विश्व प्रकृति निधि भारत का हमेशा ही यह उद्देश्य रहा है कि हम प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण के साथ दीर्घकालिक तथा न्याय संगत विकास करने में सहभागी बनें।1
जब तक हमारे पर्यावरण में बाह्य पदार्थ आकर मिलते हैं संदृषण होता है। प्रारम्भ में यह अल्प मात्रा में होता है, जिससे एक स्तर तक मनुष्य को कोई हानि नहीं पहुँचती तब तक यह संदूषण की श्रेणी में, लेकिन जैसे ही इस सीमा का उल्लंघन होता है तो यह दूषण संदूषण न रहकर प्रदूषण बन जाता है।
हिन्दू धर्म ग्रन्थ ‘‘वाराह पुराण’’ में लिखा है कि वृक्षों के उपकार पाँच महायज्ञ हैं। वे ग्रहस्थों को ईंधन पथिकों को छाया तथा विश्राम, पक्षियों को घोंसले तथा पत्ते, जड़ एवं छालों से सारे जीवों को औषधि देकर उनका उपचार करते हैं।
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