Original Article
A Review of Folk References in Indian Mythological and Modern Painting
भारतीय
पौराणिक एवं
आधुनिक
चित्रकला में
लोक संदर्भों
की समीक्षा
प्रस्तावना
भारतीय
चित्रकला का
इतिहास केवल
सौंदर्य की
अभिव्यक्ति
नहीं है, बल्कि यह
भारतीय समाज
संस्कृति
धर्म पुराण और
दर्शन का
जीवंत स्वरूप
है। भारत में
कला सदैव जीवन
का प्रमुख अंग
रही है। यह
केवल अलंकरण एवं
सौंदर्य के
लिए नहीं, बल्कि
आध्यात्मिक
अनुभव, लोक
परंपरा और
सामाजिक
सरोकार का
माध्यम भी रही
है। भारतीय
चित्रकला इसी
सांस्कृतिक
परंपरा का
साक्षात
दर्शन है, जिसमें
लोक जीवन
पौराणिक
आख्यान, धार्मिक
प्रतीक और
मानवीय
भावनाएं समान
रूप से समाहित
है। प्राचीन
काल से ही कला
का उद्देश्य
केवल -श्य
आनंद नहीं था, बल्कि लोक और
दिव्यता के
बीच सेतु बनाना
था।
प्रागैतिहासिक
काल में मानव
ने जब गुफाओं
की दीवारों पर
चित्र
चित्रित किये, तब वह
किसी
शास्त्रीय
नियम, सौंदर्य
सिद्धांत या
राजस्व से
प्रेरित नहीं
थे,
बल्कि
अपने दैनिक
जीवन, सामूहिक
अनुभव, विश्वास
और प्रकृति के
प्रति
जिज्ञासा को
अभिव्यक्ति
का विषय बना
रहा था। यही
अभिव्यक्ति
आगे चलकर लोक
कला की आत्मा
बनी।
अल्तामीरा, भीमबेटका
और मिर्जापुर
जैसे स्थलों
से प्राप्त
शैलचित्र में
शिकार, नृत्य, पशु, वृक्ष, सूर्य, सामूहिक
अनुष्ठान और
मानव
आकृतियों का
चित्र मिलता
है। इन
चित्रों के
विशेषता यह है, कि वह सरल, प्रतीकात्मक
और सामूहिक
चेतना से बने
हैं। इस काल के
चित्रों में
रंगों का
सीमित प्रयोग
जैसे गेरू
सफेद मिट्टी
कोयला आदि सरल
रेखात्मक शैली के
साथ चित्रित
किए गए। यही
सरलता आज हमें
मधुबनी, वर्ली, गोंड, और
कोहबर जैसी
लोक कलाओं में
देखने को
मिलती है। सरल
रेखांकन
सीमित रंग
आकृतियों में
सपाटपन, प्रतीक,
चित्रों
के प्रति
आस्था और
विश्वास ये
सभी तत्व लोक
कला में अभी
इस तरह
विद्यमान है, जैसे
प्रागैतिहासिक
गुफाचित्रों में थे।
इससे स्पष्ट
होता है, कि लोककला
प्रागैतिहासिक
काल की शैलीगत
और भावनात्मक
विरासत को आगे
बढ़ा रही है।
“अधिकांश चित्रकारी
के उदाहरण
रेखा और सपाट
रंगों के प्रयोग
से बनाए गए
हैं, फिर
भी कहीं-कहीं
गोलाई का आभास
भी दर्शाया गया
है। इन
चित्रों की
सरलता, सुगमता, सूक्ष्म
रेखांकन तथा
रंगों की
पद्धति आज के
लोक कलाकारों
के लिए महान
प्रेरणा का
उदाहरण है”।Baderiya (2004)
सिंधु
घाटी सभ्यता
केवल एक
विकसित नगरी
संस्कृति ही
नहीं थी बल्कि
वह लोग जीवन
परंपरा और कलात्मक
चेतना की
प्रारंभिक
आधारशिला भी
थी। हड़प्पा और
मोहनजोदड़ो से
प्राप्त कला
वस्तुएं यह
स्पष्ट करती
है,
कि उस समय
की कला शासक
वर्ण तक सीमित
न होकर सामान्य
जन जीवन से
जुड़ी हुई थी, और यही
लोक कला का
मूल स्वभाव
हैं। सिंधु
घाटी सभ्यता
से प्राप्त
मिट्टी की
मूर्तियां, विशेषकर
मातृदेवी की
