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FOLK ART AND CLOTHING

Original Article

Folk art and clothing

लोक कला और वस्त्र श्रृंगार

 

Dr. Shraddha Malviya 1*, Dolly Khemchandani 2

1 Department of Sociology, Prime Minister's College of Excellence, Shri Atal Bihari Vajpayee

Government College of Arts and Commerce, Indore, Madhya Pradesh, India

2 Researcher, Prime Minister's College of Excellence, Shri Atal Bihari Vajpayee Government College of Arts and Commerce, Indore, Madhya Pradesh, India

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ABSTRACT

English: It's impossible to predict how long it took for the folk art of dyeing, which reveals the textiles of the time during excavations of the Indus Valley Civilization, to reach that stage. No concrete theory exists as to when and where the journey of dyed and printed textiles began.

 

Hindi: सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई के दौरान जो लोक कला रंगाई तत्कालीन वस्त्र श्रृंगार की जानकारी देता है उस स्थिति में पहुंचने में कितना समय लगा होगा यह बताना संभव नहीं है। रंगे छपे वस्त्रों की यात्रा कब और कहां प्रारंभ हुई इस पर कोई ठोस सिद्धांत सामने नहीं आता।

 

Keywords: Folk Art, Textile Adornment, Traditional Dyeing, Decorative Motifs, Cultural Continuity, लोक कला, कपड़ों की सजावट, पारंपरिक रंगाई, सजावटी डिज़ाइन, सांस्कृतिक निरंतरता

 


प्रस्तावना

सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई के दौरान जो लोक कला रंगाई तत्कालीन वस्त्र श्रृंगार की जानकारी देता है उस स्थिति में पहुंचने में कितना समय लगा होगा यह बताना संभव नहीं है। रंगे छपे वस्त्रों की यात्रा कब और कहां प्रारंभ हुई इस पर कोई ठोस सिद्धांत सामने नहीं आता।

वैदिक युग और उसके बाद का काल सिंधु सभ्यता बौद्धकालीन समाज और आधुनिक समय तक प्रत्येक काल तक रंगाई छपाई विद्यमान रही। आदिमानव द्वारा की गई चित्रकारी आदमगढ़ और भीमबेटका जैसी अनेक गुफा में मिलती है। इससे मिलते-जुलते प्रतीकों में से कई आज भी पारंपरिक छपाई में मिलते हैं।

यह कहा जा सकता है की रंगाई की कला मानव सभ्यता के प्रारंभ से विद्यमान थी और उत्तरोत्तर उसका विकास होता रहा जैसे ही कपड़ा अस्तित्व में आया वैसे ही उसके रंगने और सजाने की आवश्यकता प्रतीत होने लगी। क्योंकि पहले तो आदिमानव जानवरों की खाल पहने रहता था। बाद में बुना कपड़ा एकदम सादा होगा।

विकास की यह प्रक्रिया समय के साथ गति पकड़ती गई। आदिकाल से आधुनिक काल तक रंगाई छपाई की विभिन्न तकनीकें अस्तित्व में आई। तमिलनाडु में हाथ छपे रेजिस्ट डाई वाला कपड़ा, कोरोमंडल के नाम से विश्व प्रसिद्ध रहा। उदयपुर नगर स्थित आहड़ में खुदाई के दौरान छपाई के ठप्पे प्राप्त हुए हैं। बांधणी या बंधेज गुजरात, राजस्थान व मध्य प्रदेश सहित पूरे भारतवर्ष का सबसे लोकप्रिय वस्त्र है। वहीं विषेष रूप से म.प्र. के धार में बाघ प्रिंट एवं आदिवासी क्षेत्रों में नदंना प्रिंट प्रसिद्ध है और माहेष्वरी, चंदेरी एवं बारासिवनी साड़ियाँ प्रिंट म.प्र. की कला के हृदय हैं।

