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प्राकृतिक आपदा: जल प्लावन और जय शंकर प्रसाद की कामायनी

आलेख श्प्रकृति की घटनाएँ जब चरम रूप ग्रहण कर लेती हैं तो उनसे मानव सहित सम्पूर्ण जैव जगत कठिनाई में पड जाता है और विनाश की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। ऐसी घटनाएँ कभी.कभी इतनी त्वरित होती हैं कि संभल पाना कठिन हो जाता है। प्रकृति की इन घटनाओं के सामने मनुष्य बौना हो जाता है जैसे ज्वालामुखीएभूकंप और जल प्लावन आदि। यूं तो ऐसी घटनाएँ प्रकृति की सामान्य प्रक्रिया से जन्म लेती हैंएलेकिन इनकी गहनता और विस्तार के लिए मनुष्य की कुछ अनुक्रियाएं सहायक बन जाती हैंए जैसे वन विनाश से मौसमी घटनाओं की उग्रता। ऐसी विघटनकारी प्राकृतिक घटनाओं को प्राकृतिक आपदाएपर्यावरणीय प्रकोप कहा जाता हैश्1। पर्यावरण असंतुलन से प्रकट होने वाली दैवीय विपत्तियाँ जैव जगत को अस्त व्यस्त कर देती है। ऐसे प्रकोपों से होने वाली हानि कभी. कभी इतनी भयंकर होती है की सारे वैज्ञानिक और तकनीकी विकास के बावजूद मानव इनके सामने घुटने टेक देता है। इन प्राकृतिक प्रकोपों का सीधा संबंध पर्यावरण से है। जिनका सिलसिला अनादिकाल से चला आ रहा है। लेकिन ये भी सच है कि इन प्राकृतिक प्रकोपों से मानव संख्या और समृद्धि में वृद्धि के कारण प्राकृतिक संकटों के प्रभाव अधिक हानिकारक होने लगे हैं। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि आज प्राकृतिक प्रकोप के पीछे प्रकृति के साथ . साथ मानव जन्य संकट भी जुड़ा होता है।
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Publisher
Classification
Date Issued 2015-09-30
Resource Type
Format
Language
Date Of Record Creation 2021-04-12 07:45:59
Date Of Record Release 2021-04-12 07:45:59
Date Last Modified 2021-04-12 07:45:59

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