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COW DUNG CRAFT: AN INNOVATION (WITH SPECIAL REFERENCE TO THE BHOPAL DIVISION)

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COW DUNG CRAFT: AN INNOVATION (WITH SPECIAL REFERENCE TO THE BHOPAL DIVISION)

गोबर शिल्प : एक नवाचार (भोपाल संभाग के विशेष संदर्भ में) 

 

Mayuri Nema 1*Icon

Description automatically generated, Dr. Sadhana Chauhan 2  

1 Research Scholar, Department of Painting, Maharani Lakshmi Bai Girls Postgraduate College, Indore, Madhya Pradesh, India  

2 Associate Professor, Department of Painting Maharaja Bhoj Postgraduate College, Dhar, Madhya Pradesh, India      

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ABSTRACT

English: Craft serves as a strong foundation of human art and culture. Handicraft is an art form created by human hands, encompassing creativity, skill, and cultural consciousness. The more rich and advanced a country’s art is, the more its culture attracts global attention. Therefore, every country, region, division, and city possesses its own distinctive handicraft tradition.

The present research paper focuses on the tradition of cow dung craft (Gobar Shilp) practiced in the city of Bhopal, Madhya Pradesh. Since ancient times, cow dung has been used for religious, cultural, and environmental purposes. Cow dung cakes are traditionally used for lighting the sacred fire in havan rituals, where ghee, sugar, rice, and other offerings are made. It is believed that this practice purifies the environment and increases the level of oxygen in the atmosphere.

In contemporary times, artists have expanded the use of cow dung beyond its traditional religious functions and transformed it into an artistic medium. As a result, various decorative and ritual objects such as mandana designs, lamps, idols of Lord Ganesha and Lord Shiva–Parvati, cow dung plates, torans, Ram Darbar figures, garlands, small sacred fuel sticks for havan, and lamps are being created. These items are especially used during festivals like Diwali.

In Bhopal, artists such as Suresh Rathore, Jitendra Rathore, Pushpa Rathore, Hukum Singh Patidar, and Neeta Deep Bajpai have been actively engaged in the field of cow dung craft for many years. Along with preserving and promoting this folk art, they have played a significant role in providing employment to women and empowering them economically.

This research paper analyzes cow dung craft as a form of folk art, focusing on its relationship with folk culture, the role of artists, and its social significance.

 

Hindi: क्राफ्ट इंसानी कला और संस्कृति की एक मज़बूत नींव का काम करता है। हैंडीक्राफ्ट इंसानी हाथों से बनाई गई एक कला है, जिसमें क्रिएटिविटी, स्किल और सांस्कृतिक चेतना शामिल होती है। किसी देश की कला जितनी समृद्ध और एडवांस्ड होती है, उसका कल्चर उतना ही दुनिया का ध्यान खींचता है। इसलिए, हर देश, इलाके, डिवीज़न और शहर की अपनी खास हैंडीक्राफ्ट परंपरा होती है।

यह रिसर्च पेपर मध्य प्रदेश के भोपाल शहर में प्रचलित गाय के गोबर से बनी क्राफ्ट (गोबर शिल्प) की परंपरा पर फोकस करता है। पुराने समय से, गाय के गोबर का इस्तेमाल धार्मिक, सांस्कृतिक और पर्यावरण से जुड़े कामों के लिए किया जाता रहा है। गाय के गोबर के उपले पारंपरिक रूप से हवन की रस्मों में पवित्र अग्नि जलाने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं, जहाँ घी, चीनी, चावल और दूसरी चीज़ें चढ़ाई जाती हैं। ऐसा माना जाता है कि इस प्रैक्टिस से पर्यावरण शुद्ध होता है और हवा में ऑक्सीजन का लेवल बढ़ता है।

