Original Article
Entertaining Forms of Art (Reference – Traditional Board games)
कला का
मनोरंजनात्मक
स्वरूप
(सन्दर्भ -
पारम्परिक
बोर्ड खेल)
|
1 Research Scholar, Department
of Drawing and Painting, Faculty of Arts, Dayalbagh Educational Institute
(Deemed to be University) Dayalbagh, Agra, India 2 Assistant Professor, Department of Drawing
and Painting, Faculty of Arts, Dayalbagh Educational Institute (Deemed to be
University) Dayalbagh, Agra, India |
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ABSTRACT |
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English: Art is a skill-based disposition whose purpose is often understood in terms of pleasure, comfort, luxury and entertainment. The Indian philosopher Vatsyayana identified sixty-four arts, which indicates the vast scope of the field of art. From this perspective, art and skill can be closely associated with entertainment. From prehistoric times itself, entertainment has been a fundamental human necessity. Early humans, while living in caves, fulfilled their daily lives through various activities such as tool-making, hunting, artistic depiction, and forms of recreation. As social changes gradually took place, urban civilizations began to develop. Excavations of the Indus Valley Civilization have yielded a variety of remains, such as beautifully painted terracotta pottery, small terracotta figurines, miniature carts, chariots and toys. These findings reveal that by the historical period, art had reached a high level of excellence. The brilliance of this artistic achievement is evident from the material remains that have survived to the present. In India, toys have always held an important place and have also possessed religious and cultural significance. They were used in rituals and in the narration of mythological stories. Although the basic forms of toys remained largely unchanged, their refinement and sophistication evolved over time. Since ancient times, various games have been played in India as a means of entertainment. Games have remained a fundamental element of Indian culture and therefore, sporting and gaming activities have had a significant influence on art. Through these games, attempts were made to understand mythological narratives and religious ideas. Numerous references to games are found not only in archaeological records but also in literary texts. For instance, the Indian epic Mahabharata mentions the game of Chaupar, while Hindu religious traditions often depict deities such as Shiva and Parvati engaged in play. Indian board games represent a complex form of cultural expression and exist in diverse types and styles. Traditionally games such as Chaupar, Ashtapada, Chaturanga, Pachisi, Chess, Moksha Patam, Ludo and Card games have been preserved to the best extent possible by artists and museums. This research paper aims to examine the historical background, aesthetic qualities, and cultural associations of traditional board games, while also discussing their continued relevance in the modern era. Hindi: कला
एक कौशल रूपी
मनोवृत्ति
है जिसका
उद्देश्य
सुख सुविधा,
विलासिता
तथा मनोरंजन
माना जाता
है। भारतीय दार्शनिक
वात्स्यायन
के द्वारा
चैंसठ कलाएं
मानी गई है,
जिसके
भेद से यह बोध
