Original Article
Artistic contribution of Raja Bhoj in Madhya Pradesh
मध्य
प्रदेश में
राजा भोज का
कलात्मक
योगदान
|
Dr. Anjali Aarch 1* 1 Assistant Professor, Department
of Painting, Sarojini Naidu Girls Post Graduate (Autonomous) College, Bhopal,
India |
|
|
|
ABSTRACT |
||
|
English: The history of medieval India is not only a history of political
conflict and empires, but also a period of prosperity for literature,
science, and culture. During this period, there were many rulers who made
significant contributions not only to the expansion of their kingdoms and
power, but also to the development of knowledge, art, and literature. One
such figure is Raja Bhoj of the Parmar dynasty. Raja Bhoj was a powerful and
renowned king of the Parmar dynasty. He was a scholar himself and a patron of
scholars, which is why his fame is still sung throughout India. A prophecy
about Raja Bhoj's reign states that he will rule the southern region,
including minor Bengal, for 55 years, 7 months, and 3 days. Raja Bhoj
composed numerous scriptures and treatises during his lifetime, including the
Saraswatikanthabharan, a work of art. This treatise
encompasses architecture, sculpture, and architectural art. Raja Bhoj
constructed Bhojshala in Dhara Nagari for the
spread of education, which is still a unique example of architectural art. He
installed the idol of Mother Saraswati "Vagdevi" in Bhojshala and composed many texts in her worship. Raja
Bhoj established a huge Shiva temple Bhojeshwar in
Bhopal, which is currently known as Bhojpur. Near
this temple, he constructed a huge dam on the Betwa river, the remains of
which can still be seen. He constructed many ponds in Bhopal so that the
water supply to the city remains intact. Hence, it is proved that Raja Bhoj
has given his important contribution to the entire India not only in the
field of politics but also in the field of art. Hindi: मध्यकालीन
भारत का
इतिहास न
केवल
राजनीतिक संघर्ष
और
साम्राज्यों
का इतिहास है
बल्कि यह साहित्य
विज्ञान और
संस्कृति के
समृद्धि काल
के रूप में भी
जाना जाता है
इस काल में
अनेकों ऐसे
शासक हुए
जिन्होंने
केवल राज्य
की सीमा और
शक्ति तक ही
नहीं बल्कि
ज्ञान कला और
साहित्य के
विकास में
महत्वपूर्ण
योगदान
दिया1। उनमें
से एक है
परमार वंशीय
राजा भोज।
परमार वंश
में राजा भोज
एक प्रतापी
और विख्यात
नरेश हुए हैं
वह स्वयं
विद्वान थे
और
विद्वानों
के आश्रयदाता
भी थे इसी से
इनका यश आज भी
भारत में चारों
तरफ गाया
जाता है राजा भोज
के राज्य कल
के विषय में
एक
भविष्यवाणी