आज के समय में, कलाकारों ने गाय के गोबर का इस्तेमाल उसके पारंपरिक धार्मिक कामों से आगे बढ़ाकर इसे एक कलात्मक माध्यम में बदल दिया है। इस वजह से, अलग-अलग सजावटी और पूजा की चीज़ें जैसे मांडना डिज़ाइन, दीये, भगवान गणेश और भगवान शिव-पार्वती की मूर्तियाँ, गाय के गोबर की थालियाँ, तोरण, राम दरबार की मूर्तियाँ, मालाएँ, हवन के लिए छोटी पवित्र लकड़ियाँ और दीये बनाए जा रहे हैं। इन चीज़ों का इस्तेमाल खास तौर पर दिवाली जैसे त्योहारों पर होता है।

भोपाल में, सुरेश राठौर, जितेंद्र राठौर, पुष्पा राठौर, हुकुम सिंह पाटीदार और नीता दीप बाजपेयी जैसे कलाकार कई सालों से गाय के गोबर से बनी चीज़ों के क्षेत्र में सक्रिय रूप से लगे हुए हैं। इस लोक कला को बचाने और बढ़ावा देने के साथ-साथ, उन्होंने महिलाओं को रोज़गार देने और उन्हें आर्थिक रूप से मज़बूत बनाने में अहम भूमिका निभाई है।

यह रिसर्च पेपर गाय के गोबर से बनी चीज़ों को लोक कला के रूप में एनालाइज़ करता है, और लोक संस्कृति के साथ इसके संबंध, कलाकारों की भूमिका और इसके सामाजिक महत्व पर ध्यान केंद्रित करता है।

 

Keywords: Cow Dung Craft, Folk Art, Handicraft, Bhopal, Folk Culture, Environmental Art, Women Empowerment, Traditional Art, गाय के गोबर से बनी कलाकृतियाँ, लोक कला, हस्तशिल्प, भोपाल, लोक संस्कृति, पर्यावरण कला, महिला सशक्तिकरण, पारंपरिक कला

 


प्रस्तावना

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

गोबर शिल्प- भारत की सांस्कृतिक परंपरा में गाय को माता का स्थान प्राप्त है। गाय से प्राप्त पंच पदार्थकृगोमूत्र, गोमय (गोबर), क्षीर (दूध), दधि (दही) और सर्पिष् (घी)कृको पंचगव्य कहा जाता है, जिन्हें अत्यंत पवित्र माना गया है। भारतीय शास्त्रों में इनका महत्व स्पष्ट रूप से वर्णित है। इसी संदर्भ में यह प्रसिद्ध संस्कृत श्लोक उल्लेखनीय है।

गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधि सर्पिस्तथैव च।

गवां पंच पवित्राणि पुनन्ति सकलं जगत्॥”

श्लोक का अर्थ:

गाय से प्राप्त गोमूत्र, गोबर, दूध, दही और घीकृये पाँचों पवित्र पदार्थ सम्पूर्ण जगत को शुद्ध करने की क्षमता रखते हैं।  

गोबर शिल्प इसी पवित्र परंपरा का एक सजीव उदाहरण है। प्राचीन काल से ही भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में गोबर का उपयोग घरों की लिपाई, यज्ञ, धार्मिक अनुष्ठानों तथा कला निर्माण में किया जाता रहा है। गोबर शिल्प में गोबर को प्राकृतिक तत्वों के साथ मिलाकर देवी-देवताओं की मूर्तियाँ, दीपक, सजावटी वस्तुएँ, दीवार चित्र एवं दैनिक उपयोग की सामग्री तैयार की जाती है।

यह कला न केवल धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व रखती है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से भी अत्यंत उपयोगी है। गोबर शिल्प पूर्णतः जैविक, प्रदूषण रहित एवं सतत विकास को बढ़ावा देने वाला माध्यम है। इसके माध्यम से ग्रामीण महिलाओं और कारीगरों को स्वरोजगार के अवसर प्राप्त होते हैं, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था सुदृढ़ होती है।

वर्तमान समय में, जब आधुनिकता के कारण पारंपरिक कलाएँ लुप्त होती जा रही हैं, गोबर शिल्प भारतीय सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित रखने का एक प्रभावी साधन है। यह आत्मनिर्भर भारत, स्वदेशी उत्पादों और पर्यावरणीय संतुलन की दिशा में एक सार्थक कदम है।