होता है कि
कला का
क्षेत्र
अत्यंत
व्यापक है।
इस प्रकार
कला कौशलों
का संबंध
मनोरंजन से
माना जा सकता
है।
प्रागैतिहासिक
समय से ही
मनोरंजन
मानव की
आवश्यकता रही
है। मानव
गुफाओं में
रहकर औजार
बनाना, आखेट
करना, चित्रण
कार्य तथा
मनोरंजन
जैसे अनेक
कार्यों
द्वारा अपनी
दिनचर्या को
पूर्ण करता
था जैसे-जैसे
परिवर्तन
होने लगा
नगरीय
सभ्यता का विकास
हुआ। सिंधु
सभ्यता की
खुदाई से
विभिन्न
प्रकार के अवशेष
जैसे- मिट्टी
के सुंदर
चित्रित
बर्तन, मिट्टी
की बौनी
मूर्तियां,
छोटी-छोटी
गाड़ी तथा रथ,
खिलौने
के रूप में
प्राप्त
होते हैं।
अतः ऐतिहासिक
युग में आकर
ज्ञात होता
है कि उस समय
कला अपने चरम
उत्कर्ष पर
थी। इसकी चमक
उन अवशेषों
के प्राप्त
होने से
हमारे समक्ष
प्रस्तुत होती
है। भारत में
खिलौनों का
महत्वपूर्ण
स्थान सदैव
से ही रहा है,
जिसका
धार्मिक और
सांस्कृतिक
महत्व भी है।
इन खिलौनों
का उपयोग
अनुष्ठानों
और पौराणिक कथाओं
में किया
जाता था।
खिलौनों का
स्वरूप तो वही
रहा परंतु
उनकी
परिष्कृतता
में समय के
साथ विकास
हुआ।
प्राचीन काल
से ही भारत
में मनोरंजन
के साधन के
रूप में
विभिन्न
खेलों को
खेला जाता
रहा है। खेल
भारतीय
संस्कृति के
मूल तत्व के
रूप में रहे
हैं। इसी
कारण खेल
गतिविधियों
का प्रभाव
कला पर अधिक
रहा है। इनके
माध्यम से
पौराणिक
कथाओं और
धार्मिक
कथनों को
समझने का
प्रयास किया
जाता था।
पुरातात्विक
अभिलेखों के
साथ साहित्यिक
ग्रंथों में
भी अनेक
खेलों का
उल्लेख
मिलता है।
भारतीय
महाकाव्य
महाभारत में
चैपड़, धार्मिक
मिथकों
(हिंदू
परंपराओं)
में शिव पार्वती
खेल खेलते
हुए
प्रदर्शित
हैं
इत्यादि।
भारतीय
बोर्ड खेल एक
जटिल
सांस्कृतिक
अभिव्यक्ति
है, यह
विभिन्न
प्रकार व
शैलियों में
होते हैं। पारम्परिक
रूप से चैपड़,
अष्टपद,
चतुरंग,
पच्चीसी,
शतरंज,
मोक्ष
पदम, लूडो
तथा ताश के
खेल आदि सभी
खेलों को
कलाकारों और
संग्रहालयों
द्वारा
संरक्षित
करने के यथासंभव
प्रयास किए
जा रहे हैं।
शोध पत्र के
अंतर्गत
पारम्परिक
बोर्ड खेलों
की
ऐतिहासिकता,
सौन्दर्य
और
सांस्कृतिक
जुड़ाव पर
प्रकाश डालते
हुए आधुनिक
युग में भी
इनकी
प्रासंगिकता
का विवेचन
प्रस्तुत
किया जाएगा। (Placeholder1) Keywords: Board Games, Entertainment, Toys,
Mythological Narratives, Traditional Games, Chaupar, Ashtapada, Pachisi,
Chess, Card Games, बोर्ड
खेल,
मनोरंजन, खिलौने, पौराणिक
कथाएं,
पारम्परिक, चैपड़, अष्टपद, चतुरंग, पच्चीसी, शतरंज, मोक्ष
पदम,
ताश के
खेल |
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प्रस्तावना
भूमिका
सृष्टि
की उत्पत्ति
के साथ-साथ
कला की उत्पत्ति
व विकास के
संबंध में
विचार किया जा
सकता है, सभी कलाएं
आनन्द के
सौंदर्य भाव
को ही लेकर विकसित
तथा गतिशील
रही हैं।
‘सृष्टि
महेश्वर की एक
विशाल कला है
और वह सबसे
बड़ा कलाकार’, ब्रह्म की
चेष्टा से ही
संपूर्ण
सृष्टि का निर्माण
हुआ तथा विश्व
पहले उसी के
अधीन था। अदृश्य
ब्रह्म के
दृश्य रूप की
अनुभूति ही
सम्पूर्ण
विश्व है। कला
एक कौशल रूपी
मनोवृत्ति है जिसका
उद्देश्य सुख
सुविधा, विलासिता
तथा मनोरंजन
माना जाता है।
कला ही कल्याण
की जननी है, विश्व की
सर्जना शक्ति
के रूप में
कला सृष्टि के
समस्त
पदार्थों में
व्याप्त है।
भारतीय दार्शनिक
वात्स्यायन
के द्वारा
चैंसठ कलाएं मानी
गई हैं, जिसके भेद से
यह बोध होता
है कि कला का
क्षेत्र
अत्यन्त
व्यापक है। इस
प्रकार कला
कौशलों का
सम्बन्ध
मनोरंजन से माना
जा सकता है।
जब से प्रकृति
का निर्माण
हुआ तभी से
मानव अनेक
श्रेष्ठतम
साधनों की खोज
में रहा
जिनमें वह
अपनी हृदयगत
अनुभूतियों, भावनाओं, कल्पनाओं
आदि को सरलता
पूर्वक
अभिव्यक्त कर सके।
प्रागैतिहासिक
समय से ही
मनोरंजन मानव की
आवश्यकता रही
है,
मानव
गुफाओं में
रहकर औजार
बनाना, आखेट
करना, चित्रण
कार्य तथा
मनोरंजन जैसे
