हिंदी साहित्यकारों का प्रकृति-प्रेम सर्वविदित है। आदिकाल , मध्यकाल और आधुनिककाल सभी कालों में प्रकृति पर काव्य-रचनाऐं होती रहीं । प्रसिद्ध छायावादी कवि जयशंकरप्रसादजी लिखते हैं-
ले चल मुझे भुलावा देकर मेरे नाविक धीरे-धीरे-जहाँ निर्जन में सागर-लहरी-अंबर के कानों में गहरी-निच्छल प्रेमकथा कहती हो--तज कोलाहल की अवनि
कवि ने यहाँ मानव की शांतिप्रियता को इंगित किया है ।मानव कोलाहलप्रिय नहीं है, और न ही वह ऐसी धरती चाहता है।( सागर की लहर) और (अबंर) के रूप में प्रकृति ने भी मानव से प्रेम ही किया है ।आज विचारणीय विषय यह है कि फिर ऐसा क्या है, क्यों है, कौन है जो मानव और प्रकृति के अटूट संबंधों को तहस-नहस कर रहा है । वे कौन सी परिस्थितियाँ लगातार बनती रही हैं जो धरती विदीर्ण कर रही हैं । एक भयावह पर्यावरणीय संकट हम सब पर मँडरा रहा है । अब हमें क्या करना चाहिए ।
हम सभी जानते हैं कि भारतीय संस्कृति में प्रकृति कंगन में नग की भाँति जडी है पर जब बड़ा संकट इस संस्कृति के विनाश का दिखाई दे रहा है तो ऐंसे में वैदिककाल से सँजोए हमारे जीवन-मूल्य, जो हमें प्रकृति से प्रेम करना सिखाते हैं, समाप्त हो रहे हैं वेदों की ऋचाओं में हमें अग्नि,सूर्य, चंद्र, वायु, जल, पृथ्वी, आकाश और मेघों के प्रति कृतग्यता का भाव दिखाई देता है । संस्कृत-साहित्य तो प्रकृति के मनोहारी दृश्यों से भरा पड़ा है ।वहाँ प्रकृति मानव की सहचरी,सखी और उसका सर्वस्व है ।
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