राजस्थान की चुनरी आज भी उत्सव विशेष और व्यक्ति विशेष की पहचान है। जैसे सांगनेरी और बगऊ प्रिंट है। लोक कला में रंगाई छपाई को हम कपड़ों पर प्राकृतिक और पारंपरिक ब्लॉक का उपयोग करके प्रकृति (पक्षी, फूल, ज्यामितीय डिजाइन) और पौराणिक कथाओं से प्रेरित होकर पैटर्न बनाते हुए देखे जाते हैं। जहां दाबू (रेजिस्ट), बंधेज (टाई-डाई) और कॉटन जैसी तकनीकें इस कला को गहराई और प्रतिरात्मकता देती हैं। इससे कपड़े सिर्फ वस्त्र नहीं बल्कि कहानियाँ बन जाते हैं।

 

लोक कला में रंगाई छपाई के मुख्य पहलू

प्रकृति, फूल, पत्तियां, पक्षी, जानवर और ज्यामिति आकृतियाँ कपड़ों पर बनाई जाती हैं। पौराणिक कथाओं को भी कपड़ों पर छापा जाता है जैसे रामायण, महाभारत और कृष्ण लीलाओं के दृश्य।

सामाजिक जीवन के त्योहारों को भी कपड़ों पर उकेरा जाता है। जैसे होली के दृश्य, दीपावली के दिये आदि। लोक कला जिन तकनीकी साधनों का प्रयोग करती है वह इस प्रकार है -

 

छपाई की विभिन्न शैलियाँ

दाबू: मिट्टी, गोंद और अन्य प्राकृतिक पदार्थ के घोल से ठप्पे लगाकर कपड़े के उन हिस्सों को रंगाई से बचाया जाता है जहां डिजाइन बनाना है। फिर रकाई के बाद घोल हटा दिया जाता है।

बंधेज: कपड़े को बांधकर टाई-डाई रंगों को फैलने से रोका जाता है जिससे अनूठी डिजाइन बनती है।

कॉटन: पहले कपड़े को रंगकर फिर किसी केमिकल से डिजाइन वाले हिस्से का रंग हटाकर पैटर्न बनाया जाता है।

ब्लॉक प्रिंट: लकड़ी के ठप्पों पर डिजाइन उकेर कर रंगों से छपाई की जाती है।

 

 

रंगों का महत्व

प्राकृतिक रंग हल्दी से बनता, हरा रंग मेहंदी से बनता, सफेद रवादिया से और काला रंग कोयले से आदि प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त होते हैं।

यह लोक कला हमारी सदियों पुरानी है और अक्सर रंगरेज जैसे समुदायों द्वारा जीवित रखी जाती है जो प्रकृति से रंग लेकर कपड़ों को सजाते हैं। आजकल इसे बचाने का प्रयास किया जा रहा है। सजावट के लिए सांस्कृतिक विरासत को कपड़े पर छापा जा रहा है। यह हमारी प्राकृतिक, आध्यात्मिक और स्थानीय पहचान को दर्शाती है।

आदिवासी रंगाई छपाई की विशेषताएं - हस्त निर्मित, प्राकृतिक रंग, सांस्कृतिक महत्व, आर्थिक महत्व।

लोक कला और वस्त्र श्रृंगार एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। लोक कला में वस्त्र श्रृंगार का एक महत्वपूर्ण स्थान है, जो आदिवासी समुदायों की सांस्कृतिक विरासत का एक हिस्सा है।

 

लोक कला में वस्त्र श्रृंगार

1)     आदिवासी वस्त्र: आदिवासी समुदायों में वस्त्र श्रृंगार का एक महत्वपूर्ण स्थान है। आदिवासी लोग अपने वस्त्रों को प्राकृतिक रंगों से रंगते हैं और उन पर विभिन्न प्रकार के डिज़ाइन बनाते हैं।

