण और
स्थानीय
हस्तशिल्प
मेलों से प्राप्त
प्राथमिक
स्रोतों का भी
संदर्भ लिया
गया है।
ऐपन
कला का
ऐतिहासिक एवं
सांस्कृतिक
परिप्रेक्ष्य
आरेखण
व ऐपण, कुमाऊँ
की लोक कलाः (
इस बारे में
लिखित विवरण पूर्णरूपेण
विश्वम्भर
नाथ साह ’’सखा’’
के निर्देशन व
ज्ञान के
अनुसार और
क्षेत्राध्ययन
के आधार पर
संकलित किये
गए हैं। ) हर
क्षेत्र की अपनी
एक खास लोककला
होती है, जो वहाँ की
चित्रकला, भवन
निर्माण और
शिल्पकला में
दिखाई देती
है। उत्तरांचल
की लोककला भी
इसी तरह बहुत
समृद्ध और
महत्वपूर्ण
है। यहाँ की
लोककला में
रेखांकन, अभिव्यक्ति, चित्र, ऐपण, रंगोली, अल्पना, चैक, वस्त्र
छपाई, त्योहारों
पर बनाए जाने
वाले
पारंपरिक
चिन्ह, लकड़ी
का काम, बुनाई, आभूषण बनाना, बर्तन
बनाना और
मूर्तिकला
जैसी कई कलाएँ
शामिल हैं।
पर्व-त्योहार, शादी या
शुभ अवसरों पर
दीवारों और
जमीन पर शुभ
चिन्ह बनाने
की परंपरा
बहुत पुरानी
है। जमीन पर
बनाए गए
चित्रों को
रंगोली या
चैका और दीवारों
पर बनाए
चित्रों को
थापा कहा जाता
है। उत्तरांचल
में इस तरह के
चित्रांकन को
‘ऐपण’ कहा जाता
है। यह
लोकचित्रों
की सबसे
प्रमुख शैली है।
ऐपण का अर्थ
है-हाथ या
उंगलियों से
चित्र बनाना।
ऐपण
की खास
विशेषता यह है
कि इसे गेरू
और ‘विस्वार’
से बनाया जाता
है। विस्वार
भीगे हुए चावलों
को पीसकर
बनाया गया
सफ़ेद घोल होता
है। कुछ क्षेत्रों
में इसके
स्थान पर सफेद
मिट्टी (कमेड़)
का प्रयोग
किया जाता है।
ऐपण ज्यादातर
त्योहारों और
अनुष्ठानों
पर घर की
लड़कियाँ और महिलाएँ
बनाती हैं।
अलग-अलग
अवसरों पर
बनाए गए ऐपणों
के अलग नाम
होते हैं, जैसे-
लक्ष्मी पूजा
के लिए
‘लक्ष्मी
यंत्र’ या ‘लक्ष्मी
चैकी’, शिव
पूजा के लिए
‘शिवपीठ’ और
यज्ञोपवीत
संस्कार पर
‘जनेऊ’ ऐपण
बनाया जाता
है।
सबसे
अधिक ‘भूमि
ऐपण’ बनाए
जाते हैं।
त्योहारों पर
आँगन को पहले
गोबर-मिट्टी
से लीपकर
पवित्र किया
जाता है, फिर ऐपण
बनाया जाता
है। आँगन में
बनाए जाने वाले
ऐपणों को
‘खोली के ऐपण’
भी कहा जाता
है।
द्वार ऐपण
में घर के
मुख्य द्वार
को गेरू से
लीपकर उसके
ऊपर विस्वार
से चित्र बनाए
जाते हैं।
इसमें सूर्य, चन्द्रमा, गणेश, कलश आदि
बनाए जाते
हैं।
पिथौरागढ़ के
गाँवों में
द्वार ऐपण की
एक खास शैली
मिलती है जिसे
लोग ‘खाट’ कहते
हैं।
घर के
प्रवेश स्थान
को देहली कहा
जाता है। उत्तरांचल
में देहली
सजाने की
परंपरा बहुत
लोकप्रिय है।
यहाँ ‘देहली
ऐपण’ का एक
विशेष पर्व भी
मनाया जाता है, जिसे
‘फूलदेई’ कहते
हैं। इस दिन
हर घर में
देहली पर
सुंदर ऐपण
बनाए जाते
हैं। महिलाएँ
अपनी कल्पनाशीलता
से अपनी
कलात्मक
क्षमता
दिखाती हैं और
इसे शुभ माना
जाता है।
घर के
पूजा स्थान को
मिट्टी से
लीपकर ऊँची
वेदी पर बनाया
जाता है और
देवी-देवताओं
की स्थापना से
पहले वहाँ ऐपण
बनाया जाता
है। विवाह, यज्ञोपवीत
आदि अवसरों पर
लकड़ी के
पट्टों पर भी
ऐपण बनाए जाते
हैं। नामकरण
आदि में
सूर्यदर्शन
की चैकी तथा
धूलिअर्घ
जैसी विशेष
चैकियाँ
बनाकर उन पर
भी ऐपण बनाए
जाते हैं।“(
चंद्र बलूनी,2001 )
कुमाऊँ
की शास्त्रीय
परम्परा में
भित्ति-चित्रों
को पट्टलिखित
प्रतिमा कहा
जाता था। ये चित्र
