Original Article
THE DEVELOPMENT OF SOUND CONSCIOUSNESS IN INDIA
भारत में
ध्वनि चेतना
का विकास
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Dr. Jyoti
Mishra 1 1 Senior Assistant Professor, Department of Music and Performing
Arts, University of Allahabad, Prayagraj, India |
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ABSTRACT |
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English: The Indian knowledge tradition is not limited to Vedic and Puranic literature alone, but encompasses numerous fields such as science, mathematics, Ayurveda, yoga, philosophy, and linguistics. Bringing the Indian knowledge system back into the mainstream is a primary need not only for educational institutions but also for Indian society as a whole. The Indian knowledge tradition forms the fundamental basis of both the practical and intellectual aspects of human life, and sound consciousness is the spiritual focal point of human existence. Hindi: भारतीय
ज्ञान
परम्परा
केवल वैदिक व
पौराणिक साहित्य
तक सीमित
नहीं है, अपितु
यह विज्ञान, गणित, आयुर्वेद, योग, दर्शन
और
भाषा-विज्ञान
जैसे अनेक
क्षेत्रों को
समाहित करती
है। आज
भारतीय
ज्ञान
प्रणाली को
पुनः
मुख्यधारा
में लाना न
केवल
शिक्षा-संस्थानों
अपितु
भारतीय समाज
की भी
प्राथमिक आवश्यकता
है। भारतीय
ज्ञान
परंपरा मानव
के व्यावहारिक
पक्ष के
अतिरिक्त
उसके
बौद्धिक पक्ष
का भी मूल
आधार है और
ध्वनि चेतना
मनुष्य के
जीवन का
आध्यात्मिक
केन्द्र
बिंदु है। Keywords: Sound, Consciousness, Indian Knowledge,
ध्वनि, चेतना, भारतीय
ज्ञान |
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प्रस्तावना
भारतीय
ज्ञान
परम्परा केवल
वैदिक व
पौराणिक साहित्य
तक सीमित नहीं
है,
अपितु यह
विज्ञान, गणित, आयुर्वेद, योग, दर्शन और
भाषा-विज्ञान
जैसे अनेक
क्षेत्रों को
समाहित करती
है। आज भारतीय
ज्ञान
प्रणाली को
पुनः
मुख्यधारा
में लाना न
केवल
शिक्षा-संस्थानों
अपितु भारतीय
समाज की भी
प्राथमिक आवश्यकता
है। भारतीय
ज्ञान परंपरा
मानव के व्यावहारिक
पक्ष के
अतिरिक्त
उसके बौद्धिक
पक्ष का भी
मूल आधार है
और ध्वनि
चेतना मनुष्य
के जीवन का
आध्यात्मिक
केन्द्र
बिंदु है।
भारतीय
दृष्टि में
ध्वनि मात्र
श्रव्य तरंग नहीं, बल्कि
अस्तित्व, ज्ञान व
आध्यात्म का
अनुभव है।
भारतीय सभ्यता
के विकास क्रम
में ध्वनि ने
वेदों के
सूक्ष्म
मंत्रों से
लेकर आधुनिक
ध्वनि-विज्ञान, संगीत, साहित्य, योग, ध्यान, साधना व
सामाजिक जीवन
तक में अपनी
एकाग्र भूमिका
निभाई है।
ध्वनि चेतना
के विकास की
यात्रा
हजारों
वर्षों की है।
वैदिक
ऋषियों
द्वारा ”ऊँ“ को
आदिशक्ति
प्रथम-कंपन और
ब्रह्म का
प्रतिरूप
माना गया।
ऋग्वेद, सामवेद आदि
में वर्णित
मंत्र केवल
शब्द नहीं थे, बल्कि
ऊर्जा-संरचनाएँ
हैं, जिनके
सही उच्चारण
से
ब्रह्माण्डीय
शक्तियाँ
जाग्रत हो
जाती हैं।
उचित स्वर व
छंद का उच्चारण
ब्रह्माण्डीय
क्रम, ऋतम्
को संतुलित
करता है।
यही
नाद योग है, आप ध्यान
देंगे कि ऊँ
के उच्चारण
से मस्तिष्क
में एक प्रकार
का जो दबाव है, वह समाप्त
हो गया, आपकी दोनों
नासिकाएं
जाग्रत हैं, आपके
स्वर-रंध्र, नाड़ियाँ
सभी जाग्रत
अवस्था में
हैं और संतुलित
हैं यह शरीर
की
प्रारम्भिक
चेतना है। यही
चेतना योग व
तंत्र
शास्त्र में
आंतरित
यात्रा का
प्रारम्भ है।
जहाँ
योग-सूत्र में
”प्रत्याहार, धारणा और
ध्यान के
माध्यम से
अनाहत सुनने
की विधियाँ
हैं, वहीं
तंत्रशास्त्र
में अनाहत की
अनुभूति के साथ
चेतना के उच्च
स्तर पर
पहुँचना उनका
केन्द्र।
नाद-योग
वस्तुतः
कुंडलिनी
जागरण का अनुभव
है।
जब हम
संगीतात्मक
ध्वनि के
व्यवस्थित
विकास की
चर्चा करते
हैं तो
आचार्य भरत
का नाट्य-शास्त्र, प्रथम