कार्यों द्वारा
अपनी
दिनचर्या को
पूर्ण करता
था। इस समय मानव
आकृतियाँ
शिला चित्रों
के रूप में
प्राप्त होती
हैं जो
अधिकांशतः
शिकार और
शिकारी की हैं, जैसे
जंगली भैंसा, सुअरों
आदि का शिकार
करते हुए तथा
भालुओं से
आखेट करते हुए
चित्र अंकित
हैं। सृष्टि
के परिवर्तन
के साथ-साथ
नगरीय सभ्यता
भी विकसित
होती गई जिससे
सम्बन्धित एक
सभ्यता है, सिंधु
सभ्यता। यह
सभ्यता
हजारों वर्ष
पूर्व की है
इसकी खुदाई से
बोध होता है
कि मानव किस प्रकार
विकासात्मक
रूप में अपना
जीवन यापन तथा
दिनचर्या को
पूर्ण करता
था। यहाँ से
मिट्टी के
सुन्दर
चित्रित
बर्तन, मिट्टी
की बनी बौनी
मूर्तियाँ, छोटी-छोटी
गाड़ी तथा रथ
खिलौने के रूप
में प्राप्त
होते हैं।
प्राचीन भारत
में खिलौनों
का महत्वपूर्ण
स्थान था।
इनका धार्मिक
और सांस्कृतिक
महत्व था।
खिलौने का
उपयोग
अनुष्ठानों
और पौराणिक
कथाओं में किया
जाता था।
खिलौने का
स्वरूप तो वही
रहा परन्तु
उनकी
परिष्कृतता
में समय के
साथ विकास
हुआ। भारत में
मनोरंजन के
साधन के रूप
में विभिन्न खेलों
को खेला जाता
रहा है। खेल
भारतीय संस्कृति
के मूल तत्व
रहे हैं, इसी कारण खेल
गतिविधियों
का प्रभाव कला
पर अधिक रहा
है। इनके
माध्यम से
पौराणिक
कथाओं और धार्मिक
कथनों को
समझने का
प्रयास किया
जाता था।
पुरातात्विक
अभिलेखों के
साथ
साहित्यिक ग्रन्थों
में भी अनेक
खेलों का
उल्लेख मिलता है।
भारतीय
महाकाव्य
महाभारत में
चैपड़, धार्मिक
मिथकों हिंदू
परंपराओं में
शिव-पार्वती
खेल खेलते हुए
प्रदर्शित
हैं। भारत में
पारंपरिक
बोर्ड खेल एक
जटिल
सांस्कृतिक
अभिव्यक्ति
के रूप में प्रसिद्ध
रहे हैं।
बोर्ड खेल
विभिन्न
प्रकार व
शैलियों के
होते हैं। यह
कई स्थानों पर
खेले जाते रहे
हैं।
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चित्र
संख्या 1
|
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चित्र
संख्या 1 सिन्धु
सभ्यता से
प्राप्त
पासे |
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चित्र
संख्या 2
|
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चित्र
संख्या 2 सिन्धु
सभ्यता से
प्राप्त
खिलौने |
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|
|
चित्र
संख्या 3
|
|
चित्र
संख्या 3 फतेहपुर
सिकरी में
अकबर द्वारा
निर्मित पचीसी
प्रांगण
प्राप्त
पासे |
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चित्र संख्या 4
|
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चित्र
संख्या 4 एलोरा से
प्राप्त शिव
और पार्वती
पासा खेलते हुए |
उद्देश्य
1)
मनोरंजन
हेतु भारतीय
पारम्परिक
बोर्ड खेलों
के कलात्मक
स्वरूप का
अध्ययन करना।
2)
पारम्परिक
बोर्ड खेलों
के सम्बन्ध
में नई पीढ़ी
के ज्ञान में
वृद्धि करना।
3)
भारतीय
कला में बोर्ड
खेलों की
कलात्मकता और वर्तमान
में इनकी
प्रासंगिकता
का विश्लेषण करना।
भारतीय
पारम्परिक
बोर्ड खेल
भारतीय
बोर्ड खेल एक
समृद्ध
विरासत के रूप
में है। जिसने
युगों-युगों
से व्यक्ति को
व्यस्त रखा
है। राजमहलों
से लेकर गांव
के चैकों तक यह
पारम्परिक
बोर्ड खेल देश
की संस्कृति
और इतिहास में
गहराई से समाए
हुए हैं। यह
खेल मनोरंजन
के रूप में ही
नहीं अपितु
रणनीति, गणित और
कहानी श्रवण
करने की कला
के रूप में भी
सम्मिलित
होते हैं। यह
भारतीय
इतिहास की झलक
को प्रस्तुत
करते हैं।
परंपरागत खेल
प्रायः देश की
संस्कृति और
भाषा से जुड़े
होते हैं। जहां
यह उत्पन्न
हुए हैं, वहाँ से पीढ़ी
दर पीढ़ी चले आ
रहे हैं। इनकी
उत्पत्ति
सदियों पुरानी
है,
इस कारण
यह खेल
अप्रत्यक्ष
रूप से उन
नैतिक और
सांस्कृतिक
मूल्यों को
समाहित करते
हैं जिन्हें
मूल परंपरा
में
महत्वपूर्ण
माना जाता था।
पारंपरिक खेल
बच्चों और
व्यक्ति के
शारीरिक और
बौद्धिक
विकास को
प्रोत्साहित
करते हैं। https://takitakigames.com/indian-board-games/,n.d.