कमेट
(मुल्तानी
मिट्टी) से
पुती दीवारों
पर इकहरी, दुहरी या
तिहरी अलंकृत
पट्टियों
वाले फ्रेम में
बनाए जाते थे।
बड़े फ्रेम
बनाने के लिए
लाल रंग में
भीगी सूत की
डोरी को
छिटकाकर
दीवार पर सटीक
चैकोर
पट्टियाँ
तैयार की जाती
थीं, जिन
पर सफ़ेद
पृष्ठभूमि
रखकर पुताल या
पुतलों का
मानव
आकृतियों का
चित्रांकन
होता था। यही प्रक्रिया
अवध प्रान्त
में भी दिखाई
देती है, जहाँ विशेष
अवसरों पर
मानव
आकृतियों के
पुतले बनाए
जाते थे।
समय
के साथ कुमाऊँ
में कागज़ पर
छपे
जन्माष्टमी, दुर्गाष्टमी, करवाचैथ, अहोई
अष्टमी आदि के
चित्र
प्रचलित हो गए, जिन्हें
लोग पूजा में
प्रयोग करने
लगे। फिर भी
कुमाऊँ की
लोकचित्र
परम्परा का
सबसे जीवंत रूप
भूमि
अंकन-विशेषकर
ऐपण-रहा है, जिसमें
उँगलियों से
चावल के घोल
से आकृतियाँ बनाई
जाती हैं। अवध
में भी यही
परम्परा
अडिपन के रूप
में देखने को
मिलती है, जहाँ कई
अवसरों पर
चावल के घोल
में हल्दी
मिलाकर चित्र
बनाए जाते
हैं।
दोनों
क्षेत्रों
में
देवी-देवताओं, मानव
आकृतियों और
पशु-पक्षियों
का अंकन लगभग समान
भाव से किया
जाता है, यद्यपि
आकार-प्रकार
में कुछ
आंचलिक
भिन्नताएँ
मिलती हैं।
कुमाऊँ में
चित्र
सामान्यतः अलंकृत
फ्रेम के भीतर
बनते हैं जबकि
अवध की लोककला
में यह बन्धन
अनिवार्य
नहीं है।
दीपावली
या शरद
पूर्णिमा पर
कुमाऊँ में
“लक्षिणी-पौ”
अर्थात्
लक्ष्मी के
पदचिन्ह बनाए
जाते हैं, जिनके बीच
बड़ी बिन्दी धन
का प्रतीक
होती है। इन्हें
उँगलियों या
मुट्ठी की छाप
से बनाया जाता
है,
कुमाऊँ
में विशेष
अवसरों पर बलि
दिए गए पशु के
रक्त से पंजों
की छाप लगाने
की परम्परा भी
मिलती है,
इस
प्रकार
कुमाऊँ की
लोकचित्र
परम्पराएँ अपने
ढंग से अलग
होते हुए भी
ऐतिहासिक रूप
से धार्मिक
अनुष्ठानों, लोक-श्रद्धा
और ग्रामीण
जीवन की समान
संवेदनाओं को
दर्शाती हैं।“Pandey (2014)
ऐपन
की तकनीक और
माध्यम
ऐपन
बनाने में
मुख्यतः लाल
मिट्टी (गेरू)
और चावल के
घोल (ओगन) का
प्रयोग होता
है। पहले आँगन
को गेरू से
लीपा जाता है, फिर ओगन
से आकृतियाँ
बनाई जाती
हैं। ब्रश की
जगह कपास की
बत्ती या
उँगलियों का
उपयोग किया जाता
है।मुख्य
रूपांकन हैं-
स्वस्तिक, लक्ष्मीपद, सूर्यचक्र, नवदुर्गा
यंत्र, पांव
चैकी, अष्टदल
कमल, इत्यादि।
लोक
कला मनुष्य के
भीतर मौजूद
नैसर्गिक
सौन्दर्य-बोध
से जन्मी कला
है। इसे
व्यक्त करने
के लिए लोग
आसपास उपलब्ध
प्राकृतिक
साधनों-जैसे
मिट्टी, गोबर, चावल, हल्दी, वनस्पतियाँ
आदि-का प्रयोग
करते हैं।
अलग-अलग पर्व
व अनुष्ठानों
पर अलग-अलग
प्रकार के
चित्र बनाए
जाते हैं और
उसी अनुसार
रंगों की
योजना भी
बदलती रहती
है।
लोक
चित्रों में
प्रायः कुछ ही
मूल रंग उपयोग
होते हैं-
श्वेत (पीसे
हुए चावल),पीला
(चावल व हल्दी),लाल (रोली),गेरू आदि।
लोककला
का ज्ञान पीढ़ी
दर पीढ़ी सहज
रूप से घरों
में ही सिखाया
जाता है। माता
अपनी पुत्री
को दैनिक
कामों के
साथ-साथ ऐपण
और अन्य
चित्रांकन
सिखाती रहती
है,
जिससे यह
परम्परा
निरंतर चलती
रहती है।
कुमाऊँ
में ऐपण बनाने
के लिए पहले
भूमि को गोबर
से लीपकर समतल
किया जाता है, फिर उस पर
गेरू लगाया
जाता है। थोड़ा