भारत की सांस्कृतिक परंपरा में गाय और उससे प्राप्त पदार्थों का विशेष महत्व रहा है। गोबर शिल्प भारतीय लोककला की एक प्राचीन, पवित्र एवं पर्यावरण-अनुकूल कला है, जिसमें गाय के गोबर का उपयोग कर विभिन्न प्रकार की कलात्मक एवं उपयोगी वस्तुएँ निर्मित की जाती हैं। यह कला न केवल धार्मिक आस्था से जुड़ी हुई है, बल्कि ग्रामीण जीवन, पर्यावरण संरक्षण एवं स्वदेशी कारीगरी का भी प्रतिनिधित्व करती है।

 

 

 

गोबर शिल्प को उसकी उपयोगिता एवं उद्देश्य के आधार पर मुख्यतः तीन प्रकारों में विभाजित किया जाता है।

1)     अनुष्ठानिक शिल्प

अनुष्ठानिक शिल्प वे होते हैं, जिनका उपयोग धार्मिक एवं सांस्कृतिक अनुष्ठानों में किया जाता है। ये शिल्प हमारी परंपरा और आस्था के अनुरूप पूजन, पाठ, हवन तथा अन्य धार्मिक क्रियाओं में प्रयुक्त होते हैं। जैसेकृगोबर से निर्मित गणेश प्रतिमा, कलश, लक्ष्मी, सरस्वती, अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियाँ

2)     उपयोगी शिल्प

उपयोगी शिल्प की श्रेणी में वे गोबर शिल्प आते हैं, जो दैनिक जीवन एवं सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों में उपयोग किए जाते हैं। जैसेकृगोबर के स्मृति चिन्ह, घड़ी, मोबाइल स्टैंड, सीडी स्टैंड, फोटो फ्रेम, फ्लावर पॉट, पेन स्टैंड

3)     सौन्दर्यपरक शिल्प

सौन्दर्यपरक शिल्प वे होते हैं, जो मुख्यतः सजावट के उद्देश्य से बनाए जाते हैं। इन शिल्पों का उपयोग घरों, कार्यालयों एवं सार्वजनिक स्थानों की सुंदरता बढ़ाने के लिए किया जाता है। जैसेकृबॉल हैंगिंग, बंदनवार, म्यूरल, शोपीस आदि। इन्हें रंगों एवं अन्य सजावटी सामग्रियों के साथ आकर्षक रूप में तैयार किया जाता है।

इस प्रकार गोबर शिल्प धार्मिक आस्था, दैनिक उपयोग और सौंदर्यकृतीनों ही दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण कला है।

 

गोबर शिल्प निर्माण प्रक्रिया

गोबर शिल्प भारतीय लोक एवं ग्रामीण हस्तकला की एक महत्वपूर्ण परंपरा है, जिसकी जड़ें प्राचीन कृषि-संस्कृति और धार्मिक विश्वासों से जुड़ी हुई हैं। यह शिल्प मुख्यतः प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित होता है और इसे बनाने की प्रक्रिया पूर्णतः हस्तनिर्मित एवं पारंपरिक ज्ञान पर आधारित होती है, जिसे ग्रामीण हस्तशिल्पी पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाते आए हैं। मध्यप्रदेश, विशेषतः मालवा, निमाड़ और बुंदेलखंड क्षेत्र में यह शिल्प सांस्कृतिक अनुष्ठानों तथा लोकाचार से गहराई से जुड़ा हुआ है।

गोबर शिल्प के निर्माण की प्रक्रिया का प्रथम चरण कच्चे माल के चयन से प्रारंभ होता है। हस्तशिल्पी प्रायः देसी गाय के गोबर का उपयोग करते हैं, क्योंकि उसमें रेशेदार तत्व अधिक मात्रा में पाए जाते हैं, जो शिल्प को सूखने के बाद मजबूती प्रदान करते हैं। गोबर को सीधे उपयोग में नहीं लिया जाता, बल्कि उसे पहले छानकर अशुद्धियों से मुक्त किया जाता है। इसके पश्चात् गोबर को कुछ समय के लिए खुले स्थान पर रखा जाता है, जिससे उसकी अतिरिक्त नमी निकल जाती है और वह शिल्प निर्माण के लिए उपयुक्त हो जाता है। कई स्थानों पर कलाकार गोबर में प्राकृतिक बाइंडर के रूप में इमली के बीजों का चूर्ण या धान की भूसी मिलाते हैं, जिससे मिश्रण की पकड़ और टिकाऊपन बढ़ जाता है।