मानक ग्रंथ है, जिसने
स्वर, श्रुति
आदि की संरचना
के आधार पर, संगीत के
द्वारा रस
प्राप्ति का, आस्वादन
का अनुभव
कराया।
रस-सिद्धान्त, ध्वनि के
माध्यम से
चेतना का
उच्चतम रूप
प्रदान करता
है।
तीसरी
शताब्दी के
साहित्य व
संगीत की
विकास यात्रा
मध्यकाल के
भक्ति आंदोलन
तक आते-आते कंचन
पर केसर की
सुगन्ध का
अनुभव कराती
है,
तो उससे
भी पूर्व
ध्वनि-चेतना
का सबसे उत्तम
उदाहरण 7वीं
शताब्दी में आदि
शंकराचार्य
द्वारा रचे पद
हैं। इन सभी
पदों में
ध्वनि का आध्यात्मिक
रूप दिव्य
अनुभव प्रदान
करते हैं यथा-
गणेश
लक्ष्मी
स्त्रोत
ऊँ नमो विघ्न
राजाय
सर्वसौख्य
प्रदायिने
वहीं
शिवोऽहम
स्त्रोत
स्वयं में शिव
की प्राप्ति
भी कराता है।
आदि
शंकराचार्य
ने न सिर्फ
सनातन अपितु
सम्पूर्ण
भारत की चेतना
का जागरण किया
और वर्तमान संस्कृति
का मूल मात्र
आदि
शंकराचार्य
का दर्शन ही
है। उनके
पश्चात् जो भी
साहित्य रचा
उनका अनुवाद
है या उनका
अनुभव। ध्वनि
चेतना का व्यापक
रूप हमें
भक्ति
आन्दोलन में
मिलता है। मीरा
बाई, सूरदास, तुलसीदास, गुरू नानक
देव, मलूक
दास, कबीर
दास आदि संतों
के भजन, पद, दोहे, शबद ने
भारतीय
ध्वन्यात्मकता
का एक नया
रचना संसार ही
रच दिया।
मीराबाई
लिखती हैं-
1)
मन
रे,
मन रे, परीस हरि
के चरन
तो
वहीं गुरू
नानक देव कहते
हैं-
2)
काहे
रे वन खोजन
उन्होंने
अध्यात्मक को
नई दिशा दी।
स्वयं को हिरण
मान लिया, कस्तूरी
सुगन्ध को वन
में मत खोजो
वह स्वयं में
निहित है।
वहीं
तुलसी ने भक्त
की परिभाषा ही
बदल दी-
3)
तू
दयाल दीन हौ, तू दानी
हौं भिखारी
यदि
इन पदों के
बाद कुछ बचता
है जो ध्वनि
के अनन्त
स्वरूप को
दिशा दे तो वो
हैं सूर, वह लिखते हैं-
4)
रे
मन,
कृष्ण नाम
कहि लीजै
उनका
इतने से ही मन
नहीं भरा, वह माँ बन
जाते हैं और
कहते हैं-
5)
कहन
लागे मोहन
मैया मैया
ऐसे
ही सूर, को सूर्य और
तुलसी को शशि
नहीं कहा गया।
यदि देखा जाए
तो आज वर्तमान
में प्रत्येक
घर तुलसी और
सूरदास का ऋणी
है,
जिन्होंने
ध्वनियों का
प्रत्येक की
आत्मा में बसा
दिया और कुछ
कहीं छूटा, तो उसे
कबीर ने पूरा
कर दिया यह
लिखकर-
6)
मोरी
आई गवनवा की
सारी, उमिरि
अबहिं मोरी
बारी
उपरोक्त
चर्चा भारत के
सक्षम जनों की, नगरीय
जीवन की बात
है,
पर जब
ध्वनि चेतना
अन्य धारा की
बात की जाए तब हम
गाँवों व
जनजातीय समाज
की बात करते
हैं। जनजातीय
समाज में
ध्वनियाँ
समग्र संसार
समेटे हैं, उन्हें
साहित्य की
उतनी
आवश्यकता
नहीं, वे
वाद्यों, नृत्यों, पशु-पक्षियों
के माध्यम में
ध्वनियों का
संकलन करते गए
और आज उसमें
साहित्य भी
स्थापित हो
गया, तो
वहीं ग्रामों
में, गाँवों
में पर्व
उत्सवों
ऋतुओं, कृषि-संस्कृति, विवाह-संस्कारों
के माध्यम से
ध्वनि चेतना सामूहिक
जीवन का
हिस्सा बन गई।
जैसे-
शिवरात्रि पर
आज भी हमारे
घर में अतुलित
रूप से यह गीत
गाते हैं-
7)
ससुरारी
में दुल्हा
सजावा गोरिया
तनी
प्रेम से कजरा
लगावा गोरिया
ससुरारी
में शिव के
सजावा गोरिया
तिसरी
अंखियां में
कजरा लगावा
गोरिया
तो
वहीं विदाई के
समय बेटियाँ
मन में यही
भाव लिये
सकुचाती हैं
कि-
8)
माई
काहे के बेटी
जनम देहलू हो
ये
ध्वनि
चेतनाएं
सिर्फ
संस्कारों
में नहीं अपितु
ऋतुओं के गायन
में भी
दृष्टिगत
होती हैं
जैसे-
9)
बरसन
लागी बदरिया
रुमझूम के
आयो
सावन अति मन
भावन झूम झूम
के
वहीं
जब चैत्र आए
तो हम चैती, चैता, घाटों के
द्वारा
ध्वनियों को
जाग्रत कर
लेते हैं।
उदा0-
10) कैसे सजन
घर जइबे हो
रामा
इस
प्रकार हम कह
सकते हैं कि
ध्वनि-चेतना
का विकास केवल
संगीत का
इतिहास नहीं, आध्यात्मिकता, दार्शनिकता, वैज्ञानिकता
का पूर्ण
समन्वय है। यह
गतिशील, प्रेरणादायक
है और जीवन के
हर आयाम में
उपस्थित रही
है और आगे भी
रहेगी।
संदर्भ
सूची
ध्वनि
और संगीत – डॉ.
ललित किशोर
सिंह
सौन्दर्य, रस और
संगीत- प्रो. स्वतंत्र
शर्मा
(परंपरागत गीत) Youtube
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