गीला रहते ही
“बिश्वार”
(भिगोए हुए
चावलों का
घोल) से पर्वानुसार
ऐपण बनाए जाते
हैं। दीवारों
या कागज पर
देवी-देवताओं
के चित्रों
हेतु आटा, मिट्टी के
रंग और
वनस्पति
रंगों का
प्रयोग किया
जाता है।
ऐपण
में उँगलियों
से रेखांकन
किया जाता है, जबकि अन्य
चित्रों में
रूई लपेटी
तीलियों का उपयोग
भी होता है।
बाजार के
साधारण रंगों
और वनस्पति-खनिज
रंगों को
गोंदयुक्त
पानी में घोलकर
भी चित्र बनाए
जाते हैं।“Pandey (2014)
रंग
योजनाः लोक
कला की
अभिव्यक्ति
मानव ने
प्रकृति से प्राप्त
सामग्री और
रंगों के
माध्यम से की।
विभिन्न
त्योहारों, पूजा-अनुष्ठानों
और अवसरों पर
अलग-अलग रंगों
और माध्यमों
का प्रयोग
किया जाता है।
भूमि और भित्ति
चित्रों की
पृष्ठभूमि
तैयार करने के
लिए प्रायः
गोबर, गेरू
या पीली
मिट्टी
(रामरज) का
उपयोग किया जाता
है। इसके बाद
गीले या सूखे
रंगों से
चित्रण किया
जाता है। रंग
बनाने के लिए
घरों में ही सामग्री
तैयार की जाती
थी,
जैसे सफेद
रंग के लिए
अहिपन (पीसे
चावलों का घोल), पीले के
लिए इसी घोल
में हल्दी, लाल के
लिए रोली, सिन्दूर
या गेरू।
कुमाऊँ
में पीला रंग
किल्मोड़ा
झाड़ी की जड़
उबालकर मिलता
है। भूमि
चित्रण में
गेहूँ का आटा, विभिन्न
दालें, चावल, बिस्वार
(चावल का घोल)
और मिट्टी का
प्रयोग परंपरागत
रूप से होता
है। कुमाऊँ
क्षेत्र के ऐपण
चित्र प्रायः
गेरू की
पृष्ठभूमि पर
बिस्वार से
बनाए जाते
हैं-जैसे
ज्यूत, घूलिअघ्र्य
चैकी, सूर्य
चैकी, सरस्वती
पीठ, दुर्गा
पीठ आदि। हर
देव-अवसर के
अनुसार अलग-अलग
पीठों का अंकन
किया जाता है।
अवध
क्षेत्र में
भूमि चित्रण
में सफेद
अहिपन का
विशेष प्रयोग
होता है, और पीले रंग
के लिए इसमें
हल्दी मिलाई
जाती है। रोली, गेरू और
गोबर से भी
चित्र बनाए
जाते हैं, विशेषकर
गोवर्धन पूजा
में। करवा चैथ
और अहोई अष्टमी
पर प्राकृतिक
और परंपरागत
रंगों से बने
चित्रों का
विशेष
महत्त्व है।
आधुनिक समय में
बाज़ार में
उपलब्ध तैयार
रंगों का
उपयोग भी बढ़ने
लगा है, परंतु
परंपरागत रंग
योजना आज भी
लोक कला की पहचान
बनी हुई है।‘‘Verma (2006)
ऐपन
कला का
धार्मिक और
सामाजिक
महत्त्व
ऐपन
में बनाए गए
प्रतीक शुभता, समृद्धि, मातृत्व
और सृष्टि के
प्रतीक हैं।
विवाह के अवसर
पर ‘अष्टदल
कमल’ देवी
लक्ष्मी का
प्रतीक माना
जाता है; वहीं
यज्ञोपवीत
में ‘नवदुर्गा
यंत्र’ बनाया
जाता है।
यह
कला समाज में
स्त्रियों की
सांस्कृतिक
भूमिका को भी
सशक्त करती
है:- क्योंकि
महिलाएँ ही
इसकी
परंपरागत
संवाहक हैं।
कुमाऊँ के
लोक-चित्र
मुख्यतः
धार्मिक
भावनाओं से
जुड़े होते हैं।
पर्व-त्योहारों, अनुष्ठानों
और संस्कारों
में महिलाएँ
ऐपण, चैकी
और
प्रतीकात्मक
आकृतियाँ
बनाकर पूजा की
तैयारी करती
हैं। इन
चित्रों में
सौन्दर्य तो
होता है, लेकिन मूल
उद्देश्य
धार्मिक
आस्था ही रहती
है।
दुर्गाष्टमी
(बिरुड़ाष्टमी)
में संतान-कामना
से जुड़े बिरुड़, दूब और
कुकुड़ी-माकुड़ी
के प्रतीक
बनते हैं और कथा
से सम्बंधित
पट्ट-चित्र भी
बनाए जाते
हैं।
नंदाष्टमी
में
नंदा-सुनंदा
की
मुखाकृतियाँ बनाई
जाती हैं।
हरेला पर्व
कृषि, ऋतुओं
और
शिव-पार्वती
की स्मृति से
