मन और उससे जुड़ा मस्तिष्क जिस प्रकार हमारे भौगोलिक पर्यावरण को देखकर उस पर आसक्त होता है और शरीर को अच्छे स्वच्छ पर्यावरण का साथ मानव मन को सुख शान्ति की ओर ले जाता है।
भारतीय संगीत में विभिन्न राग-रागनियों का ध्यान पर्यावरण के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है। ऐसा सर्वविदित है कि एक अच्छा सोच, अच्छे विचार, अच्छा संगीत आदि सभी अच्छे पर्यावरण का निर्माण करते हैं।
नदी का बहना, वायु का प्रवाहमान होना, वृक्षों की सांय-सांय सभी एक सुखद संगीत ध्वनि का निर्माण करते हैं जो अलौकिक है, सार्वभौमिक है। परन्तु हमारे सामवेद में ऊँ का उच्चारण, मंत्रों का उच्चारण उद्दात, अनुद्दात, स्वरित के साथ उसकी ध्वनि का वायुमण्डल पर असर मानव मन और मस्तिष्क पर भौगोलिक पर्यावरण के साथ मानसिक पर्यावरण को तरोताजा कर स्फूर्ति और चेतना प्रदान करता है।
अतः पर्यावरण के संरक्षण हेतु यदि जैविकी, वानस्पतिकीय व वैज्ञानिक प्रयासों के साथ-साथ भारतीय संगीत की समस्त राग-रागिनियों का भी प्रयोग किया जाएगा तो वह उत्तम और सम्पूर्ण साधन होगा। आज के इस वर्तमान युग में पर्यावरण सरंक्षण महत्वर्पूण मुद्दा है व इस पर बहस होना इसके उपायों को खोजना और उनको प्रतिपादित करना विष्व के कल्याण के पथ पर अग्रसर होना है।
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