आर्थिक विकास करना मनुष्य ने सदा से चाहा है। यह भी तथ्य है कि स्वच्छ पर्यावरण के बिना मनुष्य का जीवन अकल्पनीय है। मनुष्य और पर्यावरण के इस रिष्ते में किसी भी हिस्से को बड़ी चोट न केवल इस रिष्ते को खतरे में डाल देती है बल्कि दोनों के अस्तित्व भी खतरे में पड़ जाते हैं। पर्यावरण बिगड़ेगा तो मानव जीवन प्रभावित होगा। इसका यह अर्थ नहीं है कि आर्थिक विकास की कीमत पर पर्यावरण बचायें या पर्यावरण की कीमत पर आर्थिक विकास हासिल करें। दोनों के बीच एक संतुलन की आवष्यकता है ताकि मानव जीवन सुरक्षित बना रहे और लाभांवित भी हो। दोनों का केन्द्र मानव ही है। प्रकृति और मानव पृथ्वी पर जीवन के दो पहलू हंै। दोनों को अलग-अलग कर नहीं देखा जा सकता।
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