जुड़ा है, जिसमें अनाज
बोकर उगे
तृणों को पूजा
में चढ़ाया
जाता है।
पार्थिव पूजा
में मिट्टी के
शिवलिंग और
शिव-पीठ का
अंकन किया
जाता है।
फूलदेई पर्व
में देहली पर
फूल बिछाकर
शुभता और
सांस्कृतिक
परम्परा का
सम्मान किया
जाता है। कुल
मिलाकर
कुमाऊँ की
लोक-परम्पराएँ
धार्मिक आस्था, प्रकृति
और जीवन के
संस्कारों को
चित्रों व प्रतीकात्मक
रूपों के
माध्यम से
अभिव्यक्त करती
हैं।
ऐपन
कला का
समकालीन
परिदृश्य
वर्तमान
युग में ऐपन
कला ने आधुनिक
माध्यमों में
प्रवेश किया
है। अब यह
कैनवास, वस्त्र, टोटबैग, वॉल पेंटिंग, डिजिटल
डिज़ाइन और
सिरेमिक
उत्पादों पर
भी देखी जा
सकती है।
सरकारी
संस्थाएँ
जैसे “कला कुंज”, “उद्योग
विभाग”, और
“हस्तशिल्प
मेला” ऐपन
कलाकारों को
प्रोत्साहन
दे रहे हैं।
ऐपन से
संबंधित
प्रशिक्षण शिविर, डिजिटल
डिज़ाइन
प्रोजेक्ट, और
स्कूल-कॉलेज
स्तर पर
कार्यशालाएँ
भी इस परंपरा
को जीवित रख
रही हैं।
उत्तराखंड की
कला परंपरा
उतनी ही
प्राचीन है
जितनी इसकी
सभ्यता और
संस्कृति।
यहाँ की लोक
कलाएँ, आल्पना, लिपि-चित्रण, भित्ति-चित्र
और मंदिरों की
मूर्तिकला-सदियों
से सामाजिक और
धार्मिक जीवन
का अभिन्न
हिस्सा रही
हैं। किंतु जब
हम उत्तराखंड
की समकालीन
कला की चर्चा
करते हैं, तो यह
केवल
पारंपरिक
लोकशैली तक
सीमित नहीं रह
जाती, बल्कि
आधुनिक जीवन
के अनुभवों, सामाजिक
परिवर्तनों
और वैश्विक
कलात्मक प्रभावों
को भी अपने
भीतर समेट
लेती है।
20वीं सदी
के
उत्तरार्द्ध
में, शिक्षा
और संचार
माध्यमों के
विकास के साथ
उत्तराखंड
में कलात्मक
दृष्टिकोण भी
बदला। कलाकारों
ने केवल
प्रकृति और
धार्मिकता तक
सीमित न रहकर, पलायन, स्त्री-जीवन, पर्यावरण
संकट, पहचान
और
सांस्कृतिक
द्वंद्व जैसे
विषयों को
अपनी कला में
स्थान देना
शुरू किया।
पारंपरिक
प्रतीक- जैसे
मंडल, देवालय, लोकनृत्य
की
आकृतियाँकृनए
माध्यमों
जैसे तेलरंग, ऐक्रेलिक, मिक्स्ड
मीडिया और
डिजिटल आर्ट
के साथ प्रस्तुत
होने लगे।
समकालीन
कला की
विशेषता यह है
कि यह स्थानीय
और वैश्विक
दोनों
दृष्टियों को
समाहित करती है।
एक ओर पहाड़ों
की शांत
प्राकृतिक
छटा, लोकगीतों
और मेलों की
छवियाँ दिखाई
देती हैं, तो दूसरी
ओर आधुनिक
समाज के
प्रश्न
आर्थिक विषमता, पर्यावरणीय
संकट, स्त्री
विमर्शकृभी
प्रमुख हो
जाते हैं। उत्तराखंड
के समकालीन
कलाकारों ने
अपनी रचनाओं से
यह साबित किया
है कि कला
केवल सौंदर्य
का साधन नहीं
बल्कि
सामाजिक
चेतना और
संवाद का भी माध्यम
है।
|
|
चित्र
2

चित्र
3

इस
प्रकार, उत्तराखंड
की समकालीन
कला परंपरा और
आधुनिकता के
संगम का जीवंत
उदाहरण है। यह
न केवल क्षेत्रीय
सांस्कृतिक
पहचान को
संरक्षित
करती है बल्कि
भारतीय
समकालीन कला
को भी एक नई
संवेदनशीलता
और दृष्टिकोण
प्रदान करती
है।
चित्र
4
|
|
उत्तराखंड
की समकालीन
कला का परिचय
आधुनिक कलाकारों
द्वारा राज्य
की संस्कृति, विरासत, आपदाओं और
लोक परंपराओं
को दर्शाने
वाले चित्रों, मूर्तियों
और अन्य
कृतियों के
माध्यम से मिलता
है,
जिसकी एक
प्रमुख
उदाहरण
उत्तरा
समकालीन कला संग्रहालय
(यूएमसीए) में
देखी जा सकती
है,
जो
केदारनाथ
आपदा से
प्रेरित है.