मोक्ष
पदम
जिसे
ज्ञान चैपड़ भी
कहा जाता है। 13वीं
शताब्दी के
कवि संत
ज्ञानेश्वर
ने नैतिकता का
उपदेश देने के
लिए मोक्ष पदम
नामक एक बच्चों
का खेल बनाया
जिसे
अंग्रेजों ने
सन् 1892
ईसवी में
बदलकर स्नेक
एंड लैडर्स
(सांप और सीढ़ी)
नाम कर दिया।
वह इस खेल को
इंग्लैंड ले
गए और वहां
उन्होंने
विक्टोरियन
मूल्यों के
अनुसार खेल
में बदलाव
किए। 100
वर्गों के
बोर्ड खेल में
12 वाँ वर्ग
विश्वास, 51 वाँ वर्ग
विश्वसनीयता, 57 वाँ
उदारता, 76 वाँ वर्ग
ज्ञान और 58 वाँ वर्ग
वैराग्य व
तपस्या के
प्रतीक रुप
में अंकित
हैं। इन
वर्गों पर
सीढ़ियां थी जिससे
खिलाड़ी तेजी
से आगे बढ़
सकता था।
|
चित्र संख्या 5
|
|
चित्र
संख्या 5 ज्ञान चैपड़, राष्ट्रीय
संग्रहालय, नई
दिल्ली |
|
चित्र संख्या 6
|
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चित्र
संख्या 6 कलात्मक
मोक्ष पदम |
|
|
41 वे वर्ग
में अवज्ञा, 44 वे में
अहंकार, 49 वे में
अश्लीलता, 52 वे में
चोरी, 58 वे
में झूठ, 62 वे में शराब
तथा नशा 59 वे में कर्ज, 84 वे में
क्रोध, 92 वे
में लालच व
लोभ, 95
में घमंड व
अभिमान, 73 वे में हत्या
और 99 वे में
वासना को
दर्शाता था।
इन वर्गों पर
सांप अपना
मुंह खोले
प्रतीक्षा कर
रहा था। 100 वाँ वर्ग
निर्वाण और
मोक्ष का
प्रतीक था। हर
सीढ़ी के शीर्ष
पर एक देवता
या विभिन्न
स्वर्गों
(कैलाश, बैकुंठ, ब्रह्मलोक)
में से कोई एक
का चित्रण
प्रर्दशित
है। चैपड़ को
हाथ से कपड़े
पर सौन्दर्य
रूप से चित्रित
किया गया और
मोहरों को
हाथी दांत से
उत्कीर्ण
किया गया है।
जैसे-जैसे खेल
आगे बढ़ता, खिलाड़ी
विभिन्न
कर्मों के
कारण जीवन की
तरह ऊपर नीचे
जाता था। यह
ज्ञान चैपड़
राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली
में संग्रहीत
है। वैदिक
ज्ञान में निहित
यह मोक्ष
मुक्ति के
मार्ग का
प्रतीक है
जहां सीढ़ियां
उत्थानकारी
गुणों का
प्रतिनिधित्व
करती हैं और
सांप पतनकारी
दुर्गुणों को
दर्शाते हैं।
यह खिलाड़ियों
को सिखाता है
कि कर्मों के
परिणाम होते
हैं उन्हें
अच्छाई के लिए
प्रयास करने
चाहिए और
बुराई से बचना
चाहिए। इस बात
पर विचार करने
के लिए
प्रोत्साहित
करता है कि वह
किस प्रकार का
व्यक्ति बनना
चाहते हैं। यह
एक पारंपरिक
खेल है जिसका
आनंद सदियों
से लिया जाता
रहा है और
अत्यधिक रूप
में इसका समृद्ध, सांस्कृतिक
और ऐतिहासिक
महत्व रहा है।
इसका उद्देश्य
नैतिकता
सिखाना तथा
जीवन की
यात्रा में
अच्छे और बुरे
कर्म को
सिखाना है। https://ishva.co/9-indian-board-games-you-should-know/,n.d.