गोबर की तैयारी के बाद शिल्प का प्रारूप तैयार किया जाता है। छोटे आकार की वस्तुएँ जैसे दीपक, खिलौने या दीवार सजावट सीधे हाथों से आकार देकर बनाई जाती हैं, जबकि बड़े आकार की मूर्तियाँ या सजावटी संरचनाएँ बनाने के लिए पहले बांस, लकड़ी या लोहे का ढांचा तैयार किया जाता है। इस ढांचे पर धीरे-धीरे गोबर का मिश्रण चढ़ाया जाता है। यह प्रक्रिया मिट्टी शिल्प की तकनीक से मिलती-जुलती होती है, किंतु इसमें भट्टी या पकाने की आवश्यकता नहीं होती, जिससे यह पूर्णतः पर्यावरण-अनुकूल कला रूप बन जाती है।  

आकृति निर्माण की अवस्था में कलाकार अपनी कल्पनाशीलता और अनुभव के आधार पर शिल्प को अंतिम रूप देता है। इस चरण में उंगलियों, लकड़ी के औजारों या साधारण धातु उपकरणों की सहायता से चेहरे की भाव-भंगिमा, वस्त्रों की सिलवटें तथा अलंकरण उकेरे जाते हैं। गोबर की लचीली प्रकृति कलाकार को सूक्ष्म विवरण उभारने की सुविधा प्रदान करती है, जिससे शिल्प में लोक सौंदर्य का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है। यह चरण शिल्पकार की व्यक्तिगत शैली और लोक परंपरा दोनों का सम्मिलित रूप प्रस्तुत करता है।

आकृति पूर्ण होने के पश्चात् शिल्प को सुखाने की प्रक्रिया अत्यंत सावधानी से की जाती है। गोबर शिल्प को सीधे तीव्र धूप में न रखकर छायादार एवं हवादार स्थान पर सुखाया जाता है, जिससे दरारें उत्पन्न न हों। छोटे शिल्प कुछ दिनों में सूख जाते हैं, जबकि बड़े आकार की रचनाओं को पूर्णतः सूखने में एक से दो सप्ताह तक का समय लग सकता है। यह धीमी सुखाने की प्रक्रिया शिल्प की संरचनात्मक मजबूती के लिए आवश्यक मानी जाती है।

सुखाने के बाद शिल्प की सतह को परिष्कृत किया जाता है। कई बार सतह पर गोबर की पतली परत पुनः लगाई जाती है, जिससे असमानता दूर हो जाती है। पूर्ण रूप से सूख जाने के पश्चात् गोबर शिल्प को अंतिम फिनिशिंग देने की प्रक्रिया अपनाई जाती है, जिसमें हस्तशिल्पी शिल्प की सतह को रेग माल (रेत से बने घिसाव कागज / sand paper) से धीरे-धीरे घिसते हैं। इस प्रक्रिया का उद्देश्य शिल्प की सतह को चिकना, समतल और सौंदर्यपूर्ण बनाना होता है। यह कार्य अत्यंत धैर्य और अनुभव की मांग करता है, क्योंकि अधिक दबाव देने से शिल्प की बाहरी परत क्षतिग्रस्त हो सकती  ग्रामीण हस्तशिल्पियों के अनुसार, यदि यह प्रक्रिया न की जाए तो शिल्प का अंतिम सौंदर्य प्रभावित होता है और रंगाई के बाद सतह असमान दिखाई देने लगती।इसके पश्चात् रंगाई एवं सज्जा की प्रक्रिया होती है। पारंपरिक रूप से गेरू, हल्दी, चूना, खड़िया मिट्टी तथा प्राकृतिक काले रंगों का प्रयोग किया जाता है, जबकि समकालीन हस्तशिल्पी बाजार की मांग के अनुसार पोस्टर या ऐक्रेलिक रंगों का भी उपयोग करने लगे हैं। रंगों के माध्यम से शिल्प में धार्मिक, सांस्कृतिक तथा सौंदर्यात्मक अर्थ जोड़े जाते हैं। गोबर शिल्प का उपयोग केवल सजावटी वस्तु के रूप में ही नहीं, बल्कि धार्मिक एवं सामाजिक अनुष्ठानों में भी किया जाता है। दीपावली, गोवर्धन पूजा, विवाह संस्कार तथा ग्राम देवी-देवताओं की स्थापना में इसका विशेष महत्व है।