इसके अतिरिक्त, उत्तराखंड
की पारंपरिक
ऐपण कला भी
समकालीन कला
का एक अभिन्न
अंग है,‘‘( शर्मा,2025 ) जिसमें
कलाकार
आधुनिक
माध्यमों में
लोक कला के
तत्वों को
शामिल करते
हैं, इस
संग्रहालय
में सुरेंद्र
पाल जोशी की
कला कृतियों
क़ो संग्रहित
किया हुआ है , उनकी सभी
क्लाकृतियाँ
समकालीन कला
के साथ उत्तराखण्ड की बाढ़
विपदा क़ो
प्रदर्शित करती
है,
इनमे
उन्होंने नए
माध्यम के साथ
काम किया,जैसे कुछ
संस्थापान
कला में
सेफ्टी पिन का
प्रयोग किया, न्यू
मीडिया
का प्रयोग किया, डिजिटल
आर्ट ,फाइबर
ग्लास का
प्रयोग
आदि, ही
समकालीनीता
क़ो दर्शाते है, यह
उत्तराखंड का
पहला कला
संग्रहालय है, जो 2013 की केदारनाथ
आपदा और
उत्तराखंड की
लोक संस्कृति
से संबंधित
बहुआयामी
कलाकृतियों
को समर्पित
है। यह
सुरेंद्र पाल
जोशी द्वारा
बनाई गई
मूर्तियों, चित्रों
और अन्य कलाकृतियों
को प्रदर्शित
करता है,
चित्र
5
|
|
चित्र 6

इस
गैलरी का
प्रमुख
उद्देश्य है
कि नई और युवा
पीढ़ी के
कलाकार अपनी
प्रतिभा और
सृजनशीलता को
आमजन तथा
विशेषज्ञों
के सामने
प्रस्तुत कर सकें।
इससे उभरते
कलाकारों को
मान्यता (recognition) और
प्रेरणा (Motivation) मिलती है।
आधुनिक और
समकालीन कला
का प्रचार-प्रसार
,यहाँ उन
कलाओं का
प्रदर्शन
होता है जो
वर्तमान समाज, संस्कृति
और जीवन से
जुड़ी होती
हैं।समकालीन कला
में
प्रयोगधर्मिता
और नए
माध्यमों का
उपयोग होता है, जिसे
दर्शक सीधे
अनुभव कर सकते
हैं, कलाकारों
और दर्शकों के
बीच संवाद की
स्थिति बनती
है। युवा पीढ़ी
न केवल अपनी कला
प्रस्तुत
करती है, बल्कि
स्थापित
कलाकारों और
समीक्षकों से
सीखने का अवसर
भी प्राप्त
करती है।इस
प्रकार की आर्ट
गैलरी समाज
में कला के
प्रति
जागरूकता बढ़ाती
है। यह
सांस्कृतिक
धरोहर और
समकालीन संवेदनाओं
को जोड़ने का
कार्य करती
है।
ऐपण
एक
अनुष्ठानिक
लोक कला है, जो
उत्तराखंड के
कुमाऊँ
क्षेत्र की
मूल निवासी
है। इसे शुभ
अवसरों, त्योहारों
और यहाँ तक कि
किसी व्यक्ति
की मृत्यु के
समय किए जाने
वाले
अनुष्ठानों
के उपलक्ष्य
में बनाया
जाता है। यह
कला बुरी
शक्तियों से
सुरक्षा
प्रदान करने
के लिए भी
जानी जाती है।
जहाँ पहले यह
कला घरों के
फर्श और
दीवारों पर
दिखाई देती थी, वहीं आज
यह कई दैनिक
उपयोग की
वस्तुओं या
कपड़ों में भी
अपनी
उपस्थिति
दर्ज करा चुकी
है।‘‘( फ्यूल
फाउंडेशन,2018 )
चित्र
7

चित्र 8

ऐसा
प्रतीत होता
है कि
प्रारम्भ में
यह विधि दीवालों
के ऊपर
चित्रात्मक
आरेखण के रूप
में विकसित
हुई लेकिन
समयान्तराल
के साथ इस
शैली में
परिवर्तन आ
गया और
धीरे-धीरे और
’पट्टे के रूप
में इसे कागज, कपड़े या
लकड़ी, दैनिक
सामान्य जीवन
से सबमन्धित