चैपड़
जिसे
चैसर भी कहा
जाता है। चैपड़
का खेल भी प्राचीन
समय से खेला
जाता रहा है
चैपड़ नाम
संस्कृत के दो
शब्दों चै और
परा से मिलकर
बना है, चै का अर्थ
चार और परा का
अर्थ कपड़े के
तख्ते से है।
चैपड़ की
उत्पत्ति
पच्चीसी के
खेल से हुई
थी। इस पर
अनेक विवाद
प्रस्तुत हैं, कुछ
विद्वानों का
मानना है
भारतीय
महाकाव्य महाभारत
में
युधिष्ठिर और
दुर्योधन के
बीच हुए चैपड़
खेल को पासे
वाले खेल का
परिवर्तित रूप
माना गया है
तथा कुछ
विद्वानों का
अनुमान कहता
है कि भारतीय
पुराणों में
सम्मिलित शिव
पुराण के एक
अध्याय
में शिव और
पार्वती पासों
का खेल खेलते
हुए वर्णित
हैं। चैपड़ का
खेल न केवल
सामान्य
व्यक्तियों
द्वारा खेला
गया वरन्
देवताओं के
द्वारा भी इस
खेल को खेला
जाता था। यह
खेल रणनीतिक
सोच, धैर्य
और सामाजिक
घनिष्ठता को
प्रोत्साहित करता
है। पारंपरिक
रूप से चैपड़
बोर्ड एक कढ़ाईदार
कपड़ा होता है
जिसकी
प्रत्येक
भुजा एक बड़े वर्ग
(क्रॉस) के
आकार के
केंद्र पर
मिलती है जिसे
घर कहा जाता
है। Neeraj (2015)
|
चित्र संख्या 7
|
|
चित्र
संख्या 7 चैपड़, राष्ट्रीय
संग्रहालय, नई
दिल्ली |
|
चित्र संख्या 8
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चित्र
संख्या 8 राधा कृष्ण
सखियों के
साथ चैपड़
खेलते हुए, मुगल
चित्रण |
यह
चार भुजाएं
तथा तीन स्तंभ
में विभाजित
है। इसमें चाल
निर्धारित
करने के लिए
आमतौर पर 6 या 7 कौड़ियों या
लकड़ी के पासों
का उपयोग किया
जाता है।
पासों तथा
गोटियों को
विभिन्न
क्षेत्रों
में अलग-अलग
रूप से
निर्मित किया
गया था, जैसे - हाथी
दांत, लकड़ी, पीतल, तांबा
आदि। यह कुछ
रूप में
पच्चीसी, परचेसी और
लूडो के खेल
के समान है।
मुगलों को पारंपरिक
भारतीय कला और
शिल्प में
अत्यधिक रुचि
थी। हालांकि
ऐसे कई लघु
चित्र भारतीय
संस्कृति का
हिस्सा रहे जो
बोर्ड गेम और
खिलौनों को
दर्शाते हैं, लेकिन
सबसे
उल्लेखनीय
उदाहरण
फतेहपुर सीकरी
में अकबर
द्वारा
निर्मित
पच्चीसी
प्रांगण है।
इसे वह
रणनीतिक
विकास और
मनोरंजन के
लिए खेलते थे।
चतुरंग
चतुरंग
का विकास छठी
शताब्दी ईसवी
के आरंभ में
हुआ था। यह
खेल शतरंज के
जैसा है
जिसमें सेना
के चार भाग
निहित थे।
पैदल सेना, घुड़सवार
सेना, हाथी
सेना और राजा
एवं रानी, सभी की
अपनी अपनी चाल
होती है। यह
खेल व्यक्ति
में रणनीतिक
सोच को विकसित
करता है। यह
खेल अत्यंत
आधुनिक शतरंज
के रूप में
विकसित हुआ। यह
भी एक बोर्ड
खेल है जिसे
प्राचीन समय
से ही खेला
जाता रहा है, परन्तु अब
इसके रूप बदल
गए हैं।
चतुरंग चार व्यक्ति
एक साथ खेल
सकते थे।
भारतीय
उपमहाद्वीप
में चतुरंग
खेल की
उत्पत्ति एक
विवाद का विषय
है। कुछ
विद्वानों का
मानना है कि
इस बोर्ड गेम
का एक आरंभिक
रूप सिंधु घाटी
सभ्यता के
दौरान
प्रस्तुत था, जो 2500 ईसा पूर्व से 1900 ईसा
पूर्व का है।
गुजरात में
हड़प्पा स्थल
लोथल से मिले
प्रमाणों से
ज्ञात होता है
कि वहां खेल
के मोहरे और