मूर्ति, पशु, खिलौने, बैलगाड़ी, चिड़िया और
घरेलू उपयोग
की वस्तुएं इस
बात का संकेत
देती है, कि कला उस
समाज के दैनिक
जीवन, आस्था
और लोक
विश्वास से
उत्पन्न हुई
थी। मातृ देवी
की प्रतिमा
उर्वरता, सृष्टि और
संरक्षण की
भावना को
दर्शाती हैं, जो आगे
चलकर भारतीय
लोक कला और
लोक धर्म में
लोक धर्म में
शक्ति पूजा के
रूप में
विकसित हुई।
सिंधु सभ्यता
की मृदभांड
कला में
ज्यामिति आकृतियां
वृत्त , तरंग रेखाएं, पुष्प, पत्तियां, मछली और
पशु आकृतियों
का प्रयोग
मिलता है। ये अलंकरण
सरल, लयबद्ध
और
प्रतीकात्मक
है,
ठीक वैसे
ही जैसे लोक
कला में होते
हैं। लोक कला
में भी रूप की
अपेक्षा भाव
और अर्थ को
प्रधानता दी
जाती हैं, जो सिंधु
घाटी सभ्यता
में स्पष्ट रूप
से दिखाई देती
है।
“वैदिक काल
का इतिहास
स्पष्ट है। इस काल
की चित्रकला
की प्रगति का
ज्ञान
साहित्यक रचनाओं, जैसे - वेद, पुराण, रामायण या
महाभारत के
कला प्रसंगो
से प्राप्त
किया जा सकता
है”(2,2)। वैदिक
काल और लोक
कला का संबंध
भारतीय कला परंपरा
की उस निरंतर
धारा को प्रकट
करता है, जिसमें
आस्था, प्रकृति
और जनजीवन एक
दूसरे से
गहराई से जुड़े
हुए हैं।
“विश्व का
सबसे
प्राचीनतम
ग्रंथ ऋग्वेद
है। जिसमें एक
चरम फलक पर
अग्नि देव का
चित्र अंकित
किए जाने का
उल्लेख है”Singh and Meghwal (2024)। जब
प्राचीनतम
कला में आज की
तरह रंग, ब्रश, पेंसिल
और कागज
उपलब्ध नहीं
था,
तब उस काल
में चित्र
बनाने के लिए
दीवार, कपड़ा, पत्ते, लकड़ी आदि
पर कोयला
खड़िया रामराज
हिरौंजी की आदि
रंगों का
प्रयोग किया
जाता था।
रेखांकन के लिए
नरकुल या
रेशेदार लकड़ी
का प्रयोग
किया जाता था।
भारत की
लोककला उतनी
प्राचीन है, जितनी
यहां की
सभ्यता हैं।
प्राचीनतम
लोक कलाओं
में
अल्पना कला, मधुबनी
कला, मंजूषा
कला, गोदना
कला, पटचित्र
कला, कोहबर
कला आदि
प्रमुख कलाएं
हैं, जो
लोक रूपों को
अभिव्यक्त
करती हैं।
अल्पना
कला- अल्पना
लोक कला
प्राचीन काल
से बनाई जा
रही है। वैदिक
युग में जब से
यज्ञ करने का
विधान आरंभ
हुआ, तब
से अल्पना
करने की
शुरुआत हुई
है। आज भी यज्ञ, पूजा-पाठ
के आरंभ में
ही यज्ञ वेदी
के चारों
ओर गेरू, चावल के आटे
और रंग-बिरंगे
चावल से सुंदर
आकर्षक
डिजाइन से
अल्पना बनाई
जाती है।
प्रत्येक मांगलिक
कार्य (विवाह, यज्ञ पूजा, कथा, तिलक आदि) के
पहले अल्पना
बनाना शुभ
माना जाता है।
इस लोक कला का
प्रचलन
संपूर्ण भारत
में है।
रामायण -
रामायण को
भारतवर्ष की
आध्यात्मिक
और
सांस्कृतिक
चेतना का
परिचायक कहा जाता
है। रामायण
में कला के
संदर्भ में
शिल्प शब्द का
प्रयोग किया
गया है।
मधुबनी लोक
कला का
प्राचीनतम
वर्णन रामायण
में मिलता है।
कहा जाते हैं
कि “रामचंद्र
जी के स्वागत
में मिथिला के
आंगन, दलान, चैबारे और
घर को नाना
प्रकार की
मोहक प्रतीक चिन्हों
से चित्रित
किया गया था।
इस कला की पौराणिकता