जैसे चाय की केतली
पर ,
तकियों पर, नाम प्लेट
पर ,
साडियों
पर,
स्टी करके
रूप में
देखीं जा
सकती है , ऐपन गर्ल
मीनाक्षी
खाती इस कला
क़ो इन सभी
माध्यम में
करके ऐपन कला
क़ो एक नए
समकालीनता का
प्रयोग करके
ऐपन क़ो विश्व
स्तर पर पहचान
दिला रही है‘‘( Rawat Singh (2024),पृष्ठ 541 )
उत्तराखण्ड की सामकालीन कला में कलाकारों का योगदान
उत्तराखंड
की कला परंपरा
लोककला और
धार्मिक चित्रण
से जुड़ी रही
है। लेकिन 20वीं
शताब्दी के
उत्तरार्द्ध
से कलाकारों
ने नए प्रयोग
किए और कला को
आधुनिक
सामाजिक, सांस्कृतिक
और
पर्यावरणीय
प्रश्नों से
जोड़ा। इस
प्रकार
उत्तराखंड की
समकालीन कला
को नई पहचान
मिली।
1)
लोक
और परंपरा का
पुनराविष्कार
कई कलाकारों
ने जैसे-
मीनाक्षी
खाती, ऐपन
गर्ल ने
पारंपरिक ऐपन, मंडल, भित्तिचित्र
और लोक
आकृतियों को
आधुनिक कैनवास
और मिक्स्ड
मीडिया पर
प्रस्तुत
किया।इससे
लोककला को
आधुनिक
परिप्रेक्ष्य
और वैश्विक
मंच मिला।
2)
प्रकृति
और पर्यावरण
का चित्रण
रणवीर सिंह
बिष्ट, डॉ.
यशोधर मठपाल जैसे-
उत्तराखण्ड के
कलाकारों ने
हिमालय, नदियाँ, जंगल और
पर्यावरणीय
संकट को अपनी
कलाकृतियों
में विषय
बनाया। यह
कार्य
उत्तराखंड की
प्राकृतिक
पहचान को
संरक्षित
करता है। और
समकालीनता
को
प्रदर्शित करती है,
3)
सामाजिक
और
सांस्कृतिक
मुद्दे
सुरेंद्र
पाल जोशी , मोहमद सलीम, डीपी
कम्बोज,
अशोक
गुप्ता जैसे
कलाकारों ने ग्रामीण
जीवन, पलायन, स्त्री
विमर्श, और पहाड़ के
संघर्ष जैसे
विषय समकालीन
कलाकारों की
प्रमुख
प्रेरणा बने।
कला केवल
सौंदर्याभिव्यक्ति
नहीं रही, बल्कि
सामाजिक
दस्तावेज़ बन
गई। प्रसिद्ध
सामकालीन
महिला
चित्रकार
अंजलि इला
मेनन ने उत्तराख़ण्ड
की संस्कृति से
प्रेरित होकर
‘‘चार धाम
यात्रा‘‘
चित्र की रचना
की,
प्रमुख कलाकारों का योगदान
उत्तराखंड
अपेक्षाकृत
भारत का नया
राज्य है, पर यहाँ
की कला
परम्परा
प्राचीन है।
यदि इसके इतिहास
पर नजर डालें
तो मालूम होगा
कि यहाँ के
चन्द व
कत्यूरी आदि
राजाओं के समय
में मूर्तिशिल्प
और स्थापत्य
के क्षेत्र
में प्रभावपूर्ण
कार्य हुए थे।
अपनी विशिष्ट
दृश्यकला के कारण
यहाँ की गढ़वाल
चित्र शैली
भारतीय कला में
महत्वपूर्ण
स्थान रखती
है। कुमाऊँ के
लखुउड्यार, फलसीमा, कसार देवी, अल्मोड़ा
तथा गढ़वाल के
डुंग्री, चमोली में
प्रागैतिहासिक
शिला चित्रण
(रॉक पेन्टिग)
की विशेष
प्राचीन
परम्परा है।
मौलाराम, इफ्तबार खां, रणवीर
सिंह बिष्ट, रणवीर
सक्सेना व
अवतार सिंह
पंवार आदि इस
राज्य के ऐसे
नाम हैं, जिन्होंने
इस क्षेत्र को
चित्रकला तथा
मूर्तिकला
में अद्भुत
पहचान दी। इस
क्षेत्र में आधुनिक
कला
शिक्षा की
नींव रखने का
श्रेय प्रो.