इस प्रकार गोबर शिल्प की निर्माण प्रक्रिया केवल एक तकनीकी क्रिया न होकर भारतीय लोक जीवन, पर्यावरणीय चेतना और सांस्कृतिक विरासत का सजीव दस्तावेज है।

 

 

 

गोबर शिल्प में पर्यावरण-अनुकूलता

मध्यप्रदेश के भोपाल शहर में निर्मित गोबर शिल्प पर्यावरण-अनुकूल हस्तकला की अवधारणा को व्यवहारिक रूप में प्रस्तुत करते हैं,भोपाल के हस्तशिल्पी गोबर शिल्प के निर्माण में स्थानीय स्तर पर उपलब्ध देसी गाय के गोबर, प्राकृतिक बाइंडर तथा जैविक रंगों का प्रयोग करते हैं, जिससे इस शिल्प की पूरी प्रक्रिया प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित रहती है। गोबर एक जैव-अपघटनीय पदार्थ होने के कारण उपयोग के पश्चात् किसी भी प्रकार का दीर्घकालिक प्रदूषण उत्पन्न नहीं करता, बल्कि मिट्टी में मिलकर उसकी उर्वरता को बढ़ाने में सहायक होता है। इस शिल्प की निर्माण प्रक्रिया में न तो भट्टी, न ही किसी उच्च तापमान या विद्युत-आधारित औद्योगिक तकनीक की आवश्यकता होती है, जिससे ऊर्जा की खपत अत्यंत न्यूनतम रहती है और कार्बन उत्सर्जन लगभग नगण्य होता है। भोपाल जैसे शहरी क्षेत्र में, जहाँ जैविक अपशिष्ट प्रबंधन एक गंभीर चुनौती है, गोबर शिल्प इस अपशिष्ट को पुनः उपयोग में लाकर ‘वेस्ट टू आर्ट’ की अवधारणा को साकार करता है। इसके अतिरिक्त, गोबर शिल्प प्लास्टिक, थर्माकोल, फाइबर और अन्य गैर-जैविक सजावटी सामग्रियों का पर्यावरण-हितैषी विकल्प प्रस्तुत करते हैं, जो सामान्यतः धार्मिक एवं सांस्कृतिक आयोजनों के बाद प्रदूषण का कारण बनती हैं। पूजा-पाठ एवं उत्सवों के पश्चात् गोबर शिल्प का विसर्जन या निस्तारण पर्यावरण को हानि पहुँचाने के बजाय भूमि की प्राकृतिक संरचना को पोषित करता है। इस प्रकार भोपाल में निर्मित गोबर शिल्प न केवल सतत विकास (Sustainable Development), कार्बन-न्यूट्रल उत्पादन और स्थानीय संसाधनों के संरक्षण का उदाहरण हैं इसलिए गोबर शिल्प को एक पूर्णतः पर्यावरण-अनुकूल एवं सतत हस्तशिल्प के रूप में अकादमिक स्तर पर मान्यता दी जा सकती है।

 

भोपाल शहर के प्रमुख गोबरशिल्पी कलाकार

भोपाल में गोबर शिल्प के संरक्षण एवं विकास में जितेंद्र कुमार राठोर, सुरेश राठोर, नीता दीप बाजपेयी एवं हुकुम सिंह पाटीदार का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इन कलाकारों ने पारंपरिक तकनीकों को संरक्षित रखते हुए गोबर शिल्प को समकालीन एवं व्यावसायिक स्वरूप प्रदान किया है।