खेलने की
सतहें आज
प्रयोग होने
वाले शतरंज की
मोहरों से
अत्यधिक
मिलती-जुलती
थीं। दूसरी ओर, अन्य
विद्वानों का
कहना है कि
पतंजलि ने
महाभाष्य
(पहली शताब्दी
ईसवी) में 64 खानों
वाले एक बोर्ड
का उल्लेख
किया है, जिसे अष्टपद
अर्थात्
आठ-वर्ग के
नाम से जाना जाता
है। 15वीं-16वीं सदी
के दौरान, शतरंज, जिसे
शतरंज के नाम
से जाना जाता
था। मुगल
बादशाह बाबर
ने अपनी आत्मकथा
‘बाबरनामा’
में बताया कि
कई अमीर शतरंज
में रुचि रखने
वाले खिलाड़ी
थे।
|
चित्र संख्या 9
|
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चित्र
संख्या 9 चतुरंग |
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चित्र संख्या 10
|
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चित्र
संख्या 10 सिन्धु
सभ्यता से
प्राप्त
पासे तथा
शतरंज |
|
|
यह
खेल, जो
अपनी समझदारी
और बुद्धि के
लिए जाना जाता
था,
उस समय
बहुत
सम्मानित था।
शतरंज के
मोहरे हाथीदांत, चंदन, सोने और
चांदी से
बारीकी से
बनाए जाते थे, जिन पर
अधिकतर
पेंटिंग बनी
होती थी और
कीमती रत्नों
से सजाए जाते
थे। इसके
अतिरिक्त, मुगल
बादशाह
जहांगीर और
शाहजहाँ इस
खेल के बड़े
संरक्षक बन गए
और इसे अपनी
रानियों के
साथ खेलते थे।
अष्टपद
अष्टपद
खेल का सृजन
भारत से ही
हुआ था। माना
जाता है कि इस
खेल की
उत्पत्ति
सातवीं और
आठवीं
शताब्दी के
मध्य हुई
होगी। आठ
वर्गों वाले
भारतीय खेल को
अष्टपद कहा
जाता है जिसका
संस्कृत में
शाब्दिक अर्थ
आठ पैरों वाला
होता है। यह
खेल साधारण
रूप से दौड़ के
जैसा प्रतीत
होता है, परंतु यह
‘आनंद, आराम
से खेलने में
मिलता है’ की
बात बतलाता है।
भारत में
अष्टपद
संभवतः लकड़ी
के तख्ते पर
खेले जाने
वाला 8 ग 8 का 64 वर्गों वाला
प्रथम खेल था
जिसे पासों के
द्वारा खेला
जाता था। दो, तीन और
चार
प्रतिभागी
वास्तविक
कपड़े पर खेले जाने
वाले खेल को
खेलकर अपने
अंतःकरण को
प्रफुल्लित
कर सकते थे।
प्रत्येक
खिलाड़ी को खेल
खेलने के लिए
सम संख्या में
मोहरे दिए
जाते हैं। खेल
का आरम्भ
बाहरी किनारो
पर वामावर्त
दिशा में चलकर
होता है, और फिर मध्य
वर्गों के
चारों ओर
दक्षिणावर्त दिशा
में घूमना
होता है। फिर
मुड़कर
वामावर्त दिशा
में केंद्र तक
पहुंचना होता
है। खेल की गति
तय करने के
लिए चालों को
चार कौड़ियों
द्वारा
नियंत्रित
किया जाता है।
इस खेल में
कुछ रणनीतिक
कौशल की
आवश्यकता
होती है लेकिन
फिर भी यह
अपेक्षाकृत
सरल है। इस
खेल के बारे
में एक विवादास्पद
मत है कि यह 64 खाने
वाला जो
आधुनिक शतरंज
के खानों के
समान हैं और
इसका एक अन्य
रूप भी है जो 10 ग 10 के
बॉर्डर पर
खेला जाता है
जिसे दशापद के
नाम से जाना
जाता है लेकिन
इसका कोई ठोस
प्रमाण नहीं
मिल पाया है
कि यह वास्तव
में शतरंज का
पूर्ववर्ती
रूप था। यह
रणनीतिक खेल न
केवल मनोरंजन
है अपितु भारत
के गणित और
रणनीति के
समृद्ध
इतिहास की झलक
भी दिखाता है। https://share.google/oLhBnJFBKthfLpQ59,n.d.