का बोध
कर्मकांड से
भी होता है” Baderiya (2004),Singh and Meghwal (2024)। सीता स्वयं
मिथिला की
पुत्री होने
के कारण लोक
जीवन में देवी
स्वरूप मानी
जाती हैं।
मधुबनी में
सीता-जन्म, सीता-स्वयंवर, राम सीता
विवाह, वनवास, अशोक
वाटिका और
पुनर्मिलन
जैसे प्रसंग
पर आधारित
चित्र बनाए
जाते हैं।
“रामायण काल
में चित्रकला
किस सीमा तक
उन्नति इसका
उल्लेख जयदेव
कृत
प्रसन्नराघवनं
नामक नाटक में
प्रथम अंक में
राम-सीता के
विवाह के
चित्र के रूप
में हुआ है” Baderiya (2004), Agrawal (2002)।
महाभारत
-
महाभारत में
चित्रकला के
संबंध का
साक्ष्य
प्राप्त
होता है। इस महाकाव्य
में उषा और
अनिरुद्ध की
प्रेम प्रसंग
का उल्लेख
मिलता है।
“राजकुमारी
उषा बाणासुर
की बेटी थी।
एक दिन वह
स्वप्न में एक
सुन्दर राजकुमार
को देखती हैं, और उनसे
प्रेम करने
लगती हैं। वह
संपूर्ण वृत्तांत
अपनी सखी
चित्रलेखा को
बताती हैं
चित्रलेखा एक
निपुण
चित्रकार थी।
चित्रलेखा ने
उषा द्वारा
देखे गए
राजकुमार का
व्यक्तिचित्र
बनाया था”Agrawal (2002)। इसके
साथ-साथ
महाभारत का
लोककला से
संबंध था।
बिहार में अंग
क्षेत्र
हमेशा से ही
सांस्कृतिक -ष्टि
से संपन्न रहा
है। “महाभारत
काल में यहां
कला कौशल की
अधिक
प्रधानता थी।
यहां की शिल्पी
बाहर जाकर
अपनी कला का
प्रदर्शन
करते थे। आज
अंग क्षेत्र
का मुख्य
केंद्र
भागलपुर है।
यहां की
प्रसिद्ध एक
स्थानीय लोक
चित्रकला शैली
“मंजूषा बाला”
के नाम से
जानी जाती है।
इस चित्र शैली
में बंगाल की
लोक कथा
“बिहुला
विषहरी” या
“देवी मनसा” से
संबंधित
चित्र बनाए
जाते हैं”Baderiya (2004),Chaturvedi (2020)।
विष्णुधर्मोत्तर
पुराण-इस
पुराण की गणना
न तो महापुराण
में की जाती
है,
न हीं
उप-पुराणों
में इसे
“विष्णु
पुराण” का ही एक
अंग माना जाता
है। इसके
“तीसरे खंड के 35वे अध्याय
से लेकर 43वे अध्याय तक
“चित्रसूत्रम”
नामक एक
प्रकरण है
“चित्रसूत्रम”
में
वास्तुकला, मूर्तिकला
एवं चित्रकला
तीनों का
विवेचन है”Chaturvedi (2020)।
चित्रसूत्रम
से उद्धृत
श्लोक के
माध्यम से चित्रकला
के बारे में
कहा गया है -
“
कलानां
प्रवरं
चिंत्र धर्म
कामार्थ मोक्षदम
।
मंगल्यं
प्रथम चैतद
गृहे यत्र
प्रतिष्टितम”
॥Agni Purana. (1959)
अर्थात
चित्र कलाओं
में श्रेष्ठ
है,
यह धर्म, अर्थ, काम और
मोक्ष देने
वाली है, जिस घर में
इसकी
प्रतिष्ठा की
जाती है, वहां पहले
मंगल होता है।
चित्रलक्षणम्
में कहा गया
है,
कि एक
सच्चे
चित्रकार को
केवल रंग और
रेखा का ज्ञान
ही नहीं बल्कि
लोक रीति और
धर्म की समझ भी
होनी चाहिए।
“अग्नि पुराण
अध्याय- 70 में निर्देश
दिया गया है, कि कलाकार
जब देवताओं
मनुष्य या
पशुओं का चित्रण
करें तो वह
चित्र लोग के
अनुकूल होना
चाहिए”Tripathi (2019)। यह विचार
भारतीय कला
दर्शन का मूल
तत्व है। कला
तभी जीवंत है, जब उसमें