मिलती है
राजा भोज 55
वर्ष 7 माह और 3
दिन गौण
बंगाल सहित
दक्षिण दिशा
का राज्य
राजा भोज
भोगेंगे2। राजा
भोज ने अपने
जीवन काल में
अनेकों
शास्त्रो व
ग्रंथों की
रचना की
जिसमें
सरस्वतीकंठाभारण
कला के
क्षेत्र में
विद्यमान है
इस ग्रंथ में
वास्तुकला, शिल्प
कला, मूर्ति
कला, स्थापत्य
कला को
समाहित किया
हैै। राजा
भोज ने
विद्या के
प्रसार के
लिए धारा
नगरी में
भोजशाला का
निर्माण
करवाया जो आज
भी वास्तु
कला का बेजोड़
नमूना है,
उन्होंने
भोजशाला में
मां सरस्वती
’’वाग्देवी’’ की
प्रतिमा
स्थापित की
और उनकी
आराधना में अनेकों
ग्रंथों की
रचना की।
राजा भोज ने
भोपाल में
शिव का विशाल
मंदिर
भोजेश्वर
जिसे वर्तमान
में भोजपुर
के नाम से
जाना जाता है
उसकी स्थापना
की इस मंदिर
के पास बेतवा
नदी पर एक विशाल
बांध का
निर्माण
करवाया
जिसके अंश आज
भी देखने को
मिलते हैं
भोपाल में
उन्होंने कई
तालाबों का
निर्माण करवाया
जिससे जल की
पूर्ति नगर
में बनी रहे
अतः यह सिद्ध
होता है कि
राजा भोज ने न
केवल राजनीति
अपितु कला के
क्षेत्र में
अपना
महत्वपूर्ण
योगदान पूरे
भारतवर्ष को
दिया है। Keywords: King Bhoj, Paramara
Dynasty, Medieval Indian Art, Active Smoking, राजा
भोज, परमार
राजवंश, मध्यकालीन
भारतीय कला, सक्रिय
धूम्रपान |
||
प्रस्तावना
राजा
भोज भारतीय
इतिहास के ऐसे
शासक थे जिन्होंने
अनेक
क्षेत्रों
में अपनी प्रतिभा
को उजागर किया
उन्होंने कला, संस्कृति
और साहित्य
जैसे अनेकों
क्षेत्र में
अपना योगदान
दिया। 11वीं शताब्दी
में परमार वंश
के इस शासक ने
धारा नगरी, उज्जैनी व
भोपाल जैसे
शहरों में
अनेकों स्थापत्य
संबंधी कार्य
किये। ज्ञान
के प्रसार के लिए
शिक्षा, पुस्तकालय
और कला के
विभिन्न
क्षेत्रों का
संवर्धन
किया।
उन्होंने 84 ग्रंथों
की रचना की
जिसमें से
प्रमुख हैं
सरस्वतीकण्ठाभरण, राजमृगांक, राजमार्तंड, विद्वज्जनवल्लभ, भुजबलभीम, भीमपराक्रम, भीमप्रकाश, तत्वप्रकाश, श्रृंगारप्रकाश, संगीतप्रकाश, युक्तिकल्पतरु, आयुर्वेदसर्वस्व, ज्योतिः
सागर, चाणक्यमाणिक्य, आदित्यप्रताप, शालिहोत्र, चारुचार्य, विद्याविनोद, व्यवहारसमुच्चय, समरांगणसूत्रधार, अवंतीकूर्म, कोदंडमंडन
सहित अनेक ही
ग्रंथनाम
राजा राजा भोज
की विभिन्न
विशेषताएं
प्रकट करते
विरुद्ध हो
सकते हैं3। इन
ग्रंथो में
प्रमुख ग्रंथ
समरांगणसूत्रधार
है जिसमें
चित्रकला, मूर्तिकला, स्थापत्य, यंत्रविद्या, मुद्राविज्ञान
आदि ललित
कलाओं की
विस्तृत व्याख्या
मिलती है
समरांगणसूत्रधार
की रचना संस्कृत
में हुई है और
यह लगभग 83 अध्यायों
में वर्गीकृत
है इन
अध्यायों में 7500 श्लोक
समाहित हैं।
“सर्वशिल्पं
मयोज्ज्ञं
तन्मूलं
ललितं कला।”
अर्थात
समस्त
शिल्प-परंपराओं
की मूलभूत शक्ति
ललित कला में
है प् उपरोक्त
उद्धरण यह
स्पष्ट करता
है कि कला
केवल तकनीक
नहीं लालित्य, संवेदनशीलता
और
आध्यात्मिकता
का समुच्चय है4।
समरांगण
सूत्रधार
पारंपरिक
शिल्प ग्रंथ
होने पर भी