|
चित्र संख्या 11
|
|
चित्र
संख्या 11 पारंपरिक
अष्टपद |
|
चित्र संख्या 12
|
|
चित्र
संख्या 12 अष्टपद खेल
का प्रारूप |
पल्लनकुझी
यह
दक्षिण भारत
का एक
पारंपरिक दो
खिलाड़ियों वाला
मनकाला बोर्ड
गेम है जिसमें
14 गड्ढे
सात सात की दो
पंक्तियों
में विभाजित होते
हैं इसमें सीप
या बीज जैसी
मोहरे होती
हैं। स्थानीय
भाषा में
गड्ढे को घर
कहा जाता है और
बीजों के
संग्रह को
कब्जा करना।
गड्ढे में बीज
डालने की
प्रक्रिया को
‘बुवाई करना’
कहा जाता है।
यह खेल रणनीति
वितरण और
मोहरों को
पकड़ने पर
केंद्रित है
जिसका
उद्देश्य
सबसे अधिक मोहरे
एकत्र करना और
गणितीय तर्क
कौशल को बढ़ावा
देना तथा हाथ
और आँखों के
समन्वय का
प्रशिक्षण
प्रदान करना
है। यह एक
मनोरंजनात्मक
स्वरूप है।
इसका नाम तमिल
और मलयालम
भाषा में अनेक
गड्ढे शब्द से
लिया गया है।
कन्नड़ में इसे
अली गुली माने, तेलुगु
में वामन
गुंटलू और
मलयालम में
कुझीपारा कहा
जाता है। यह
एक कौशल
प्रधान खेल है
जिसमें
रणनीतिक, संख्यात्मक
और स्थानिक
सोच की
आवश्यकता होती
है। पारंपरिक
रूप से यह खेल
दक्षिण भारत
के ग्रामीण
क्षेत्रों
में विशेष रूप
से महिलाओं के
बीच खेला जाने
वाला एक बहुत
ही आम लोकप्रिय
खेल है। वह इस
खेल को अपने
घरों में
खेलती हैं और
अपनी गिनती और
योजना बनाने
की क्षमताओं को
विकसित करती
हैं।
ऐतिहासिक रूप
से बोर्ड लकड़ी
के बने होते
थे और धनी
वर्गों के
व्यक्ति
द्वारा बनवाए
गए बोर्ड चंदन, हाथी दांत
या चांदी जैसी
कीमती
सामग्री द्वारा
निर्मित होते
थे।
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चित्र संख्या 13
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चित्र
संख्या 13 लकड़ी से
निर्मित
पल्लनकुझी |
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चित्र संख्या 14
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चित्र
संख्या 14 माता सीता
अपनी सखी के
साथ खेल
खेलते हुए |
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ऐसा
माना जाता है
की माता सीता
अपने खाली समय
में इस खेल को
खेला करती थी।
खेल आगे बढ़ने
पर प्रत्येक
खिलाड़ी सभी
गड्ढों में
सीप बांट देता
है। खिलाड़ी
खेल के नियमों
के अनुसार
सीपों को पकड़
सकते हैं।
सीपों को
पकड़ने के नियम
खेल के प्रकार
पर निर्भर
करते हैं। खेल
तब समाप्त होता
है जब कोई एक
खिलाड़ी सभी
सीपों को पकड़
लेता है और
उसे विजेता
घोषित किया
जाता है।
गंजीफा
भारत
में गंजीफा
कला के
प्रारंभिक
संस्करण का
वर्णन 16वीं शताब्दी
में सम्राट
हुमायूं की
बहन गुलबदन
बेगम द्वारा
लिखी पुस्तक
हुमायूंनामा
में है। इस
कला पर लघु
चित्रों का
कतिपय प्रभाव परिलक्षित
होता है, क्योंकि यह
कला मुगल काल
के समय विकसित
होकर भारत में
फली-फूली और
विभिन्न
रूपों में
लोगों के
समक्ष विकसित
हुई। गंजीफा
शब्द फारसी
भाषा से, विशेष रूप से
गंजीफेह शब्द
से आया है, जिसका
अर्थ ताश
खेलना होता
है। जिसे
गंजीफा, गंजीफेह तथा
गंजपा के नाम
से जानते हैं।
गंजीफा एक
पारंपरिक
ट्रिक
ट्रैकिंग ताश
खेल है, जो कम से कम
तीन या छरू
खिलाड़ियों के
साथ व्यक्तिगत
रूप से खेला
जाता है। यह
कार्ड भारतीय
उपमहाद्वीप