लोग जीवन की
झलक हो। भागवत
पुराण और स्कंद
पुराण में
चित्रकला को
धर्म प्रचार
का माध्यम
बताया गया है।
इन ग्रंथो के
अनुसार चित्रों
के माध्यम से
अलौकिक
विचारों और
दिव्य लीलाओं
को लोक तक
पहुंचा जा
सकता है। इसका
अर्थ यह है, कि
चित्रकला का
परम उद्देश्य
केवल सौंदर्य
नहीं, बल्कि
लोक कल्याण और
आध्यात्मिक
जागृति भी है।
पुराणों, काव्यों के
साथ-साथ मुगल, पहाड़ी और
राजस्थानी
चित्रकला में
भी आध्यात्मिक, पौराणिक
और लोग जीवन
के चित्र को
चित्रित किया
गया है।
राजस्थानी
चित्रकला में
कृष्ण की लीलाओं, रागमालाओं, बारहमासा
आदि काव्य पर
आधारित चित्र
बने हैं। इसी
क्रम में
कंपनी चित्र
शैली प्रमुख
केंद्र बनारस, पटना और
पश्चिमी
बंगाल में भी
आध्यात्मिक
पौराणिक एवं
सामान्य जीवन
विषयों से संबंधित
चित्र
चित्रित किए
गए। यह
चित्रकला शैली
औपनिवेशिक
काल में
भारतीय और
यूरोपीय -ष्टिकोण
के मिलने से
विकसित हुई
थी। कंपनी चित्र
कला की एक
प्रमुख
विषय वस्तु
भारतीय
जनजीवन रही
है। इन चित्रों
में किसान, कारीगर, फकीर, नृतक, सैनिक, व्यापारी, स्त्रियों
और बच्चो को
बनाया गया
हैं। चित्रों
में भारतीय
समाज की जीवन
शैली, वेशभूषा
और उनके दैनिक
जीवन को विशेष
रूप से बनाया
गया है। कंपनी
शैली के
पश्चात
भारतीय चित्रकला
में एक नए -ष्टिकोण
और नवीन शैली
का आगमन हुआ
यह चित्रकला
शैली
यथार्थवादी
भी थी, जो
राजा रवि
वर्मा के
द्वारा
चित्रित
चित्रों में
दिखाई देती
है। राजा रवि
वर्मा भारतीय
चित्रकला के
इतिहास में उन
कलाकारों में
माने जाते हैं, जिन्होंने
पौराणिक
आख्यानों को
जन सामान्य की
-ष्टि, संवेदना
और कल्पना की
अत्यंत निकट
पहुंचा।
आधुनिक काल
में जब भारतीय
कलाकारों ने
पश्चिमी
आधुनिकता का
सामना किया, तब
उन्होंने
अपनी जड़ों की
ओर लौट के लिए
लोक कला और
पौराणिक
प्रतिको को
पुनः
परिभाषित किया।
आधुनिक चित्रकला में पौराणिक एवं लोक संदर्भ
राजा
रविवर्मा - (1848-1906)
राजा
रवि वर्मा की
कला भारतीय
आधुनिक चित्रकला
में एक
महत्वपूर्ण
शैली का
प्रतिनिधित्व
करती है।
उन्होंने
पौराणिक
आख्यानों और
देवी देवताओं
को केवल
धार्मिक
प्रतीकों के
रूप में नहीं, बल्कि
मानवीय
संवेदना और
यथार्थ जीवन
से जुड़ी
छवियों के रूप
में चित्रित
किया। उनके
चित्रों में
मिथकीय पात्र
सांसारिक
वातावरण भावनात्मक
अभिव्यक्ति
और सजीव रूप
में बनाए गए हैं।
राजा रवि
वर्मा ने
भारतीय
पौराणिक
विषयों को
पश्चिमी
यथार्थवादी
तकनीकी छाया
प्रकाश
परिप्रेक्ष्य
के साथ
चित्रित किया
हैं। आधुनिक
भारतीय कला के
इतिहास में
राजा रवि वर्मा
ने उस
परिवर्तन काल
का
प्रतिनिधित्व
किया, जब
भारतीय कला का
संपर्क
पश्चिमी कला
से हुआ। राजा
रविवर्मा ने
अपनी आरंभिक
काल शिक्षा थियोडोर
जेन्सन से ली।
रविवर्मा को
भारत में सर्वप्रथम
तेल रंग के
प्रयोग का
श्रेय
प्राप्त है। 1863 में राजा