समकालीन
संदर्भों की
अपेक्षा नहीं
करता है। अपने
युग का वह
शिल्प संबंधी
व्यापक दर्पण
है समरांगण
सूत्रधार में
शिल्प और कला
संबंधी जिन
विशेषताओं का
भोज ने विधान
किया है श्रृंगार
मंजरी कथा में
उन्हें उसने
व्यावहारिक
रूप में भी
प्रस्तुत
किया है यह
आकस्मिक सहयोग
नहीं कहा जा
सकता बल्कि
इससे एक ही
कृतिकार की दो
कृतियों पर
परस्पर
पुष्टि भी
होती है5।
समरांगण
सूत्रधार में
मूर्तिकला का
गहन दार्शनिक
और तकनीकी
वर्णन है। यह
स्पष्ट किया
गया है कि
मूर्ति केवल
पत्थर की
आकृति नहीं, चैतन्य और
तत्त्व की
अभिव्यक्ति
है। अनेकों तथ्यों
से यह स्पष्ट
होता है कि
महाराजा भोज को
माँ सरस्वती
का वरदपुत्र
कहा गया। उनकी
तपोभूमि धारा
नगरी में उनकी
तपस्या और
साधना से प्रसन्न
हो कर माँ
सरस्वती ने
स्वयं प्रकट
हो कर दर्शन
दिए। माँ से
साक्षात्कार
के पश्चात उसी
दिव्य स्वरूप
को माँ
वाग्देवी की
प्रतिमा के
रूप में
अवतरित कर
भोजशाला में
स्थापित करवाया
जहाँ पर माँ
सरस्वती की
कृपा से महराजा
भोज ने 64 प्रकार की
सिद्धियाँ
प्राप्त की।
उनकी अध्यात्मिक, वैज्ञानिक, साहित्यिक
अभिरुचि, व्यापक और
सूक्ष्म
दृष्टी, प्रगतिशील
सोच उनको
दूरदर्शी तथा
महानतम बनाती
है। महाराजा
भोज ने माँ
सरस्वती के
जिस दिव्य
स्वरूप के
साक्षात्
दर्शन किये थे
उसी स्वरूप को
महान
मूर्तिकार
मंथल ने
निर्मित किया।
भूरे रंग के
स्फटिक से
निर्मित यह
प्रतिमा अत्यन्त
ही चमत्कारिक, मनोमोहक
एव शांत
मुद्रा वाली
है,
जिसमें
माँ का अपूर्व
सोंदर्य
चित्ताकर्षक है।
ध्यानस्थ
अवस्था में
वाग्देवी कि
यह प्रतिमा
विश्व की सबसे
सुन्दर
कलाकृतियों
में से एक
मानी जाती है6। राजा
भोज द्वारा
संवत 1091
में वाग्देवी
की प्रतिमा की
स्थापना
भोजशाला में
की गई थी
सर्वप्रथम
कोलकाता से
प्रकाशित
पत्रिका रूपम
के 1924 के जनवरी
अंक में श्री
के एन
दीक्षित ने
बताया कि
ब्रिटिश
संग्रहालय
में स्थित प्रतिमा
राजा भोज की
आराध्य
वाग्देवी की
प्रतिमा है7। वर्ष
में केवल एक
बार बसंत
पंचमी पर
भोजशाला में
मां सरस्वती
का तैलचित्र
ले जाया जाता
है,
जिसकी
आराधना होती
है। वसंत
पंचमी पर कई
वर्षों से
उत्सव आयोजित
हो रहे हैं।
इसके लिए एक समिति
गठित है।
भोजशाला एक
बड़े खुले
प्रांगण में
बनी है तथा सामने
एक मुख्य मंडल
और पार्श्व
में स्तंभों की
श्रृंखला तथा
पीछे की ओर एक
विशाल
प्रार्थना घर
है।
नक्काशीदार
स्तंभ तथा
प्रार्थना गृह
की उत्कृष्ठ
नक्काशीदार
छत भोजशाला की
विशिष्ट
पहचान है।
दीवारों में
लगे
उत्कीर्णित
शिला पट्टों
से बहुमूल्य
कृतियां
प्राप्त हुई
हैं8।
राजा भोज
द्वारा
निर्मित
भोजपुर मंदिर
की दीवारों पर
आनेकों
मूर्तियां
उत्कीर्ण है
जैसे वाद्य
लिए हुए गण, ऊपर देखते
हुए गण, भरवा ही गण
आदि।
समरांगन
सूत्रधार में
मूर्ति
निर्माण के लिए
कुछ श्लोक
समाहित है
उनमें मूर्ति
निर्माण की
प्रक्रिया का
वर्णन भी
मिलता है।
मूर्ति निर्माण की प्रक्रिया
आकार
योजनारू
मुद्रा, आयुध, आसन, और