में ताश खेलने
का मुख्य रूप
थे। यह खेल
मध्यकाल के
बाद राजाओं और
कुलीनों
द्वारा खेला
जाने वाला एक
लोकप्रिय खेल
हुआ करता था।
गंजीफा कार्ड
खेल भारतीय
पौराणिक
धार्मिक
ग्रंथों, महाकाव्यों
जैसे रामायण, महाभारत व
अन्य
प्रसिद्ध
कहानियों को
समझने के लिए
शाही
परिवारों में
खेला जाता था
जिससे यहां की
सांस्कृतिक व
धार्मिक एकता
को बल मिल सके।
इसमें
देवी-देवताओं
का अंकन, पशु-पक्षियों
का चित्रण व
अलंकारिक
अंकन दृष्टिगत
होता है। यह
हिंदू
पौराणिक
कथाओं व धार्मिक
अभिव्यक्ति
का
महत्वपूर्ण
साधन माना गया
है। यह कार्ड
हमें गोलाकार, आयताकार व
अंडाकार आकार
में मिलते
हैं। इनमें
चित्र
प्राकृतिक
रंगों जैसे
खनिज व वनस्पति
से बनाए जाते
थे। कार्डों
पर प्रयुक्त
कलाकृतियाँ
पट्टचित्र
चित्रण के
समान
प्रदर्शित
हैं। इन्हें
पारंपरिक रूप
से कपड़े, चमड़े, अभ्रक, ताड़ के
पत्ते, चंदन, हाथी दांत
या कागज से
बनाया जाता
था। इनकी सबसे
महत्वपूर्ण
और आनन्ददायक
विशेषता यह है
कि ताश के
पत्ते
वर्तमान में
भी हाथ से
बनाए जाते हैं
और विशेषज्ञ
(अनुभवी)
शिल्पकारों
द्वारा हाथ से
पेंट किए जाते
हैं, इन्हें
लोकप्रिय रूप
से चित्रकार
कहा जाता है। Aatreya and Vinayak (2020)
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चित्र संख्या 15
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चित्र
संख्या 15 विभिन्न
प्रकार के
गंजीफा, राष्ट्रीय
संग्रहालय, नई
दिल्ली |
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चित्र संख्या 16
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चित्र
संख्या 16 गंजीफा, ताश के
पत्ते |
वर्तमान
में यह खेल
देश के कई
राज्यों और
क्षेत्रों
में फैला हुआ
है। यह सजीव
परंपरा के रूप
में मैसूर, सावंतवाड़ी, ओडिशा तथा
अन्य स्थानों
पर वर्तमान
में भी प्रचलित
हैं।
प्रत्येक
क्षेत्र ने
अपना-अपना संस्करण
व रूप चित्रण
बदल कर इन पर
कार्य करना जारी
रखा है।
निष्कर्ष
प्राचीन
काल से ही
खेलों के
द्वारा सामाजिक, मानसिक व
मानवीयता का
विकास होता आ
रहा है। भारत
के
सांस्कृतिक
इतिहास में
खिलौने और
बोर्ड खेलों
की
महत्वपूर्ण
भूमिका रही
है। निष्कर्ष
रूप से कहा जा
सकता है कि
पारंपरिक
भारतीय बोर्ड
खेल मात्र
मनोरंजन के
साधन मात्र
नहीं है, अपितु वह
भारत की
सांस्कृतिक
आत्म, दर्शन
और बौद्धिक
विरासत का
जीवन्त रूप
है। यह
धार्मिक
अनुष्ठानों
और पौराणिक
कथाओं के प्रचार
प्रसार के
माध्यम बने
हुए हैं। इनके
द्वारा
रणनीतिक सोच, गणितीय
गणना, धैर्य
और स्मृति
शक्ति जैसे
कौशलों के
विकास में
सहायता संभव
है जैसे
एकाग्रता
बढ़ाने के लिए
पल्लनकुझी
तथा गणना एवं
दूरदर्शिता
को निखारने के
लिए शतरंज का
खेल विशेष है।
यह भारतीय कला
और शिल्प
कौशलों की
उत्कृष्टता
को दर्शाते
हैं। वर्तमान
में यह खेल
हमारे बीते
समय के
ऐतिहासिक वृत्तांत
को चित्रित
करने व समझने
में महत्वपूर्ण
भूमिका
निभाते हैं।
आज के डिजीटल
युग में, कलाकार
पारंपरिक
खेलों के
संरक्षण हेतु
पीढ़ियों के
मध्य संवाद का
सेतु बने हुए
हैं तथा इनकी
प्रासंगिकता
बनाए रखने के
लिए प्रयासरत हैं।
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