रविवर्मा ने
शकुंतला का
पत्र लेखन चित्र
बनाया, इसी
समय उन्होंने
शकुंतला को
विविधि रूपों
में चित्रित
किया।
शकुंतला
दुष्यंत का
प्रथम मिलन, वियोग, शकुंतला
और मेनका आदि।
राजा
रविवर्मा की
पौराणिक
चित्रों
देवी-देवताओं
को जिस रूप
में चित्रित
किया है, आज हम
भारतवासी
उन्हें
उन्हीं रूपों
में पहचानते
हैं।
उन्होंने
देवियों को
दक्षिण
भारतीय
कांजीवरम
साड़ियां
पहनाई है, शकुंतला, द्रौपदी, दमयंती
एवं सीता जैसी
उत्तर भारतीय
ललनाओं को
दक्षिण
भारतीय
कुमारियों की
तरह ही चित्रित
किया।
देवताओं की
कद-काठी, शक्ल- सूरत
पहनावा भी
दक्षिण
भारतीय
कुमारो जैसी
ही बनाया है।
“लोग प्राचीन
मंदिरों में
उत्कृण एवं
पुस्तकों में
चित्र देवी देवताओं
को एकदम भूल
गए हैं। उनके
राम-सीता, कृष्ण-
राधा, नल-दमयंती, अर्जुन-सुभद्रा, वही हो गए
हैं, जिन्हें
राजा रवि
वर्मा ने
चित्रित किया
था”Kshotriya(1997)। उनके
द्वारा बनाए
गए अधिकांश
चित्र पौराणिक
आख्यानों, देवी-देवताओं
एवं काव्य पर
आधारित है।
उनके चित्र
शैली
यथार्थवादी
है। राजा
रविवर्मा ने 1892 में
मुंबई के
घाटकोपर में
एक लिथोग्राफ
प्रेस की
स्थापना की, जिसके साथ
ही भारत में
सर्वप्रथम
कैलेंडर कला
की विकास का
श्रेय भी राजा
रविवर्मा को
ही प्राप्त
है। उनके
चित्रों की
विशेषता यह है
कि पश्चात
तकनीकी में
भारतीय विषय
वस्तु पर यथार्थवादी
शैली में बने
है। राजा रवि
वर्मा के चित्रकला
भारतीय
परंपरा और
आधुनिक -श्य
के बीच एक
सशक्त सेतु के
रूप में
स्थापित है।
क्षितिंद्र
नाथ मजुमदार:
क्षितींद्रनाथ
मजूमदार
भारतीय
चित्रकला परंपरा
के एक ऐसे
कलाचार्य थे, जिनकी
चित्रकला में
आध्यात्म, शान्ति और
भारतीय
सांस्कृतिक
तत्वों का समावेश
देखा जाता है।
इनके चित्रों
में विषय -
वस्तु, रंग-
विधान तथा
शिल्प संयोजन
उनके समकालीन
कलाकारों से
भिन्न होने के
कारण, क्षितींद्रनाथ
मजूमदार की
कला
अभिव्यक्ति सबसे
अलग प्रतीत
होती है।
मजूमदार जी के
चित्रों की
विशेषता का
आकलन उनकी रंग
- संवेदना और
रंग - योजनाओं
पर विचार किये
बिना असंभव
है। उनके चित्रों
में रंगों का
चुनाव मात्र
कलात्मक नहीं
है। बल्कि
भावनात्मक और
आध्यात्मिक
संवाद का
माध्यम है।
मजूमदार जी
रंगों के
माध्यम से
चित्रों में
शांति, माधुर्य, सहजता और
दिव्यता का
वातावरण रचते
है। “इनकी वाश
तकनीक अन्य कलाकारों
से निश्चय ही
भिन्न है। इनकी वाश
विधा अपने ढंग
की अनूठी विधा
है,
जिसमें ये
सफेद रंग को
बड़ी चतुराई से
प्रयोग कर
लिया करते थे।
जिसके कारण
इनके चित्रों
में एक विशेष
प्रकार की
रहस्यात्मक
चमक आ जाती थी”।
Joshi (2018) इनके
रंगों का
संयोजन
अत्यंत सहज
होता था और संवेगों
की तीव्रता
उनके किसी रंग
में नहीं थी।
हल्का पीला, हरा और
गेरूआ उनके
प्रिय रंग थे।
उनके रंग तथा
रेखाएं एक
आंतरिक लय से
बंधी थी उनके
चित्रोत्कर्ष