अभिव्यक्ति।
शिल्पकार की
योग्यतारू तप, ध्यान, रेखा
ज्ञान, आभा-बोध।
प्रतिष्ठा
पूर्व
अनुष्ठानरू
मूर्ति
निर्माण के
पूर्व विशेष
काल और दिशा
की गणना।
रस-आधारित
अभिव्यक्तिरू
श्रृंगार, करुण, रौद्र, शांत आदि
रसों को
मूर्ति में
व्यक्त करना।
भोज
के अनुसार, यदि
मूर्ति में
भाव नहीं है, तो वह जड़
पत्थर के
अतिरिक्त कुछ
नहीं9।
भोजपुर
मंदिर में
निर्मित
मूर्तिया व
भोज शाला में
उत्कीर्ण
मूर्तियों से
यह पता चलता
हैं कि भोज
मूर्तिकला
में निपुण
थें।
स्थापत्य
और
वास्तु-कलारू
समरांगण
सूत्रधार का
मूल केंद्र
वास्तुकला
है। इसमें
नगर-रचना, मंदिर-निर्माण, गृह-योजना, प्रवेशद्वार, स्तंभ, वेदी, मंडप, रथ आदि के
निर्माण की
विस्तृत
वैज्ञानिक और
शास्त्रीय
प्रणाली दी गई
है।

प्रमुख स्थापत्य सिद्धांतरू
·
मंडल
योजना
(ळत्प्क्.ठ।ैम्क्
च्स्।छछप्छळ)रू
समरांगण में
वास्तु-निर्माण
हेतु मंडल या
योजनाचक्र का
प्रयोग बताया
गया है।
·
आयामों
की शुद्धिरू
ऊंचाई, चैड़ाई, गहराई आदि
में अनुपात
(प्रमाण) का
विशेष महत्व
है।
·
दिशा
और
पर्यावरणरू
उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम की
दिशा के
अनुरूप
वास्तु और
मूर्ति की
स्थापना के
निर्देश10।
भोज
की स्थापत्य
कला में
‘रूप-गंभीरता’
और ‘ध्वनि-संवेदन’
का समन्वय भी
मिलता है।
चित्रकलारू
रेखा, भाव
और रस की
साधनारू
समरांगण
सूत्रधार के
कुछ अध्यायों
में चित्रकला
का विशेष
उल्लेख है।
भोज चित्र को
केवल ‘रूप की
अनुकृति’ नहीं, बल्कि
प्रभा-युक्त
सजीव
प्रस्तुति
मानते हैं।

चित्र के तत्व
1)
रेखा
(स्प्छम्) कृ
चित्र की
आत्मा।
2)
वर्ण
(ब्व्स्व्न्त्)
कृ रस-संवेदन
का आधार।
3)
रूप
(थ्व्त्ड) कृ
विषय की
स्पष्टता।
4)
भाव
(म्डव्ज्प्व्छ)
कृ चित्र का
जीवन।
5)
प्रसंग
(ब्व्छज्म्ग्ज्)
कृ चित्र का
उद्देश्य।
भोज के अनुसार
“रेखा
संजीवनीया
चित्रस्य
जीवधारिका।”
यानी
रेखा चित्र की
प्राणवायु
हैप्
चित्रों
में देवचित्र, गृहचित्र, नृचित्र, प्राकृतिक
चित्र, और
रूपक चित्र का
उल्लेख किया
गया है। रंगों
के लिए भोज ने
वनस्पति, खनिज और जीव
से प्राप्त
प्राकृतिक
रंगों को सर्वोत्तम
माना है11।
राजा
भोज द्वारा
निर्मित
भोजपुर मंदिर
की पहाड़ियों
पर आज भी
मंदिर के
रेखाचित्र
प्राप्त होते
हैं। मन्दिर
निर्माण की
स्थापत्य
योजना का
विवरण खदान
भाग के
निकटस्थ
पत्थरों पर उकेरा
गया है। इस
योजना से
ज्ञात होता है
कि यहाँ एक
वृहत मन्दिर
परिसर बनाने
की योजना थी, जिसमें
ढेरों अन्य
मन्दिर भी
बनाये जाने
थे। इस योजना
के
सफलतापूर्वक
सम्पन्न हो
जाने पर ये
मन्दिर परिसर
भारत के सबसे
बड़े मन्दिर
परिसरों में
से एक होता12।
राजा भोज का मध्य प्रदेश के प्रमुख स्थानों पर कलात्मक योगदान
राजा
भोज ने मध्य
प्रदेश में ही
नहीं अपित संपूर्ण
भारत में
अनेकों
स्थानों पर कल
के क्षेत्र
में अपना
योगदान दिया
है मध्य
प्रदेश में भोपाल
धार व उज्जैन
में अनेकों
मंदिर, तालाब, बांध व
पाठशाला का
