इस संसार में जो कुछ भी अस्तित्व में है जो दृष्टव्य है सबका अपना-अपना रंग है। चाहे बात अंतरिक्ष, ग्रह, नक्षत्रों, पृथ्वी पर पाये जाने वाले पशु, पक्षियों वृक्षों, नदियों, मानवों, मानव निर्मित वस्तुओं आदि किसी की भी हो, सभी वस्तुएँ अनेकानेक रंगों की होने के कारण अपना स्वतन्त्र अस्तित्व रखती है। वे लोग भाग्यशाली है जिन्हें वर्णो का बोध है। वर्ण बोध का कारण ही हमें इस संसार के सौन्दर्य का आभास होता हैं।
वर्ण बोध हमें प्रकाश की उपस्थिति में ही होता है वर्ण प्रकाश का ही गुण हैं। ‘‘शरीर विज्ञान के विशारदों का कथन है कि पुतलियों के द्वारा प्रकाश नेत्रों में प्रवेश करता है। सीधा नेत्र के पीछे के भाग पर रूक जाता है। रेटीना पर ‘रोडस’ और कोन्स नामक दो प्रकार के तन्तु होते हैं जिनका सम्बन्ध दृष्टि सम्बन्धी नसों से होता है। तंत्रिकाओं के द्वारा इसका सीधा प्रभाव हमारे मस्तिष्क पर पड़ता है। अतः दिन रात का रंग सफेद और काला दिखाई देता है। रंग की उत्पत्ति प्रकाश से ही होती है। सूर्य प्रकाश का सबसे बड़ा स्वरूप है। सूर्य के प्रभाव से जो वस्तु जिस प्रकार की है वह वैसी ही दिखाई देती है और जैसे ही प्रकाश का लोप होता है वस्तु किसी भी प्रकार की हो, काली ही दृष्टिगोचर होती हैं।
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