को स्वीकार
करते हुए उनके
गुरु अवनीन्द्र
नाथ ठाकुर ने
कहा था - “
क्षितींद्रनाथ
हमारा शिष्य
है,
लेकिन
अपनी रेखाओं
और रंगों के
संयोजन मे इतना
कोमल, इतना
सजग है कि
हमसे भी आगे
बढ़ गया है”Aman (2019)। इनके
चित्रों में
भारत की
शास्त्रीय
कलाओं का
प्रभाव दिखाई
देता है।
इन्होंने
चित्रों में
रंगों का
प्रयोग न तो
पश्चिमी
प्रभाव में किया
और न ही उसे
केवल
सौंदर्यशास्त्रीय
रूप मे सीमित
किया, बल्कि
उन्होंने रंग
को आत्म -
संवाद, साधना
और ध्यान की
भाषा के रूप
मे देखा। यही
कारण है कि
उनके चित्र को
देखने का
अनुभव दर्शकों
के लिए
भावनात्मक
होता है। उनके
विभिन्न रंगों
से एक ही रंग
की संगति का
आभास होता है, जिससे
आत्मा को परम
सुख एवं
तृप्ति
प्राप्त होती
है।
यामिनी
राय: यामिनी
राय उन भारतीय
आधुनिक
भारतीय
कलाकारों में
शामिल है, जिन्होंने
लोक कला को
अपनी
रचनात्मक
पहचान का आधार
बनाया। 1930 के दशक में
उन्होंने यह
समझ लिया था, कि उनकी
कला की
वास्तविक
शक्ति लोक
परंपराओं में
ही निहित है।
इसी सोच के
साथ उन्होंने
पारंपरिक लोक
रूपों से
प्रेरणा लेकर
एक ऐसी चित्र
शैली विकसित
की जो बंगाल
स्कूल की
परिष्कृत और
शास्त्रीय
प्रवृत्ति से
स्पष्ट रूप से
अलग थी
।उन्होंने
लोक चित्रों
विशेषकर
कालीघाट की
बाजार शैली, पूजा-स्थलों
की मूर्तियां, ग्रामीण
खिलौने, गुड़ियों तथा
धार्मिक
अनुष्ठानों
में प्रयुक्त
हस्तशिल्प
वस्तुओं में
मौजूद सरलता, सजीवता और
अभिव्यक्ति
पूर्ण
प्रबलता को
पहचान। इन
उपयुक्त
तत्वों को
अपनाते हुए
यामिनी राय ने
अपने चित्रों
में कांथा और अल्पना
के गुण को भी
अपने चित्रों
में संश्लेषित
किया।
“उन्होंने 1910 के बाद से
तेल रंगों में
शबीह बनाना और
अविनींद्रनाथ
की ‘उदासीन
भावुकता’ वाली
शैली को त्याग
दिया था”Pandey (2003)। वे लोक कला
की सहज
अभिव्यक्ति
की रचना प्रक्रिया
को अपनाने के
साथ-साथ
मध्यकालीन
उड़ीसा तथा जैन
पांडुलिपि
चित्रों की
रुपात्मक
विशेषताओं से
भी प्रेरणा
ली। उन्होंने
संतुलित ठोस और
सुव्यवस्थित
बाह्य रेखाओं
तथा अत्यंत
सरल रूप
को अपने
चित्रों का आधार
बनाया साथ ही
रंग प्रणाली
में बदलाव
करते हुए उन
प्राकृतिक
रंगों को
अपनाया जो
भारतीय ग्रामीण
जीवन में सहज
रूप में
प्रयोग किए
जाते थे। उनका
उद्देश्य यह
था,
कि उनकी
कला की पहचान
गांव के
सांस्कृतिक
वातावरण से
पूरी तरह जुड़
सके। यामिनी
राय के चित्रों
में सशक्त और
लयात्मक
रेखाएं
अत्यंत प्रभावशाली
ढंग से व्यक्त
हुई है। मोटी
और दीर्घ वक्र
रेखाओं के
माध्यम से
उन्होंने
अपनी आकृतियों
को ऊर्जा और
सजीवता
प्रदान की।
यामिनी राय के
चित्रों में
लोक कला का
प्रभाव केवल -श्य
रूप में ही
नहीं, बल्कि
उनके -ष्टिकोण
और
सांस्कृतिक
उद्देश्य में
भी स्पष्ट है।
उन्होंने लोक
कलाओं को
आधुनिक भारतीय
कला की मुख्य
धारा में
प्रतिष्ठित