निर्माण
कराया।
भोजशाला
राजा
भोज अपने
ज्ञान के
प्रसार के लिए
उन्होंने
भोजशाला का
निर्माण
करवाया जिसके
गर्भगृह में
उन्होंने
वाग्देवी
सरस्वती की
प्रतिमा
स्थापित की
मां सरस्वती
की साधना कर
उन्होंने
अनेकों
ग्रंथों की
रचना की।
संपूर्ण भोजशाला
में स्थापत्य
की दृष्टि से
सर्वाधिक सुंदर
एवं आकर्षक
मुख्य शिखर का
आंतरिक भाग है
जिसमें अष्ट
दल कमल बना है
जिसका
स्थापत्य
दिलवाड़ा के
जैन मंदिर की
याद दिलाता है
यह कमल नीचे
आकर 8
व्रत में
समाप्त होता
है13।
भोजशाला के
आंतरिक भाग
में अनेक शिलालेख
प्राप्त होते
हैं इन शिलाओं
में कर्मावतार
या विष्णु के मगरमच्छ
अवतार के
प्राकृत भाषा
में लिखित दो स्तोत्र
उत्कीर्ण
हैं। दो
सर्पबंध
स्तंभ शिलालेख, जिसमें एक
पर संस्कृत
वर्णमाला और
संज्ञाओं और
क्रियाओं के
मुख्य
अंतःकरण को
समाहित किया
गया है और
दूसरे
शिलालेख पर
संस्कृत
व्याकरण के दस
काल और
मनोदशाओं के
व्यक्तिगत
अवसान शामिल
हैं । ये
शिलालेख 11 वीं-12 वीं शताब्दी
के हैं । इसके
ऊपर संस्कृत
के दो पाठ
अनुस्तुभ छंद
में उत्कीर्ण
हैं । इनमें से
एक में राजा
भोज के
उत्तराधिकारी
उदयादित्य
एवं नरवरमान
की स्तुति की
गयी है ।
द्वितीय लेख
में बताया गया
है कि ये
स्तम्भ लेख
उदयादित्य
द्वारा
स्थापित
करवाए गए हैं
। इसमें कोई संशय
नहीं है कि
यहाँ राजा भोज
का
महाविद्यालय या
सरस्वती
मंदिर था जिसे
उनके
उत्तराधिकारियों
द्वारा
विकसित किया
गया था। गर्भ
ग्रह की छत
कमल के सुंदर
फूलों से
अलंकृत है तथा
परमार कालीन
वास्तुकला का
सुंदर उदाहरण
है बहुत शाला
के अंदर
अनेकों
स्तंभों के
जोड़ों पर सूर्य
शिव गणेश भैरव
आदि की अलंकृत
मूर्तियां शंख
पद्म आदि
नक्काशी किए
गए हैं 14।

भोजपुर
भोजेश्वर
मन्दिर मध्य
प्रदेश की
राजधानी भोपाल
से लगभग 30 किलोमीटर
दूर स्थित
भोजपुर नामक
गाँव में बना
एक मन्दिर है।
इसे भोजपुर
मन्दिर भी
कहते हैं। यह
मन्दिर बेतवा
नदी के तट पर
विन्ध्य पर्वतमालाओं
के मध्य एक
पहाड़ी पर
स्थित है।
मन्दिर का
निर्माण एवं
इसके शिवलिंग
की स्थापना धार
के प्रसिद्ध
परमार राजा
भोज (1010 - 1053 ई॰) ने करवायी
थी। उनके नाम
पर ही इसे
भोजपुर मन्दिर
या भोजेश्वर
मन्दिर भी कहा
जाता है, हालाँकि कुछ
किंवदंतियों
के अनुसार इस
स्थल के मूल
मन्दिर की
स्थापना
पाँडवों
द्वारा की गई
मानी जाती है।
इसे ष्उत्तर
भारत का
सोमनाथष् भी
कहा जाता है15।
यह एक
विशाल मंदिर
है जिसका गर्भ
ग्रह बाहर से 65 वर्ग फुट
और भीतर से 42 वर्ग फुट
है जो 115
फुट लंबे 82 फीट चैड़े
और 13 फीट ऊंचा
चबूतरे पर
स्थित है
मंदिर में एक
अति विशाल
शिवलिंग 26 फुट की
कुल ऊंचाई के
गड़े हुए आधार
पर स्थित है गर्भ
ग्रह में 33 फीट ऊंचे
दीर्घाकार
दरवाजे से
पहुंचा जा सकता
है16।
इस
मंदिर की एक
और खासियत यह
है कि यहाँ
मंदिर और उस
स्थान पर बनने
वाली अन्य
संरचनाओं के
रेखाचित्र
मौजूद हैं। ये
रेखाचित्र
पास की चट्टानों
पर उकेरे गए
हैं, जिनमें
मंदिर की