सुरेश राठोर ने ‘सुरभि गोमय कला संस्थान’ के माध्यम से गोबर शिल्प को संगठित एवं संस्थागत पहचान दी। उनके प्रयासों से अनेक कलाकार प्रशिक्षित हुए और यह कला निरंतर आगे बढ़ी।

जितेंद्र कुमार राठोर, मास्टर आर्टिस्ट, ने गोबर शिल्प को व्यावसायिक एवं अकादमिक स्तर पर स्थापित किया। उन्होंने देश के विभिन्न राज्यों में प्रशिक्षण कार्यशालाएँ संचालित कीं तथा [NID] NIFT एवं RIE जैसे संस्थानों में प्रशिक्षण प्रदान किया। उनके द्वारा निर्मित गोबर आधारित दीये, मूर्तियाँ एवं स्मृति-चिह्न पर्यावरण-अनुकूल कला के सशक्त उदाहरण हैं।

 

चित्र लोकरंग भोपाल कलाकार जीतेन्द्र राठौर

नीता दीप बाजपेयी ने गोबर शिल्प को गौ-संरक्षण, महिला स्वरोजगार एवं सामाजिक जागरूकता से जोड़ा। उनके कार्यों ने गोबर शिल्प को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पहचान दिलाई तथा इसे एक सामाजिक-पर्यावरणीय मॉडल के रूप में स्थापित किया।

चित्र खजुराहो कलाकार नीता दीप वाजपाई

 

निष्कर्ष                                

गोबर शिल्प की समृद्ध परंपरा को आत्मसात कर समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुँचाने में कलाकार सुरेश जी राठोर की भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जिन्होंने संस्थागत प्रयासों के माध्यम से इस लोक कला को संगठित स्वरूप प्रदान किया। उनके साथ-साथ कलाकारों का योगदान भी अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है, जिन्होंने पारंपरिक तकनीकों को बनाए रखते हुए गोबर शिल्प को समकालीन सौंदर्य, व्यावसायिक उपयोग और पर्यावरणीय संदेश से जोड़ा। इन कलाकारों के प्रयासों से गोबर शिल्प आज केवल पूजा-अनुष्ठानों तक सीमित न रहकर सजावटी, स्मृति-चिह्न, उपहार एवं इको-आर्ट के रूप में व्य ापक पहचान प्राप्त कर सका है।

मध्यप्रदेश हस्तशिल्प विकास निगम, भोपाल द्वारा गोबर शिल्प के विपणन हेतु भोपाल हाट बाजार, गोहर महल परिसर, राग भोपाल, परी बाजार आदि स्थानों पर विशेष अवसर प्रदान किए जा रहे हैं, जिससे शिल्पकारों को सीधा बाजार उपलब्ध हो रहा है। इसके अतिरिक्त मध्यप्रदेश संस्कृति विभाग द्वारा आयोजित लोकरंग उत्सव, खजुराहो उत्सव जैसे सांस्कृतिक आयोजनों में गोबर शिल्पों के प्रदर्शन ने इस कला को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। प्रदर्शिनियों, जन्मोत्सवों एवं वार्षिक आयोजनों में स्मृति-चिह्न के रूप में गोबर शिल्प का उपयोग, दीपावली जैसे पर्वों पर सजावटी शिल्पों की बिक्री तथा गोमय आधारित लक्ष्मी की अवधारणा को सार्थक रूप प्रदान करना, इस शिल्प की सामाजिक स्वीकार्यता को दर्शाता है।

अतः यह कहा जा सकता है कि गोबर शिल्प परंपरा और आधुनिकता, संस्कृति और पर्यावरण तथा कला और आजीविका के बीच एक सेतु के रूप में स्थापित हो चुका है। प्रस्तुत शोध यह सिद्ध करता है कि गोबर शिल्प का संरक्षण, प्रशिक्षण, प्रचार और संस्थागत सहयोग भविष्य में इसे एक स्थायी, सम्मानजनक और व्यापक कला माध्यम के रूप में स्थापित कर सकता है।

 

REFERENCES

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