जल को बचाए रखना सभी की चिन्ता का विषय है, वैज्ञानिक राजनेता, बुद्धिजीवी, रचनाकार सभी की चिन्ता है, जल कैसे बचे ? दुनियाँ को अर्थात पृथ्वी को वृक्षों को, जंगलो को, पहाड़ों को, हवा को, पानी को बचाना है। पानी को बचाया जाना बहुत जरूरी है। पृथ्वी बच सकती है, वृक्ष जंगल, पहाड़ और मनुष्य, पषु, पक्षी सब बच सकते है, यदि पानी को बचा लिया गया और पानी पृथ्वी पर है ही कितना? पृथ्वी पर उपलब्ध सारे पानी का 97ण्4ः पानी समुद्र का खारा जल है, जो पीने लायक नही है, 1ण्8ः जल धु्रवों पर बर्फ के रूप में विद्यमान है और पीने लायक मीठा पानी केवल 0ण्8ः है जो निरंतर प्रदूषित होता जा रहा है। ‘जल ही जीवन है’, जल अमृतमय है वेदों में इसलिए जल की अभ्यर्थना की गई है।
जल के प्रति कृतज्ञता तो हम व्यक्त कर रहे है, उनकी रक्षार्थ क्या कर रहे है ? सरस्वती तो पहले ही लुप्त हो गई थी, गंगा और यमुना भी महानगरों के किनारे प्रदूषित होती जा रही है उनका मूल अस्तित्व ही खतरे में है, नर्मदा भी धीरे-धीरे प्रदूषित हो रही है। कमोवेष सभी नदियाँ सिकुडती जा रही है। कभी लोग नदियों के साथ सामंजस्य से रहा करते थे । जब मनुष्य असभ्य था, तब नदियाँ स्वस्थ और स्वच्छ थी।
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