2)     हस्तनिर्मित वस्त्र: आदिवासी समुदायों में हस्तनिर्मित वस्त्रों का एक महत्वपूर्ण स्थान है। आदिवासी लोग अपने वस्त्रों को हाथ से बनाते हैं और उन पर विभिन्न प्रकार के डिज़ाइन बनाते हैं।

3)     प्राकृतिक रंग: आदिवासी समुदायों में प्राकृतिक रंगों का उपयोग किया जाता है। आदिवासी लोग अपने वस्त्रों को प्राकृतिक रंगों से रंगते हैं, जैसे कि पौधों के रंग, फूलों के रंग, और मिट्टी के रंग।

4)     सांस्कृतिक महत्व: आदिवासी समुदायों में वस्त्र श्रृंगार का एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक महत्व है। आदिवासी लोग अपने वस्त्रों को अपने सांस्कृतिक और धार्मिक अवसरों पर पहनते हैं।

 

वस्त्र श्रृंगार के प्रकार

1)     साड़ी: साड़ी एक प्रसिद्ध भारतीय वस्त्र है, जो आदिवासी समुदायों में भी पहना जाता है। आदिवासी लोग अपने साड़ी को प्राकृतिक रंगों से रंगते हैं और उन पर विभिन्न प्रकार के डिज़ाइन बनाते हैं।

2)     लहंगा: लहंगा एक प्रसिद्ध भारतीय वस्त्र है, जो आदिवासी समुदायों में भी पहना जाता है। आदिवासी लोग अपने लहंगा को प्राकृतिक रंगों से रंगते हैं और उन पर विभिन्न प्रकार के डिज़ाइन बनाते हैं।

3)     कुर्ता: कुर्ता एक प्रसिद्ध भारतीय वस्त्र है, जो आदिवासी समुदायों में भी पहना जाता है। आदिवासी लोग अपने कुर्ता को प्राकृतिक रंगों से रंगते हैं और उन पर विभिन्न प्रकार के डिज़ाइन बनाते हैं।

4)     दुपट्टा: दुपट्टा एक प्रसिद्ध भारतीय वस्त्र है, जो आदिवासी समुदायों में भी पहना जाता है। आदिवासी लोग अपने दुपट्टा को प्राकृतिक रंगों से रंगते हैं और उन पर विभिन्न प्रकार के डिज़ाइन बनाते हैं।

 

वस्त्र श्रृंगार की प्रक्रिया

1)     कपड़े की तैयारी: वस्त्र श्रृंगार के लिए कपड़े को पहले तैयार किया जाता है, जिसमें इसे धोया जाता है और सुखाया जाता है।

2)     रंग की तैयारी: वस्त्र श्रृंगार के लिए रंग को तैयार किया जाता है, जिसमें प्राकृतिक रंगों को मिलाया जाता है।

3)     छपाई: वस्त्र श्रृंगार के लिए कपड़े पर रंग छपाई की जाती है, जिसमें हाथ से या ब्लॉक पिं्रटिंग का उपयोग किया जाता है।

4)     सुखाना: वस्त्र श्रृंगार के बाद कपड़े को सुखाया जाता है, जिसमें इसे धूप में सुखाया जाता है।

 

निष्कर्ष

अंततः लोक कला एवं वस्त्र श्रृंगार किसी समाज की आत्मा है, ये हमें जड़ो से जोड़ती है और सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखने का कार्य करते हैं। इनके संरक्षण और संवर्धन से ही हमारी सांस्कृतिक पहचान मजबूत बनी रह सकती है।

  

REFERENCES

Bhatnagar, R. K. (n.d.). Art and the Human Personality (कला और मानव व्यक्तित्व). Rajasthan Hindi Granth Academy.

Bose, N. K. (n.d.). Culture and Society in India. Asia Publishing House.

Indira Gandhi National Centre for the Arts (IGNCA) Publications.

Kumar, A. (n.d.). Art, Culture and Society (कला, संस्कृति और समाज). Vani Publications.

Reports of the Indian Handicrafts and Handloom Board.

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