रणवीर
सक्सेना को
जाता है, जो प्रतिभा
सम्पन्न
कलाकार थे।
लन्दन में इण्डिया
हाउस को
सुसज्जित
करने वाले
पाँच कलाकारों
में से एक वे
भी थे।
समकालीन
चित्रकला में
अविस्मरणीय
पहचान बना
चुके
कलाकारों में
उत्तराखण्ड
के कलाकारों
का एक
महत्वपूर्ण
स्थान है। यह
राज्य भारत के
कला परिदृश्य
में भी अपनी
एक विशेष
पहचान बना रहा
है। यह
समकालीन
कलाकारों की
जन्मभूमि व कर्मभूमि
रहा है।
जहाँ
के ऐतिहासिक
परिदृश्य में
मोलाराम को पहाड़ी
चित्रकला का
एक
महत्वपूर्ण
कलाकार माना
जाता है। इस
श्रेणी में
रणवीर सिंह
बिष्ट, श्री
यशोधर मठपाल, अवतार
सिंह पंवार, मुकुल
पंवार, मुहम्मद
सलीम, डॉ.
भगवती प्रकाश
काम्बोज, प्रो. रणवीर
सक्सेना, डॉ. शेखर
चन्द्र जोशी, ईशान
बहुगुणा, सी.एम. मिश्र, रघुवीर
सिंह पंवार, ज्ञानेश्वर
कुमार, पी.
के. सहाय, जगमोहन
बंगाणी व
संजीव आर्य
आदि कलाकार
प्रमुख हैं।
राज्य के बाहर
भी
उत्तराखण्ड
मूल के कलाकार
सुरेन्द्र
जोशी, पंकज
पंवार, एकेश्वर
हटवाल, मुकुल
पंवार, राम
प्रसाद डबराल, एम.एस. रावत, ईशान
बहुगुणा, सुनीता
घिल्डीयाल, देवेन्द्र
नायक व जे.
बंगाणी आदि
देश विदेश में
अपना
महत्वपूर्ण
योगदान दे रहे
हैं।
इन
पुरुष
कलाकारों के
साथ-साथ
उत्तराखण्ड
की कला में
महिला
कलाकारों ने
भी विशेष
योगदान दिया, जिनमें
प्रभा पंवार, विमला
बिष्ट, पूनम
शर्मा, पूर्णिमा
एवं आशा सहाय
आदि प्रमुख
हैं। चन्द्रा
बी. रसाली, अशोक
गुप्ता, मोहन सिंह
मावड़ी, धन
सिंह बिष्ट, एकता
बिष्ट, ऋचा
काम्बोज, संजीव चेतन, शशि झा, स्वर्णलता
मिश्रा, पी. के. सहाय, आशा सहाय, राजेन्द्र
लाल. सी.एन.
बहुखण्डी, रमेश
क्षेत्री, विधि
बिष्ट व
लक्ष्मी
प्रताप
थपलियाल आदि
ऐसे नाम हैं, जो आज की
समकालीन कला
को अपनी
सृजनात्मकता
से समृद्ध कर
रहे हैं। ये
सभी कलाकार या
तो जन्म से
उत्तराखण्ड
से सम्बन्धित
हैं, या
फिर इन्होंने
कला सृजन हेतु
उत्तराखण्ड को
अपनी
कर्मभूमि
बनाया।
समकालीन
कलाकार कितना
ही
प्रयोगधर्मी
रहा हो पर
उसका परिवेश
कहीं न कहीं
उसकी
कलाकृतियों
को प्रभावित
किए बिना नहीं
रहता। ऐसा
प्रभाव ही
उत्तराखण्ड
के कलाकारों
की कला में भी
परिलक्षित
होता है। उत्तराखण्ड
राज्य के गठन
के पश्चात
राजकीय स्तर
पर कई ऐसे
प्रयास किये
गये हैं, जिससे कला के
विकास में
उत्तरोत्तर
उन्नति हुई है, लेकिन
अन्य राज्यों
की अपेक्षा यह
राज्य अभी भी
कला के आधार
पर विकासशील
ही है।‘Kandpal (2020)
उत्तराखंड
की लोक कला
सदियों से
यहाँ की संस्कृति
और धार्मिक
जीवन का
अभिन्न अंग
रही है। इसमें
आल्पना, रंगोली, भित्ति
चित्र, मंडल, लकड़ी की
नक्काशी, लोकनृत्य और
लोकसंगीत
जैसी विविध
शैलियाँ शामिल
हैं।
पारंपरिक रूप
से यह कलाएँ
धार्मिक अनुष्ठानों, त्योहारों
और दैनिक जीवन
से जुड़ी रहीं।
किंतु
समकालीन
परिदृश्य में
इन लोक कलाओं
का स्वरूप बदल
रहा है।
उत्तराखंड
के कलाकारों
ने समकालीन
कला में परंपरा
और आधुनिकता
के बीच एक
सेतु का
निर्माण किया।
उनका योगदान न
केवल
क्षेत्रीय
पहचान को
संरक्षित
करता है, बल्कि
भारतीय
समकालीन कला
को भी नई
दृष्टि और संवेदनशीलता
प्रदान करता