रूपरेखा, मंडप, स्तंभ, चैखट, द्वार, शीर्ष, स्तंभों
के बीच की
दूरी आदि
दर्शाए गए
हैं। ये
रेखाचित्र
मौजूदा मंदिर
के डिजाइन से
मेल खाते हैं, जिससे पता
चलता है कि
क्या बनाने की
योजना थी।
अप्रयुक्त
नक्काशीदार
पत्थर के
ब्लॉक और उन्हें
उठाने के लिए
बनाए गए
मिट्टी के
रैंप अभी भी
स्थल पर बिखरे
हुए देखे जा
सकते हैं17।

उपसंहार
राजा
भोज का योगदान
चिरस्थायी है
क्योंकि उन्होंने
कल को नियम और
भाव दोनों
प्रदान किया है
राजा भोज ने
अपना जीवन
राजनीति में
ही नहीं अपितु
कला, साहित्य, संस्कृति, स्थापत्य, वास्तुकला, यंत्र की
जैसी विविध
कलाओं को
समर्पित किया
है,
उनके
शासनकाल में
धारा नगरी न
केवल प्रशासन
का केंद्र रही
है बल्कि
विद्या कला और
विज्ञान का
प्रमुख
केंद्र बन गए
हैं उनके
द्वारा निर्मित
किया मंदिर आज
भी श्रृद्धा
और आश्चर्य का
केंद्र है वही
अनेकों रचित
ग्रंथ आज भी
साहित्यकारों
के लिए एक
मार्गदर्शक
के रूप में
उपलब्ध है, युक्ति
कल्पतरु
आयुर्वेद और
चिकित्सा में
योगदान देता
है श्रृंगार
प्रकाश
काव्यशास्त्र
और सौंदर्य
बोध का
मार्गदर्शन
करता है। कला
के क्षेत्र
में
समरांगणसूत्रधार
आज भी विद्यमान
है। इसका
साक्षात
उदाहरण
भोजशाला का मंदिर
व भोपाल का
मंदिर जिसके
अंतर भाग में
अनेकों
मूर्तियां
उत्र्कीण है, भोजपुर
मंदिर के निकट
स्थित पहाड़ी
पर मंदिर स्थापत्य
के चित्र
उत्र्कीण है।
अतः राजा भोज का
कला के
क्षेत्र में
अमूल्य
योगदान है।
REFERENCES
Art: A study in the Samarangana Sutradhar (समरांगणसूत्रधार
में कला:
एक अध्ययन). (2025).
Art: A study in the Samarangana Sutradhar (समरांगणसूत्रधार
में कला:
एक अध्ययन). (2025).
Art: A study in the Samarangana Sutradhar (समरांगणसूत्रधार
में कला:
एक अध्ययन). (2025). 2.
Bhoj, Goddess Vagdevi and the poet Nagarvasi (भोज, वाग्देवी और
कवि नगरवासी).
Bhojeshwar Temple (भोजेश्वर
मंदिर).
Bhojeshwar Temple, Bhopal, Madhya Pradesh (भोजेश्वर
मंदिर, भोपाल, मध्य
प्रदेश).
Bhojeshwar Temple, the first sinful
temple of King Bhoj (भोजेश्वर
मंदिर:
राजा भोज का
प्रथम मंदिर).
Chaturvedi, M. King Bhoj and his Bhojshala (राजा भोज
एवं उनकी
भोजशाला). Hindi Granth Academy.
Chaturvedi, M. King Bhoj and his Bhojshala (राजा भोज
एवं उनकी
भोजशाला). Hindi Granth Academy.
Chaturvedi, M. Raja Bhoj and his Bhojshala (राजा भोज
एवं उनकी
भोजशाला). Hindi Granth Academy.
Reu, V. (1932). Raja Bhoj (राजा भोज). Hindustan Academy.
T. N. (2002). History
of India (भारत
का इतिहास). Chham Kmsbhpru Chmchhalnpch Thavgyan, 1.
The 6733-foot-long temple is
dedicated to the Lord (6733 फीट लंबा
मंदिर भगवान
को समर्पित है).
This work is licensed under a: Creative Commons Attribution 4.0 International License
© Granthaalayah 2014-2026. All Rights Reserved.