मानव शरीर पंच तत्वों- प्रथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश से ही बना है। ये सभी तत्व पर्यावरण के धोतक है। प्रकृति मे मानव को अनेक महत्वपूर्ण प्राकृतिक सम्पदायें भी है। जिसका उपयोग मनुष्य अपने दैनिक जीवन में करता आया है जैसे- नदियाँ, पहाड़, मैदान, समुद्र, पेड़-पौधे, वनस्पति इत्यादि। प्रथ्वी पर प्राकृतिक संसाथनों का दोहन करने से प्राकृतिक संसाथनो के भण्डार तीव्र गति से घटते जा रहे है, जिससे पर्यावरण में असन्तुलन बढ़ रहा है। उसके परिणाम स्वरूप जल की कमी, ओजोन परत में छेद का पाया जाना, वनों की अत्यधिक कटाई से वनों की कमी आना, समुद्रों का जल स्तर बढना, ग्लेशियरों का पिघलना, रेगिस्तानों का बढना आदि हो रही है, जिससे जल, वायु, अन्न, प्रकृति सब प्रदूषण का शिकार हो रहे है। और समूची मानव आदि के साथ पशु-पक्षी, वन्य-प्रजाती व प्रकृति भी प्रभावित हो रहे है।
वनो की अत्यधिक कटाई से प्रथ्वी के मौसम में निरन्तर बदलाव आ रहा है। तापमान में वृद्धि हो रही है। “नासा के जेम सई ने 1960 से 1987 तक के तापमान के विश्लेषण से भू-मंडल के औसत तापमान में 0.5 डिग्री सेल्सियस से 0.7 डिग्री सेल्सियस वृद्धि की बात कही है।“(1) वैज्ञानिको द्वारा बार-बार चेतावनी दी जा रही है एवं हम आये दिन भीषण समुद्री तूफानो-सुनामी, हायन, उहोर, कैटरीना को प्रत्यक्ष रूप से देख रहे है।आये दिन भूकंपो का सामना कर रहे है।
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