है।
आधुनिक युग में चुनौतियाँ और संभावनाएँ
चुनौतियाँ
पारंपरिक
कलाकारों का
आर्थिक अभाव, बाज़ारी
प्रतिस्पर्धा, और युवाओं
में कम रुचि।
संभावनाएँ
ई-कॉमर्स प्लेटफार्म, टूरिज्म, फैशन
डिज़ाइनिंग और
गृह सज्जा
उद्योग में
इसकी बड़ी मांग
है। यदि उचित
प्रशिक्षण और
विपणन मिले, तो ऐपन
कला स्थानीय
रोजगार और
सांस्कृतिक
पहचान दोनों
को सुदृढ़ कर
सकती है।
दिसंबर
2019 में, मीनाक्षी
खाती ने
ष्मिनाकृतिष्
ऐपण प्रोजेक्ट
शुरू किया, जिसका
मकसद ऐपण कला
को फिर से
ज़िंदा करना
है। इस
प्रोजेक्ट के
तहत अब तक
हज़ारों कमीशन
वर्क ऑर्डर
पूरे किए जा
चुके हैं। यह
प्रोजेक्ट कुमाऊं
में ग्रामीण
परिवारों की
महिलाओं को कमाई
का मौका देने
के लिए एक्टिव
है। यह
प्रोजेक्ट
ऐसे घरों की
महिलाओं को
काम देता है
जो ऐपण बनाती
हैं और अपने
कस्टमर्स को
बल्क ऑर्डर डिलीवर
करती हैं।
भारत
सरकार ने ऐपण
कला जैसे
अलग-अलग
कल्चरल और
धार्मिक
प्रोडक्ट्स
के घरेलू
प्रोड्यूसर्स
को बचाने के
लिए
उत्तराखंड
हैंडलूम्स की
स्थापना की
है।
ऐपण
कला जैसे
अलग-अलग
कल्चरल और
धार्मिक प्रोडक्ट्स
के घरेलू
प्रोड्यूसर्स
को बचाने के लिए, भारत
सरकार ने 1860 में
सोसाइटीज़
रजिस्ट्रेशन
एक्ट, 1860 के तहत
उत्तराखंड
हैंडलूम एंड
हैंडीक्राफ्ट्स
डेवलपमेंट
काउंसिल (UHHDC) की
स्थापना की।
इसका मकसद
घरेलू आर्ट
प्रोडक्ट्स
को बढ़ावा देकर
लगातार
रोज़गार के
मौके पैदा
करना है।
उत्तराखंड
सरकार ने 2015 में तय
किया कि ऐपण
को दिखाने
वाली कला को
सरकारी ऑफिस
और बिल्डिंग
में दिखाने के
लिए खरीदा
जाएगा। कुछ
सरकारी
बिल्डिंग में
गढ़वाल मंडल
विकास निगम
चित्र
9
|
|
(GMVN), कुमाऊं
मंडल विकास
निगम (KMVN)
और उत्तराखंड
पावर
कॉर्पेरेशन
लिमिटेड (UPCL)
शामिल हैं। यह
फैसला हरीश
रावत की
अगुवाई वाले
राज्य के
टूरिज्म
डिपार्टमेंट
ने लिया था।
‘‘चेली
ऐपण‘‘ ऐपण कला
को बढ़ावा देने
के लिए सरकार की
एक पहल है; उत्तराखंड
की लोकल कला
को बढ़ावा देने
और कलाकारों
को बढ़ावा देने
के मकसद से, उत्तराखंड
के
रुद्रप्रयाग
के चोपता में
ऐपण रिज़ॉर्ट
बनाया गया था।
रिज़ॉर्ट का
मकसद लोकल कला
को एक जगह
दिखाना और उसे
उसके असली रूप
में दिखाना
है। युवा
एंटरप्रेन्योर्स
की एक टीम
द्वारा बनाया
गया यह
रिज़ॉर्ट
उत्तराखंड के बाहर
के लोगों के
सामने भी कला
को बढ़ावा देने
में काफी सफल
रहा है।
GI टैगः
कुमाउनी लोक
कला ऐपण को
सितंबर, 2021 में भारत
सरकार ने GI सर्टिफिकेट
दिया है।
निष्कर्ष (Conclusion)
ऐपन
कला
उत्तराखण्ड
की
सांस्कृतिक
आत्मा का प्रतीक
है। यह केवल
एक सजावटी कला
नहीं, बल्कि
स्त्री
सृजनशीलता, धार्मिक
आस्था और
सामूहिक
लोकभावना की
अभिव्यक्ति
है। समकालीन
परिदृश्य में
इस कला ने अपनी
पारंपरिक
जड़ों को बनाए
रखते हुए
आधुनिकता के
साथ सामंजस्य
स्थापित किया
है।
इसलिए, आवश्यक है
कि सरकार, कलाकार, और समाज
मिलकर ऐपन के
संरक्षण, प्रशिक्षण, और नवाचार
के प्रयासों
को निरंतर आगे
बढ़ाएँ ताकि यह
अमूल्य लोक
धरोहर आने
वाली पीढ़ियों
तक जीवित रह
सके।
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