किया और यह
दिखाया की
सादगी, प्रतीक
और लोक
संवेदना के
माध्यम से भी
कला सृजन संभव
है।
सुनैना
देवी: सुनैना
देवी आधुनिक
भारतीय
चित्रकला में
एक विशिष्ट
स्थान रखती
हैं, उनके
नाम से बहुत
कम ही लोग
परिचित होगे।
सुनैना देवी
प्रसिद्ध
टैगोर परिवार
की थी। अवनींद्रनाथ
तथा
गगनेंद्रनाथ
की छोटी बहन
थी। वह मूलतः
स्वशिक्षित
या आधुनिक
एकेडमी
परंपरा से अलग
रहकर अपनी एक
निजी सहज और
लोकधर्मी
कलाभाषा को
विकसित किया।
उनके चित्रों
पर भारतीय लोक
परंपरा विशेष
कर बंगाल की
लोक कला का
गहरा प्रभाव
दिखाई देता
है। लोक
कलाकारों की
भांति
उन्होंने भी
अपने अनुभव
आस्था और जीवन
-ष्टिकोण को
चित्रों के
माध्यम से
अभिव्यक्त किया।
उनके चित्रों
की विषयवस्तु
मुख्यत
धार्मिक एवं
पौराणिक रहे
हैं। पौराणिक
विषयों के
अलावा
इन्होंने
दैनिक जनजीवन, घरेलू
स्त्रियां, बच्चे, पुरातन
धार्मिक
कथाएं आदि पर
भी चित्र
बनाएं।
सुनैना देवी
आधुनिक काल की
प्रथम महिला
चित्रकार हैं, जिन्होंने
बंगाल की लोक
कला से
प्रेरणा लेकर कार्य
किया। उनके
चित्रों में
निरंतरता है, इन्होंने
चित्र बनाने
से पहले कोई
योजना नहीं
बनाई, उनके
मन में जो भी
भाव आया उसे
उसी रूप में
सरलता एवं
सहजता के साथ
चित्रित
किया। “सुनैना
देवी ने चित्र
बनाने के लिए
कभी भी कोई
पेंसिल स्केच
अथवा डमी तैयार
नहीं किया, जैसा कि
वह स्वयं कहती
हैं- ‘मेरे
चित्र में पेंसिल
की कोई रेखा
नहीं है, रंग और
तूलिका से ही
सारे चित्र
बनाए गए’ हैं”Kshotriya (1997), Sharma (2011)। सुनैना
देवी के
चित्रों में
नारी पात्रों
का विशेष
स्थान है।
उनके द्वारा
बनाई गई नारी
में सौंदर्य, गरिमा और
शांति भाव
दिखाई देता
है। उनमें नाटकीय
भाव भंगिमा के
स्थान पर
अंतर्मुखी
संवेदना
दिखाई देती
है। इस प्रकार
उनके चित्रों
की विशेषता
उनकी सहज, लोक
प्रेरित शैली, कोमल रंग
योजना, कथात्मक
और आत्मिक
शांति में
निहित है।
ड थ्
हुसैन. एम एफ
हुसैन आधुनिक
भारतीय
चित्रकला के
ऐसे सशक्त
कलाकार माने
जाते हैं, जिन्होंने
परंपरा और
आधुनिकता के
बीच एक नया संवाद
स्थापित
किया। इनकी
कला केवल
सौंदर्य तक
सीमित नहीं
रही, बल्कि
उसने सामाजिक, सांस्कृतिक
और मानवीय
प्रश्नों को
भी मुखर रूप
से अभिव्यक्त
किया। हुसैन
की चित्र शैली
में तीव्रता
और गति स्पष्ट
रूप से दिखाई
देती है। वे
मानव
आकृतियां, घोड़ा और
प्रतीकों के
माध्यम से
जीवन की जटिलताओं, संघर्षों
और भावनात्मक
तनाव को
व्यक्त किया, उनकी
चित्रित
आकृतियां
अक्सर सरल ना
होकर
विकृत या
अतिरंजित रूप
में प्रस्तुत
होती है। जो
आधुनिक समाज
की अस्थिरता
और
अंतर्विरोधो
का संकेत देती
है। भारतीय
महाकाव्य और
पौराणिक
कथाओं से
प्रेरित उनके
चित्र
पारंपरिक कथा
वाचन से भिन्न
है। रामायण और
महाभारत के
प्रसंगो को
उन्होंने
आधुनिक
संदर्भों से
जोड़ते हुए नए
अर्थ प्रदान
किए। उनके
चित्रों में
धर्म नैतिकता
और मानवी संवेदना
जैसी विषय
गहराई से जुड़े
हैं। उनके
चित्रों में
रंग अत्यंत
प्रभावशाली
हैं। वह चटक और
प्रबल रंगों
के साथ मुक्त
रेखाओं का
प्रयोग करते
हैं। उनके
चित्रों में
रंग केवल
सौंदर्य के
रूप में नहीं
बल्कि भाव
अभिव्यक्ति
का सशक्त
माध्यम बन
जाते हैं।
“हुसैन की कला
उन सभी जटिल
परिवर्तनों
का
प्रतिनिधित्व
करती हैं जो
पिछले 50 वर्षों में
भारत की
चाक्षुष
कलाओं में
घटित हुए हैं”Mango (2006)। इनके
द्वारा बनाए
गए चित्रों
में परंपरा विषयों
परंपरागत
विषयों को
समकालीन -ष्टि
से प्रस्तुत
कर भारतीय
आधुनिक काल को
एक नई दिशा
प्रदान की।
निष्कर्ष
भारतीय
कला का इतिहास
एक ऐसी निरंतर
परंपरा का
प्रतिनिधित्व
करता है, जिसमें लोक
और पौराणिक
चेतना का गहरा
अंतर संबंध
है। भारतीय
कलाकार ने
सदैव अपने
समाज संस्कृति
और धार्मिक
मूल्यों को
चित्रकला के
माध्यम से
व्यक्त किया
है। प्राचीन
काल से लेकर आधुनिक
युग तक भारतीय
कला का यह मूल
भाव ‘सृष्टि
में ईश्वर का
दर्शन’ न केवल
धार्मिक
अभिव्यक्ति
का परिणाम है, बल्कि यह
मनुष्य और
प्रकृति की
गहरे संबंध की
सांस्कृतिक
अनुभूति भी
है। पौराणिक
ग्रंथो में
चित्रकला का
उल्लेख मिलता
है। कला निरंतर
परिवर्तन की
प्रक्रिया से
गुजरती रहती
है। प्रत्येक
युग में समाज
अपने समय
अनुभव और
संवेदनाओं के
अनुसार कला को
नया आयाम नया
स्वरूप
प्रदान करती
है। कला चिंतक
विद्वान इमर्सन
के अनुसार-
“कोई कला शैली
अपनी युग की
प्रासंगिकता
को ही दर्शाती
है। हर पीढ़ी
की अपनी कहानी
है। भावी पीढ़ी
के लिए अर्जित
अनुभव है। समय
के साथ
कलाचिंतन, कलारूप
बदलते हैं।
कला अपना नया
रूप ग्रहण करती
है,
विभिन्न
धर्म, जीवन
दर्शन, वैज्ञानिक
प्रगति के
कारण कल के
अनेक रूप बदल गए
हैं”Sharma (2011), Baderiya (2004)। भारतीय
चित्रकला की
परंपरा में
अजंता की गुफा
चित्र एक
स्वर्णिम
आधार माना
जाता है। मध्यकालीन
कला में भी
राजनीतिक और
सामाजिक अस्थिरता
के बावजूद
चित्रकला की
परंपरा जीवित
रही, और
विभिन्न
शैलियों के
रूप में
विकसित हुई। इस
काल में पाल, जैन, राजस्थानी
और पहाड़ी
चित्र शैली
में लोक-जीवन, धार्मिक-आस्था
और क्षेत्र
विशेषताओं का
प्रभाव
स्पष्ट रूप से
दिखाई देता
है। इस विकास
क्रम में
भारतीय
चित्रकला ने
नए रूपों को
ग्रहण किया।
मुगल काल में
चित्रकला की
एक नवीन शैली का
उदय हुआ, जिसमें
यथार्थवादी -ष्टिकोण
सूक्ष्म
रेखांकन और
दरबारी जीवन
के चित्रण को
विशेष महत्व
मिला। यही
शैली आगे चलकर
पटना कलम और
कंपनी शैली के
निर्माण का
आधार बनी। इस
क्रम में
आधुनिक
भारतीय
चित्रकारों ने
पश्चिमी
प्रभाव के
बावजूद अपनी
कला भी अभिव्यक्ति
में भारतीय
पौराणिक
विषयों, लोक कलाओं को
अपनी प्रेरणा
मानकर
कलाकृतियों
में चित्रित
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